मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८ मार्क्सवाद और रामराज्य रूपमे देख सकता है और अलग वस्तुओ के पुञ्जके रूपमे देखता है । आम तौरपर समझा जाता है कि सत्यता सम्मति या रायका एक गुण है। कोई सम्मति सत्य है यह एक ही वस्तुपर निर्भर है । हेगेल सिवा पूर्णके और किसीको सत्य नहीं मानता । जो कुछ पूर्णसे कम है वह सत्य घटना नहीं, वह दूसरी घटनाओंसे सम्बन्धित है । जिनमें विच्छिन्न करके इसको नहीं समझा जा सकता । इसीलिये विचार एव विचारका विषय मिथ्या है, परम सत्य अधिष्ठानस्वरूप नित्य बोध ही रहता है । हेगेलका 'स्वयंगतिविवर्तनवाद' का विचार बड़े महत्त्वका माना जाता है । अरस्तू एव उसके अनुयायियोंके मतानुसार 'कोई नयी चीज हो ही नहीं सकती, क्योंकि वह एक आनुमानिक प्राथमिक वस्तुसे ही सारे संसारका सूत्र जोड़ लेती है। अरस्तूके अनुसार एक वस्तु एव तदनुरूप विचार एक ही वस्तु है दो नहीं ।' इससे भिन्न हेगेलने कहा कि 'प्रत्येक वस्तुमे एक अन्तर्विरोध है जो उसको गतिदान करता है और इस स्वयं विकासकी क्रियामे वह दूसरी वस्तुके रूपमे परिवर्तित हो जाती है ।' हेगेल वस्तुकी अपेक्षा विचारको ही तात्त्विक मानता है । संसारका क्रमविवर्तन उसके मतानुसार विचारका ही क्रमविवर्तन है । उसके अनुसार प्रथम 'विचारका नाम वाद है, इसके साथ ही विपरीत विचार भी वर्तमान रहता है, उसका नाम प्रतिवाद है । इन दोनोंके संघर्षसे जो नया विचार उत्पन्न होता है, उसका नाम समन्वयवाद है । इस समन्वयवादमें पुनः अन्त- विरोधकी सृष्टि होती है और एक नये संघर्षके परिणामस्वरूप गति उत्पन्न होती है जो एक नये और बृहत्तर समन्वयवादमे लीन होती है । विश्व-लीला इसी विचार- संघर्षकी ही क्रिया है । अन्ततः यह लय होती है पूर्णमे ।' हेगेलके विचार वेदान्तके अद्वैत-दर्शनसे मिलते जुलते हैं । वेदान्तका ब्रह्म अखण्डबोधस्वरूप है, उसीका विवर्त विश्व है, विश्वके पहले भी मन बनता है । स आत्मा सर्वगो राम नित्योदितवपुर्महान् । समनाङ् मननीशक्तिं धत्ते तन्मन उच्यते ॥ (पञ्चदशी १३।२०) वह स्वप्रकाश ब्रह्मात्मा किञ्चित् मननी शक्तिको धारण कर मन हो जाता है । यह भी वेदान्तका ही सिद्धान्त है कि हर एक वस्तु व्यावृत्तरूपसे ही उपलब्ध होती है । अर्थात् अपनेसे भिन्न समस्त वस्तुनिरूपित भेदसे युक्त ही वस्तुका बोध होता है । किसी अल्पज्ञको सम्पूर्ण पदार्थोंका बोध हो नहीं सकता, अतः तन्निरूपित भेदका भी ज्ञान असम्भव है, फिर स्वेतर सर्व वस्तु भिन्नरूपसे किसी भी पदार्थका जानना सम्भव नहीं । इसलिये घटज्ञानमे व्यावृत्तरूपसे घटका भान होता है, परन्तु व्यावृत्ति एवं उसके निरूपक घटातिरिक्त सकल पदार्थोंका बोध है नहीं, अतः अतत्त्वे तद्बुद्धि होनेके कारण व्यावृत्ताकारेण घट-बोध ही भ्रम है, सुतरां उसमे अध्यासित होनेवाला घट भी भ्रम-सिद्ध ही है । विचार या ज्ञानसे भिन्न