भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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ही वस्तु स्वरूपकी धारणा है । परंतु ऐसा सम्भव नहीं । अतः वह ज्ञानसे परे है।' हेगेलके जगत्का भी स्रष्टा मन ही है, काण्टके अमल जगत् एव दृश्यमान जगत्के द्वित्वका भी इसने खण्डन किया है। स्पिनोजाके समान हेगेल भी आत्मा-मन ओर भूतको अभिन्न ही मानता है। अर्थात् आत्मासे अभिन्न मन एव मनसे अभिन्न भूत हैं । उसके अनुसार 'पूर्णतत्त्व ही सब कुछ है, दृश्यमान जगत् उसीका अङ्ग है । किसी वस्तुको समझनेके लिये दूसरी वस्तुओसे तुलना आवश्यक होती है । जैसे एक मुर्गीका अण्डा गेंदसे कम गोल है, चमड़ेसे अधिक टूटनेवाला है, गौरैयाके अण्डेसे बड़ा है । इस तरह सभी घटनाओको मिलाकर ही वस्तुविशेष बनती है । अतः दूसरी वस्तुओसे इसके सम्बन्ध इसकी प्रकृतिको बताते हैं । साथ ही दुनियाकी सभी वस्तुओसे भी इस अण्डेका सम्बन्ध है । भले ही यह सम्बन्ध समतामे हो या विषमतामे । इसलिये एक अण्डेको पूर्णरूपसे जाननेके लिये हर विद्यमान वस्तुका ज्ञान होना चाहिये जो कि अल्पज्ञ प्राणीके लिये असम्भव ही है । अतः भेद असत्य है, एक ही महान् वस्तुके सब अङ्गोपाङ्ग हैं । यही बात विचारोंके सम्बन्धमे भी है। किसी सत्यके अस्तित्वके प्रकाशके साथ-साथ उसके विपरीत असत्यके अस्तित्वका भी प्रकाश होता है । शङ्ख श्वेत है, इस प्रकारकी घटनाके विवरणके लिये ही यह सत्य नहीं किंतु सिद्धान्तोके विचारके लिये भी यही सत्य है । जैसे स्वतन्त्र इच्छाके ही सिद्धान्तको देखें, अपनी इच्छाके अनुसार काम करनेकी स्वतन्त्रता हमें नहीं है । हमारा कार्य पूर्वनिर्धारित है । घटनावश उस कार्यको करनेके लिये हम बाध्य हैं । इसे ही 'पूर्वनिर्धारणका सिद्धान्त' कहा जाता है । इन सिद्धन्तोके विपरीत सिद्धान्तके अस्तित्वका अर्थ ही यही है कि कोई भी सिद्धान्त स्वतन्तरूपसे पूर्ण सत्य नहीं है । इसलिये वह कहता है कि 'कोई उपाय ऐसा अवश्य होना चाहिये जिसमे एक सत्य एव उसके विपरीत सत्यको मिलाकर व्यापक सत्यकी प्रतिष्ठा हो, जिसमें दोनो आंशिक सत्य मिले हों।' इन आंशिक सत्योका परस्पर विरोध रहता है, अतः इनके अधूरेपनमे मनका टिकना सम्भव नहीं । इसीलिये मन व्यापक सत्यकी खोजमें बढता रहता है । यद्यपि कारणरूपी सत्यमे विरोधी कार्योंका समन्वय हो जाता है, जैसे मृत्तिकामे घट-शरावादि विविध कार्य अन्तर्गत होते हैं, तथापि मृत्तिका भी स्वयं कार्य है, अतः अन्तिम (अधिष्ठान ) सत्यपर जबतक मन नहीं पहुँचता, जहाँ किसी भी आंशिक सत्यका विरोध विलीन हो जाता है तबतक आंशिक सत्योको मिलाकर एक व्यापक सत्यमें परिणत करनेकी क्रिया जारी रहती है । यह अन्तिम सत्य ही सब कुछ है और वह सत्य आन्तर अखण्ड बोधस्वरूप ही है । मन एव मनद्वारा ज्ञात विषय एव उनकी विभिन्नताएँ इसके अदर ही हैं । मन उसी पूर्णका अगमात्र है । इसीलिये यह विश्वको भी गल्त-