मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपाश्चात्त्य दर्शन २३ वस्तुएँ प्रतीत होती हैं। अनुभूतिमें जिनकी प्रतीति होती है, उनमें पहले रूपा- दिहीन वस्तुएँ ही प्रतीत होती हैं।' सहज नीले उपनेत्र लगा लेनेके समान स्वतःसिद्ध ज्ञानरूपी साँचेसे वस्तुएँ जब मष्तिष्कमें जाती हैं, तब देश-कालादिसे सम्बद्ध ही प्रतीत होती हैं—यह हम कह आये हैं। 'यहाँ', 'वहाँ', अथवा 'सर्वत्र' किंवा 'इस समय', 'उस समय' अथवा 'सर्वदा'--इस प्रकार सभी वस्तुओंका अवबोध देश-कालसे आबद्ध ही होता है। काण्टके अनुसार मनमें यही स्वतः- प्राप्त ज्ञानका रूप है।' ऐसे ही मनःसंलग्न सहज उपनेत्रके समान अन्य कारणोंसे ज्ञान होनेका उस (काण्ट) का सिद्धान्त भी समझ लेना चाहिये, जिससे गुण, परिमाण, पदार्थ, कार्य और कारणके सम्बन्धोंका भान होता है। 'जो भी वस्तुएँ जानी जाती हैं, उनमेंसे प्रत्येक पदार्थ परिमाणयुक्त है। उनमें कुछ गुणयुक्तोंकी दृष्टिसे कार्य हैं, कुछकी अपेक्षासे कोई कारण है। ज्ञानसिद्धान्तानुसार अनुभूयमान वस्तुओंमे मनके साथ मानसिक भाव भी संयुक्त हो जाते हैं। अतः ज्ञात वस्तु सम्मिश्रित ही होती है शुद्ध नहीं। सहजप्रत्ययरूप रूपहीन पदार्थ ज्ञानसिद्धान्तसे संसृष्ट होकर विज्ञात होता है और 'यह मनुष्य है', 'यह पशु है' इत्यादि रूपसे प्रत्यभिज्ञात होता (पहचाना जाता) है। इसीसे अनुभव विज्ञान बनता है। उसके मतमें प्रतीयमान जगत्का नाम 'फेनोमेना' है और वस्तुभूत जगत्का 'नूमेना' प्रथम वर्कलेके सिद्धान्तसे सम्मत है, द्वितीय उससे भिन्न। समस्त व्यवहार सङ्कल्पमूलक ही हैं। तर्क, गणित आदिके नियम भी सङ्कल्पात्मक ही हैं। जैसे दो और तीन मिलकर पाँच होते हैं—यह गणितका नियम है। कार्य सदा सकारण होता है। आम्र स्वयं भी और स्वयंसे भिन्न भी— यह सम्भव नहीं, यह तर्क भी उसी ढंगका है। ये भाव मानस ही हैं क्योंकि जिनके मनका संघटन भिन्न प्रकारका होगा, उनके इस विषयमें विचार भी भिन्न प्रकारके हो सकते हैं। इसलिये हमारी धारणाके अनुसार ही हमारा जगत् है। परन्तु हमारे विचारोंसे वस्तुव्यवहार भी प्रभावित होता है, इस विश्वासका कोई कारण नहीं है। तर्क और अनुभवके मध्यसे विज्ञान प्रवृत्त होता है। गणितके समान विज्ञानमें भी तर्कका स्थान है। भेद इतना ही है कि विज्ञान अनुभवसे तर्ककी परीक्षा करता है और गणितका परिणाम अपरीक्षणीय ही रहता है, क्योंकि उसकी सत्यता छिपी नहीं रहती। इन्द्रियानुभूतिमें भी वैसी जटिलता नहीं है, किंतु तब गणितके तर्कोंका अनुभूतिके क्षेत्रोंमें प्रयोग कैसे हो, यह समस्या तो है ही। वैज्ञानिकी प्रक्रिया तो यह है। उसमें तर्कसिद्ध ज्ञान वस्तुव्यवहारमें प्रयुक्त होता है। जैसे मध्याकर्षण-नियमके आविष्कारसे वस्तुव्यवहारके सम्बन्धमें भविष्यवाणी की जाती है और वैसा ही घटित भी होता है। तर्कसिद्ध वस्तु प्रयोगमें भी कैसे सत्य होती है। यह समस्या है। जिन वस्तुओंका इन्द्रियानुभूतियोंमे ग्रहण