भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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माना। यान्त्रिक नियमोंका अनुवर्त्तन करनेवाले इन असंख्य और असमान अणुओंका अन्योन्य प्रभाव न होनेपर भी परमेश्वरकी महिमासे परस्पर सम्बन्ध अवभासित होता है। जिस प्रकार अनेक घटीयन्त्र (घडियाँ) समान रूपसे कालनिर्देशन करते हैं, वैसे ही इन अनन्त असंसृष्ट अणुओंके विषयमे भी समझना चाहिये। कार्य-कारणकी परम्परा ईश्वरमें जाकर समाप्त हो जाती है, क्योकि मूलका मूल नहीं हुआ करता। इसलिये जो सबका मूल है उसे स्वयं अमूल (मूलरहित) ही होना चाहिये। कार्य-कारणपरम्पराके नियमानुवर्त्ती होनेके कारण सृष्टिमें परमेश्वरका हस्तक्षेप नहीं होता। ये 'मोनाड' नामके अणु ही अन्तर्निहित शक्तियोंद्वारा जीव, अजीव, पशु, मनुष्य आदिके रूपमे विकसित होते हैं। 'मोनाड' मन और शरीर तथा पशु और मनुष्यके भेदको दूर कर देता है। बाह्य वस्तुएँ प्रत्यक्ष अनुभूतिके विषय हैं, अतः उनका मनसे पृथक् रूपमे अस्तित्व है और उससे मन प्रभावित होता है। उसीसे बाह्य वस्तुओंका प्रत्यक्षीकरण होता है। परंतु ऐसा माननेपर 'एक मोनाड दूसरे मोनाडोंसे प्रभावित नहीं होता' यह सिद्धान्त खण्डित हो जाता है। इसलिये वह प्रक्रिया ठीक नहीं। घड़ीके समान परस्पर सम्बन्ध न रहनेपर भी समान क्रिया हो सकती है—यह उपपत्ति तो दी ही जा चुकी है। इसलिये आत्मनिष्ठ घटनाका ही अनुभव होता है। बाह्यानुभूति तो माया ही है। काम, सकल्प आदिके समान बाह्य वस्तु भी मानस (मानसिक) ही है। मनुष्य-शरीर असंख्य मोनाडोंसे संघटित है। इसका नियामक मन या आत्मा एक ही मोनाडसे बना है। विश्वके सम्बन्धमे मोनाडोंका विचार समानरूप- में व्यक्त नहीं होता। अग्निसे दो हाथकी दूरीपर स्थित व्यक्तिको उष्णताकी अनुभूति होनेपर प्रतीत होता है कि औष्ण्य अग्निका गुण है। उससे भी अधिक निकट जानेपर औष्ण्यकी अभिवृद्धि हो जानेपर देहमें पीडा भी होने लगती है। वह संनिधान या नैकट्यका ही गुण हो सकता है, अग्निका नहीं। पीडा तो उष्णताका ही उत्कट रूप है। अतः औष्ण्य अनुभूतिविशेष ही हुआ, अग्निका गुण नहीं। कुछ कीटाणुओंकी टाँगे इतनी सूक्ष्मतम होती हैं कि वे सूक्ष्मवीक्षण-यन्त्रसे ही देखी जा सकती हैं परंतु इससे यह नहीं कहा जा सकता कि उन [कीटाणुओ] को भी अपनी टाँगे सूक्ष्मवीक्षणयन्त्रसे ही ज्ञात होती है। इसलिये द्रष्टाके मनके गुणों- के अनुसार ही सूक्ष्मता या दीर्घता प्रतीत होती है। इसीलिये कीटाणुके मनके लिये दृश्य कुछ और है, हमारे मनके लिये दृश्य कुछ और है। किंतु इतने मात्र- में उस टाँगकी लम्बाई दो प्रकारकी नहीं हो जाती। परंतु सिद्ध यह होता है कि परिमाण दृष्टिका गुण है, दृश्य वस्तुका गुण नहीं। कारण, वह द्रष्टाके मनसे सापेक्ष है। जो आपाततः गुण प्रतीत होते हैं, विचार करनेपर वे मनकी अनुभूतिके

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