भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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वाचोयुक्ति भी संगत मालूम होती है। अन्य लोगोंका कहना है कि बाह्य वस्तु अनुभूतिके कारणके रूपमे मान लेना चाहिये, क्योकि उसके बिना अनुभूतियोंमे वैचित्र्य उपपन्न नही होता। औरोका कहना है कि वासनाओके वैचित्र्यसे ही उन अनुभूतियोंके वैचित्र्यकी उपपत्ति दी जा सकती है। कुछ लोगोंका कहना है कि यद्यपि विज्ञानके अतिरिक्त और कुछ अनुभवका विषय नहीं होता, तथापि विज्ञानके वैचित्र्यकी उपपत्तिके लिये जब उसे मान लेना पडता है, तब स्वातन्त्र्येण भी उसकी कही सत्ता होगी ऐसा मान लेना चाहिये। बौद्धोंमे कोई क्षणिक बाह्य और आन्तर दोनो पदार्थ मानते हे। कुछ लोग आन्तरको प्रत्यक्ष और बाह्यको अनुमेय कहते हुए आन्तर विज्ञानमे विचित्रताकी उपपत्ति के लिये अनुमेय बाह्य पदार्थ मानते हे,। कुछ लोग वासना-वैचित्र्यसे ज्ञान-वैचित्र्य मानते हैं। इसलिये बाह्य पदार्थका अस्तित्व नहीं स्वीकार करते। वर्कलेका (१६८५-१७५३) मत है कि 'औष्ण्य (उष्णता)के समान ही रूप, संस्थान,गुरुत्व आदि भी 'मानस' भाव ही है, इसलिये उनमे भी औष्ण्यसे कुछ वैशिष्ट्य न होनेके कारण कोई भेद नही। इसी प्रकार वस्तु गुणात्मक ही है। गुणोंके न रह जाने- पर वस्तु रह ही नहीं जाती और गुण विज्ञानके अतिरिक्त कुछ नहीं है।' भारतीय वेदान्तानुसार भी वस्तुस्थिति ऐसी ही है। शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध आदि गुणोंके अभावसे पृथ्वीतत्त्व कुछ मनोमात्र ही तो रह जाता है। परमेश ज्ञानमय होनेके कारण व्यवहारमे सब वस्तुओका यथायोग्य उपयोग हो जाता है, परंतु विचारसे उनका बाध हो जाता है, अतः अविचारितरमणीयता भी है। ईश्वरकी कल्पनाके विषय पदार्थ 'व्यावहारिक' और 'धारणाविषय' कहे जाते हैं और हमलोगोके कल्पित पदार्थ 'प्रातिभासिक' और 'कल्पनामात्र' । यही भेद है। ब्रह्मसे भिन्न सब कुछ दृष्टिसृष्टिमात्र है। भौतिकवादी न तोपरमेश्वरको ही मानते हे, न चेतनको ही स्वतन्त्र मानते हैं। अतः उनके मतमे तो यह सारा ही दर्शन बाधित हो जाता है। उनके मतमे विज्ञान- सिद्ध पदार्थका भी अस्तित्व है ही। मन अथवा चेतना पदार्थोंके गुण ही हैं। काण्ट (ई० १७२४-१८०४) दार्शनिक तथा गणितज्ञ था। उसकी 'प्रकृतिका साधारण इतिवृत्त' और 'ऊर्ध्वलोक-सिद्धान्त' नामकी पुस्तके प्रसिद्ध है। उसने ह्यूमके अज्ञेयवादसे विज्ञानका उद्धार किया और धर्मकी भी रक्षा की। उसके मतमें सभी वस्तुएँ दो प्रकारकी होती हैं—पारमार्थिक तथा प्रातिभासिक। इसलिये सामान्य व्यक्तिको वस्तुका यथावत् ज्ञान नहीं होता। उसके मतमे 'मनसे सम्बद्ध कुछ कारण होते हैं, जिनसे युक्त मनके द्वारा वस्तुएँ कुछ दूसरे ही प्रकारकी जानी जाती हैं। जैसे सहज नीले उपनेत्रसे युक्त चक्षुके द्वारा सब वस्तुएँ नील ही प्रतीत होती हैं, वैसे ही कुछ हेतुओसे युक्त मनके द्वारा देश-कालमें व्याप्त ही

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