भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पाश्चात्त्य-दर्शन १७ यदि शरीरसे अभिन्न वस्तु हो, तो उसकी भी वैसी ही गति सिद्ध हो जाय। पृथक्त्ववादियोंके मतमे मन शरीर-प्रभावसे अस्पृष्ट ही रहता है। देकार्त्तके मतसे 'मन और वस्तु दोनो ही ईश्वरनिर्मित हैं। चिन्तन मनकी विशेषता है और विकास वस्तुकी। ये दोनों परस्पर भिन्न होनेके कारण एक दूसरेसे अत्यन्त अप्रभावित रहते है। जिस प्रकार दो घटिकायन्त्र स्वतन्त्ररूपसे नाद करते हैं, अतः एक साथ नाद करनेपर भी उनका सम्बन्ध नही माना जा सकता, उसी प्रकार मन एव शरीरकी घटनाएँ यद्यपि एक दूसरेके अनुरूप होती हैं, तथापि उनका कोई पारस्परिक सम्बन्ध नही है। परमेश्वरकी कृपासे ही मन और शरीर दोनोकी क्रियाओमे सामञ्जस्यसे जीवन चलता है।' इस प्रकार भौतिकवाद तथा आदर्शवाद--ये उस [देकार्त्त] के दर्शनकी दो धाराएँ हैं। स्पिनोजा [१६३२-१६७७ ई०] भौतिकवादका प्रवर्त्तक हुआ और लाइवनिट्स [१६४६ ई०] आदर्शवादका। स्पिनोजाके मतसे 'प्रज्ञा ही सबसे उत्कृष्ट है। उसीके द्वारा धर्मग्रन्थके विषयोकी भी परीक्षा की जानी चाहिये। प्रज्ञासे वस्तुओके सम्बन्धोका अन्वेषण करना चाहिये। प्राकृतिक घटनाओके आन्तरिक सम्बन्धके बतलानेमे अप्राकृतिक शक्तिका हस्तक्षेप अनुचित है। इसके मतसे आध्यात्मिक, मानसिक एव भौतिक ऐश्वर्य आदि सभी भाव प्रकृतिमे ही अन्तर्भूत हो जाते हैं और इस प्रकार ईश्वर अथवा प्रकृति एक ही है। सम्पूर्ण ही ईश्वर है, ईश्वर ही सम्पूर्ण है। घटनाओका ऐक्य केवल उनके अस्तित्वमात्रका है, जो नियमानुवर्ती है। भूतो तथा आत्माओका पूरा साम्य है। उनमे ईश्वरकी सत्ता है, अतः भूत आत्ममय ही हुए। सीमित वस्तुएँ एव घटनाएँ अपने अतिरिक्त असंख्य वस्तुओ एव घटनाओसे सम्बद्ध है। इनके समूहका ज्ञान अत्यन्त दुष्कर है, अतः किसी न किसी स्वात्मनिर्भरकी सत्ता मानना आवश्यक है। इस प्रकार मूल पदार्थका वैविध्य नहीं रह जाता। साथ ही इस पक्षमे शून्यकारणतावादका परिहार बड़ी सरलतासे हो जाता है। पूर्ण अनन्त ईश्वर अथवा पूर्ण अनन्त प्रकृतिसे बहिर्भूत अन्य कुछ नहीं रह जाता--ईश्वर ही सम्पूर्ण है। इसमे अन्तर इतना ही है कि कार्य कारणसे अभिन्न अर्थात् अनन्य हो सकता है, परन्तु कारण कार्यसे अभिन्न नहीं होता। जैसे हाटक (सोना) से भिन्न कटक, मुकुट, कुण्डलादि नहीं हैं, पर कटक, मुकुट आदिके बिना भी हाटक रहता है। अतः हाटकको उनसे अभिन्न नहीं कहा जा सकता। इसी तरहसे सम्पूर्ण जगत् परमेश्वरसे अभिन्न है। पर जगत्के बिना भी वह परमेश्वर रहता है। अतः वह जगत्से अभिन्न नहीं कहा जा सकता और प्रकृति तथा ईश्वरमे इतना भेद है कि स्वतन्त्र और चेतन ईश्वर है, किंतु अचेतन चेतनाधिष्ठित प्रकृति है। सृष्टिचक्रके बाहर कोई अप्राकृत वस्तु नहीं है और प्रकृतिका स्वभाव चञ्चल है। सभी शक्तियाँ उसीमे विलीन रहती हैं। सारी-की मा० रा० २--