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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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२६ मार्क्सवाद और रामराज्य

लिये दृश्य वस्तुओका एकत्रीकरण, उनका पारस्परिक सम्बन्ध-स्थापन तथा तुलनात्मक आलोचना होती है। इसलिये इन्द्रियानुभूतिको सत्य माननेपर बुद्धिप्राप्त ज्ञान ही असम्भव है। यदि प्रज्ञावाद सत्य हो, तो इनका ज्ञान असम्भव है। ज्ञानका विषय कुछ है। परंतु यह भी सत्य है कि अनुभूतियोंमें बुद्धि प्रयुक्त होती है। उसके परिणामका भी अपने जगत्‌मे प्रयोग होता है। परंतु उभयवादियोके सामञ्जस्यकी समस्या तो वैसी ही रह जाती है। इस विषयमें काण्टका कहना है कि 'अनुभूतिका विषय अकृत्रिम नही है। इसलिये वस्तुतत्त्व अनुभवसे गृहीत नही होता, किन्तु ज्ञानप्राप्तिकी क्रियासे परिष्कृत देशकालादि- सम्बद्ध ही वस्तुका ग्रहण होता है। इससे यह तो सम्भव है कि वस्तु उन नियमोका पालन करे, जिन नियमोसे वस्तु बुद्धिसे मण्डित होती है। यदि भौतिकवादके अनुसार प्रकृतिको क्रियाशील और ज्ञानको अक्रिय माना जाता है तो ज्ञानमे व्यवस्थापकत्व कैसे बन सकता है ? काण्ट आदिके ज्ञानका रचनात्मक कार्य कर्तृत्व इस दृष्टिसे होता है कि मनस या सर्वमनस ही ज्ञान है, भारतीय वेदान्तकी दृष्टिसे मन स्वय ही भौतिक कार्य है, उसकी उत्पत्ति होती है और वह व्यापारवान् होता है, सक्रिय तो है ही। इगलिश-फ्रेन्च भौतिकवादियोका यह मत भी ठीक नही कि वस्तुका अस्तित्व विचार कर्ताके अस्तित्वसे पहले है, विचारकर्ता इसकी अनुभूति प्राप्त कर सकता है। यदि आत्मा भूतका ही परिणाम है तब तो सुतरा कार्य भूत आत्माके पहले कारणरूप भूतका रहना ठीक ही है। परंतु जडभूतोके किसी परिणाममे चेतनता या विचारकर्तृता किसी भी प्रमाणसे नही सिद्ध हो सकती, हान्सके विचार भी इस सम्बन्धमे भौतिकवादी ही हैं। भौतिकवादी भूतपरिणामको ही ज्ञान मानते हैं, अतएव ज्ञानका उद्गमस्थान उनकी दृष्टि से इन्द्रियग्राह्य रूपोके मूलभूत ही है। किंतु अध्यात्मवादी जडभूतो के अतिरिक्त आत्माको ही ज्ञानका उद्गमस्थान मानते है। वह आत्मा नैयायिक, वैशेषिक आदिके अनुसार ज्ञान-गुणवाला है, कुछके मतानुसार ज्ञान- स्वरूप होकर ज्ञानधर्मक है और कुछके मतानुसार अखण्ड नित्य बोधस्वरूप है। उससे ही सर्वभूतो एव भूतप्रकृतिकी उत्पत्ति होती है, उससे भौतिक अन्तःकरण मन आदि उत्पन्न होता है, उसीसे साभास वृत्तिरूप अनित्य ज्ञान उत्पन्न होते हैं। परंतु उन सबमे पृथक् अखण्ड स्वतः सिद्ध नित्यबोध है, जिससे अनित्य ज्ञानोकी उत्पत्ति, स्थिति एव प्रलय आदिका बोध होता है।

हेगेल-दर्शन

हेगेलने (१७७०-१८३१) काण्टकी वस्तुस्वरूप धारणाका खण्डन किया और बतलाया कि 'वस्तुको उसके आवेष्टन गुणो और अवस्थाओसे अलग करके देखना

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