मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकिया जाता है तथा जिनका बुद्धिसे ग्रहण किया जाता है, उनमें अन्तर स्पष्ट है। कुछ वस्तुओंकी दो-दो जोड़ियाँ बालकके द्वारा गिनी जानेवाली बुद्धिसे दो-दो चार होते हैं, यह व्यापक सत्य है। व्यापकधारणा विशिष्ट इन्द्रियानुभूतियोंसे भिन्न पृथक् ही हैं, कारण वह रूप, प्रयोग आदिसे भिन्न है। यहाँ प्रजावादी तो इन्द्रियानुभूतिके विप्रयका ही अपलाप कर देते हैं। कार्यकारण-सम्बन्धमें बँधे होनेके कारण एक वस्तुके विज्ञानसे ही सब विज्ञान हो जाता है, क्योंकि वही अवश्यंभावी परिणाम है। उनके मतमें कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है जिसका अस्तित्व घटनामात्र हो।' डार्विनका (१८०९-१८८२) मत है कि 'इन्द्रियोंसे पृथक् विचारशक्ति है ही नहीं, इसलिये इन्द्रियानुभूतिके अतिरिक्त विचार कुछ है ही नहीं।' उसके मतमें 'उन सूक्ष्म तन्तुओंका संकुचन, गतिविशेष अथवा रूपान्तरसे परिवर्त्तनविशेष हो ज्ञान है, जिनसे इन्द्रियोंका निर्माण होता है।' विचारका ही दूसरा पर्याय इन्द्रिय गतिविज्ञान है। स्मृतिशक्ति, कल्पना यदि जीवगति नहीं तो और क्या हो सकती हैं? यदि उसे वस्तुओंका चित्र या प्रतिकृति कहा जाय तो वह कहाँ है, जहाँ सभी वस्तुओंका संग्रह शक्य हो? सामान्यतया इन्द्रियानुभूति-विश्वासियोंके मतमें कोई आत्मा है, जिसके द्वारा बाह्य वस्तुएँ प्रतिकृतिके रूपमें ग्रहण की जाती हैं। डार्विन, हक्सले प्रभृति वैज्ञानिकोंने आत्मवादका खण्डन कर यह सिद्ध करनेका प्रयत्न किया कि 'वस्तुओंके इन्द्रिय-सन्निकर्षसे स्नायुओंद्वारा शरीरमें जो क्रियाविशेष उत्पन्न होती है, उसीसे विचारका जन्म होता है।' इन्द्रियाँ और उनका विषयोंके साथ सन्निकर्ष एवं मस्तिष्क-स्नायुओंपर तज्जन्य प्रभाव सभी अचित् (जड़) होनेसे वे स्वयं अपना ही प्रकाश नहीं कर सकते, तो फिर दूसरों- की तो बात ही क्या? अचेतनमें चेतनकी उत्पत्ति होती है, यह सिद्धान्त भी असिद्ध है, जैसा कि पहले दिखलाया जा चुका है। कात्पानी (१८४२-१९३५) का कहना है कि 'मानवेन्द्रियोंमें बाह्य वस्तुओं- की क्रिया-प्रतिक्रिया आदिके द्वारा जो प्रभावोत्पादन होता है, वही ज्ञान है। अनुभव ही जीवन है। घटनावलीयोंकी अद्भुत शृङ्खलाओंसे उसका अस्तित्व है। सभी वृत्तियोंके द्वारा अपने विकाससे किसी आवश्यकताकी पूर्ति ही की जाती है और परस्परके अनुसार अभ्यास बढ़ानेवालेके प्रयोजनोंकी निवृत्ति भी हो जाती है। बाह्य वस्तुओंके घात-प्रतिघातका परिणाम ही मानवजीवनका अस्तित्व है। हल्बागने 'प्रकृति-प्रथा' नामक पुस्तकमें फ्रांसीसी भौतिकवाद प्रकाशित किया है। उसमें दीदेरो, वफो, दकेसी, हेलवेशियस इत्यादिका मत संगृहीत है। उनके अनुसार 'दुःखका मूल प्रकृतिका अन्यथाज्ञान ही है। रूढ़िपाशमें बँधे हुए प्रकृतिके अध्ययनसे विमुख लोगोंका प्रेत-पिशाचादिमें अन्धविश्वास ही दुःख- का मूल है। प्रकृतिके अध्ययनसे उसका उच्छेद (कर डालना) आवश्यक है।