भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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१६ मार्क्सवाद और रामराज्य वे केवल बुद्धिसे ग्रहण कर ली जाती हैं और वे मनुष्योको स्वतःसिद्ध हैं, अतः प्रमाण-निरपेक्ष होकर भी सत्य है।' वस्तुतः सत्यताका निर्णायक प्रमाण ही होता है, क्योकि प्रमाके कारणको प्रमाण कहते है और अज्ञात अबाधित असदिग्धविषयक ज्ञान ही प्रमा शब्दसे कहा जाता है । उस प्रमाके कारणको ही प्रमाण कहा जाता है। सहज प्रत्यय भी तो चक्षुरादि प्रमाणोसे ही उत्पन्न होंगे । इसीलिये सहज प्रत्ययो- मे भ्रम, प्रमा आदि विभाग होगे । देकार्तेके मतमें जिस वस्तुका बुद्धिमे स्पष्ट अवभासन हो, उसीका सत्य ज्ञान होता है, परंतु यहाँ यह विच्चारणीय है कि किसीकी बुद्धि या मनमे जो भासित होगा वह दूसरेकी भी बुद्धि या मनमे भासित हो यह अनिवार्य नही । यदि प्रत्येककी बुद्धिमे जो भासित हो उसीको सत्य मान ले, तो भिन्न-भिन्न बुद्धियोमे भिन्न भान होनेके कारण वस्तुका रूप ही विकृत हो जायगा । फिर भी अन्य सभी वस्तुओमे सदेह करनेवाला भी अपनेमे कोई सदेह नही करता । 'सदेह करनेवाला कोई मनन करनेवाला है' यह तो असदिग्ध ही है । यहाँ भी सदेह आदिका भासक कोई है, यह तो मानना ही पड़ेगा और वह अपरिवर्तनशील ही हो सकता है, अतः चेतनावान् पुरुषको भी देकार्त्तने माना है। ह्यूमका कहना है कि 'काम, सकल्प, लज्जा, भय इत्यादि मानसिक भावोकी जिस प्रकार अनुभूति होती है, उस प्रकार उसके भासक पुरुषकी अनुभूति नही होती । यदि ऐसी कल्पना की जाय कि ये मानसिक भाव मणितुल्य हैं और आत्मा- रूपी सूत्रमे निबद्ध ह, तब भी मणिस्थानीय भावोके समान सूत्रस्थानीय आत्माकी भी उपलब्धि तो आवश्यक ही रहती है और यह सूत्रस्थानीय आत्मा उपलब्ध होता नही, अतः उसका अस्तित्व ही नही है।' साथ ही इस पक्षमे बाह्य वस्तुकी अपेक्षा मनके मननकर्तृत्वसे स्वात्मज्ञान ही अधिक है । इस प्रकार ससारके मानसिक कल्पनामात्र होनेसे वस्तुत्वकी ही सिद्धि न होगी । तब फिर मनको पूर्णरूपेण शरीरसे भी पृथक् मानना पडेगा । ऐसी भ्रान्ति बहुतोको हुई है । वस्तुतः सर्वभासक साक्षी उपलब्धि अथवा भानस्वरूप होनेसे भानान्तरनिरपेक्ष ही सिद्ध है । वस्तुका प्रकाश दो प्रकारसे होता है । एक प्रकाशस्वरूप होनेसे और दूसरा प्रकाशसे ससर्ग होनेसे । जैसे घटादिमे 'प्रकाशके ससर्गसे प्रकाशित होता है, ऐसा व्यवहार होता है और प्रकाशमे संसर्गान्तर बिना ही 'स्वतः ही प्रकाशित होता है' ऐसा व्यवहार होता है । इसी तरहसे प्रकाशान्तर या बोधान्तरका विषय न होनेपर प्रकाशस्वरूप होनेसे 'प्रकाशित होता है', ऐसा व्यवहार सगत है और मणियोके बीच सूत्रोपलब्धिके समान विविध बोधवृत्तियोकी सधियोमे निर्विकल्प बोधस्वरूप स्वतः भासमान रहता ही है। गतिविज्ञानवादियोकी दृष्टिमें यन्त्रादिकी अपेक्षा गति ही पहलेसे निर्धारित है। शरीर- के यन्त्ररूप निर्मित होनेके कारण उनकी भी गति वैसे ही पूर्वनिर्धारित ही है। मन भी