भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 31, कुल 866 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 31

१८ मार्क्सवाद और रामराज्य गरी शक्तियाँ परमेश्वरकी अङ्गभूता हैं । व्यापकता तथा मननशक्ति इन दोका अनुभव लोगोंको होता है । भौतिक पदार्थ तथा घटनाएँ व्यापकताशक्तिमे एव मन तथा उसकी अनुभूतियाँ मननशक्तिमे अन्तर्भूत हो जाती हैं । एक ही अन्तिम सत्ताके विभिन्न रूप होनेके कारण तथा समानकालिक होनेके कारण मन तथा शरीर परस्पर क्रिया-प्रतिक्रियावान् हैं । पदार्थगतिके अनुरूप ही मनोगति होती है । बाह्य नियमबन्धनका प्रतिविम्बमात्र ही आन्तरिक-नियमबन्धन है । बुद्धिमें जिसकी धारणा होती है, बाहर भी उसकी सत्ता होती है । साथ ही, कार्यकारणभाव सर्वत्र है । जैसे लौहका कूट ( निहाई ) आदिके द्वारा ताड़नादि होता है, वैसे ही कूटादिका भी अन्य साधनोसे ही निर्माण होता है । वैसे ही उन साधनोका भी निर्माण साधनान्तरोसे ही होता है—यों कार्य-कारणभावकी कहीं समाप्ति नहीं । समान गुण हुए बिना दो वस्तुएँ परस्पर प्रभावोत्पादक नहीं हो सकती । इसलिये आत्मा एव भूतोके पारस्परिक प्रभावो- त्पादनके लिये उनका समानगुणत्व मानना होगा । यो मूलतः दोनो एक ही हैं । आन्तर कारणके सम्बन्धमें स्पिनोजाकी दृष्टिसे 'किसी प्रयोजनके बिना मन्द व्यक्ति भी किसी कार्यमें प्रवृत्त नहीं होता, अतः प्रवृत्ति सोद्देश्य होनी चाहिये । जैसे नेत्र देखनेके लिये बनाये गये हैं, दाँत चबानेके लिये, सूर्य प्रकाशके लिये, ऐसे ही सभी वस्तुएँ मानवीय उपयोगके लिये ही बनी हैं । उपयोग करने योग्य वस्तुएँ अपने प्रयत्नके बिना ही मिल गयीं, इसलिये यह कल्पना की जाती है कि वे किसीके द्वारा बनायी गयी होगी । निर्माताके बिना ही स्वतः उत्पन्न हो गयी होगी ऐसा विश्वास जल्दी नहीं होता; क्योकि वैसा देखा नहीं जाता । जैसे हमलोग अपने उद्योगके लिये वस्तुओका निर्माण करते हैं, वैसे ही प्रकृतिके अधीश्वरने हमलोगोपर अनुग्रह कर वस्तुओका निर्माण कर दिया—ऐसे निरूढ संस्कारसे ईश्वर सिद्ध हो जाता है ।' इसपर भौतिकवादियोका यह कहना है कि "सब वस्तुएँ परमेश्वरके अनुग्रहसे उत्पन्न हुई हैं' यह इसलिये नहीं कह सकते कि बहुत-सी ऐसी भी वस्तुएँ मिलती हैं, जो उपयोगार्ह नहीं हैं, प्रत्युत विघातक हैं । यथा—विष, भूकम्प, व्याधि आदि । यदि कहा जाय कि 'ये वस्तुएँ परमेश्वरके कोपमूलक हैं' तो वह भी ठीक नहीं, क्योकि वैसा माननेपर धार्मिको एव ईश्वरभक्तोपर इनका कोई प्रभाव न पडना चाहिये था । पर देखा यह जाता है कि धार्मिक और अधार्मिक सब उपद्रव- ग्रस्त होते हैं । दूसरा मार्ग खोजनेकी अपेक्षा अन्धकारमें पड़े रहना ही सुखकर है ऐसा सोचकर आदर्शवादी वहीं पड़े हैं ।" यह भौतिकवादियोका प्रलाप है । वास्तवम सुख-दुःख धर्माधर्ममूलक हैं ( सुखका मूल धर्म और दुःखका मूल अधर्म है ) । व्यष्टिके पापोसे व्यष्टिको दुःख