भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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और समष्टि पातकोंसे समष्टिदुःखजनक उपद्रवोंकी उत्पत्ति होती है, यह सर्वथा निर्दोष सिद्धान्त है। इस स्थितिमें धार्मिक होनेपर भी दुःख आनेपर कालान्तरीय पातकोंकी कल्पना की जा सकती है, जो फलवलकल्प्य है। इस प्रकार कोई दोष नहीं रह जाता। ऐसे प्रलापोंका समाधान बहुत पूर्वसे होता आ रहा है। मनुने पापी पुरुषोंको सुखी और कदाचित् धर्मात्माओके दुखी होनेकी शङ्कापर बतलाया है कि ऐसी बात देखकर भी अधर्मसे बचना चाहिये। क्योकि पहले अधर्मसे कभी-कभी वृद्धि देखी जाती है, पर उसका कारण व्यक्तिके प्राक्तन सुकृत हैं। उनका फल समाप्त होते ही उसका समूल विनाश हो जाता है-- अधर्मैनेधते तावत् ततो भद्राणि पश्यति । ततः सपत्नाञ्जयति समूलस्तु विनश्यति ॥ नाधर्मश्चरितो लोके सद्यः फलति गौरिव । शनैरावर्तमानस्तु कर्तुर्मूलानि कृन्तति ॥ न सीदन्नपि धर्मेण मनोऽधर्मे निवेशयेत् । अधार्मिकाणां पापानां शीघ्रं पश्यन् विपर्ययम् ॥ ( मनु० ४ । १७४, १७५, १७१ ) पापीके बड़े-बड़े पुण्योंका फल तनिक सुखमे समाप्त हो जाता है। इसी प्रकार पुण्यात्माके बड़े-बड़े पाप साधारण कष्टभोगोंसे समाप्त हो जाते हैं। पापीको जहाँ साम्राज्यप्राप्तिकी बात थी, वहाँ उसे पाप करते एक अशर्फी मिलकर रह जाती है। यो ही पुण्यात्माको जहाँ मरण-जैसा भयङ्कर कष्ट आना होता है, वहाँ पुण्य करते काँटा चुभकर रह जाता है। प्रज्ञा (बुद्धि) में भी भ्रम आदि दोष देख पड़ते ह, अतः उसका भी प्रामाण्य ऐकान्तिक नहीं है। अनुभवके अतिरिक्त भी कोई विचारमार्ग है या नही ? इस प्रश्नके उत्तरमे अध्यात्मवादी कहते हैं 'है', भौतिकवादी कहते ह 'नहीं है' । हाब्सने सब वस्तुओकी व्यवस्था यान्त्रिक सिद्धान्तानुसार बतलायी। उसके मतानुसार 'केवल वस्तुएँ और गतियाँ ही सत्यभूत हैं और सब इन्हींका विकार- समुदाय है। ज्ञान भी उसीमे अन्तर्भूत हो जाता है। इन्द्रियानुभूति ही ज्ञान है। वस्तुओके द्वारा इन्द्रियाक्रान्ति ही अनुभूति है। यह भी गतिविशेष ही है। मन भी भौतिक ही है। सभी वस्तुओका यह मूलभूत गुण है कि वे अपनी वर्तमान अवस्थामे रहती हैं। वह अवस्था गतिरहित हो या गतिमती हो यह दूसरी बात है।' हाब्सके मतमें 'मानव कल्पनाशक्तिके सीमित ही होनेके कारण किसी भी वस्तुकी असीम धारणा सम्भव नहीं है। इसलिये सीमारहित शक्ति या सीमारहित समय नहीं है। कहीं-कहीं असीम शब्दका जो प्रयोग होता है, उसका यही तात्पर्य होता है कि हमें उसकी सीमाका ज्ञान नहीं है। इन्द्रियानुभूतिका विषय न हो ऐसा कोई भी धारणाका विषय ( संभव ) नही हो सकता।' लाइबनिट्सने भौतिकवादका खण्डन करनेके लिये संशोधित रूपसे परमाणु- वादकी प्रतिष्ठापना की। निर्जीव भूतोमे सृष्टि नहीं हो सकती, यह सिद्ध करनेके लिये उसने 'मोनाड' नामके अनुभवशक्तियुक्त आध्यात्मिक अणुओको ही सृष्टिका कारण

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