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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

२८ मार्क्सवाद और रामराज्य रूपमे देख सकता है और अलग वस्तुओ के पुञ्जके रूपमे देखता है । आम तौरपर समझा जाता है कि सत्यता सम्मति या रायका एक गुण है। कोई सम्मति सत्य है यह एक ही वस्तुपर निर्भर है । हेगेल सिवा पूर्णके और किसीको सत्य नहीं मानता । जो कुछ पूर्णसे कम है वह सत्य घटना नहीं, वह दूसरी घटनाओंसे सम्बन्धित है । जिनमें विच्छिन्न करके इसको नहीं समझा जा सकता । इसीलिये विचार एव विचारका विषय मिथ्या है, परम सत्य अधिष्ठानस्वरूप नित्य बोध ही रहता है । हेगेलका 'स्वयंगतिविवर्तनवाद' का विचार बड़े महत्त्वका माना जाता है । अरस्तू एव उसके अनुयायियोंके मतानुसार 'कोई नयी चीज हो ही नहीं सकती, क्योंकि वह एक आनुमानिक प्राथमिक वस्तुसे ही सारे संसारका सूत्र जोड़ लेती है। अरस्तूके अनुसार एक वस्तु एव तदनुरूप विचार एक ही वस्तु है दो नहीं ।' इससे भिन्न हेगेलने कहा कि 'प्रत्येक वस्तुमे एक अन्तर्विरोध है जो उसको गतिदान करता है और इस स्वयं विकासकी क्रियामे वह दूसरी वस्तुके रूपमे परिवर्तित हो जाती है ।' हेगेल वस्तुकी अपेक्षा विचारको ही तात्त्विक मानता है । संसारका क्रमविवर्तन उसके मतानुसार विचारका ही क्रमविवर्तन है । उसके अनुसार प्रथम 'विचारका नाम वाद है, इसके साथ ही विपरीत विचार भी वर्तमान रहता है, उसका नाम प्रतिवाद है । इन दोनोंके संघर्षसे जो नया विचार उत्पन्न होता है, उसका नाम समन्वयवाद है । इस समन्वयवादमें पुनः अन्त- विरोधकी सृष्टि होती है और एक नये संघर्षके परिणामस्वरूप गति उत्पन्न होती है जो एक नये और बृहत्तर समन्वयवादमे लीन होती है । विश्व-लीला इसी विचार- संघर्षकी ही क्रिया है । अन्ततः यह लय होती है पूर्णमे ।' हेगेलके विचार वेदान्तके अद्वैत-दर्शनसे मिलते जुलते हैं । वेदान्तका ब्रह्म अखण्डबोधस्वरूप है, उसीका विवर्त विश्व है, विश्वके पहले भी मन बनता है । स आत्मा सर्वगो राम नित्योदितवपुर्महान् । समनाङ् मननीशक्तिं धत्ते तन्मन उच्यते ॥ (पञ्चदशी १३।२०) वह स्वप्रकाश ब्रह्मात्मा किञ्चित् मननी शक्तिको धारण कर मन हो जाता है । यह भी वेदान्तका ही सिद्धान्त है कि हर एक वस्तु व्यावृत्तरूपसे ही उपलब्ध होती है । अर्थात् अपनेसे भिन्न समस्त वस्तुनिरूपित भेदसे युक्त ही वस्तुका बोध होता है । किसी अल्पज्ञको सम्पूर्ण पदार्थोंका बोध हो नहीं सकता, अतः तन्निरूपित भेदका भी ज्ञान असम्भव है, फिर स्वेतर सर्व वस्तु भिन्नरूपसे किसी भी पदार्थका जानना सम्भव नहीं । इसलिये घटज्ञानमे व्यावृत्तरूपसे घटका भान होता है, परन्तु व्यावृत्ति एवं उसके निरूपक घटातिरिक्त सकल पदार्थोंका बोध है नहीं, अतः अतत्त्वे तद्बुद्धि होनेके कारण व्यावृत्ताकारेण घट-बोध ही भ्रम है, सुतरां उसमे अध्यासित होनेवाला घट भी भ्रम-सिद्ध ही है । विचार या ज्ञानसे भिन्न

पाश्चात्त्य-दर्शन (पृष्ठ २९)

वस्तु नहीं। विचार या ज्ञान अखण्ड बोध ब्रह्मसे भिन्न नहीं है, इस दृष्टिसे वस्तु एव विचार सबका ही पर्यवसान अखण्ड बोधस्वरूप वस्तुमे ही होता है । हेगेलका अन्तर्विरोध या द्वन्द्वमानका अभिप्राय क्रमिक विवर्तके स्वरूपका ही विवेचन है । मूल वस्तु अखण्डबोध आन्तरिक वस्तु है । मन, विचार आदि उसके अति संनिहित है । अतः उनमे हलचल होनेसे ही विचारान्तर या वस्त्वन्तर उत्पन्न होते हे । विचार-सघर्षसे विरोधी विचारोमे सर्वबाध होनेके अनन्तर बाधाधिष्ठान परमार्थ वस्तुका बोध होता है । वही सब विरोधो, सब सघर्षोका अन्त हो जाता है । सुन्दोपसुन्दन्यायसे सत्कार्यवाद-असत्कार्यवाद दोनोके ही सांख्यो एव नैयायिकोद्वारा खण्डित हो जानेपर अनिर्वचनीयता एव विवर्तकी सिद्धि होती है । इसी तरह जैसे बीजमे अन्तर्विरोधद्वारा उसका विध्वस होता है तब अङ्कुरकी उत्पत्ति होती है, वैसे ही हर एक कारणमें अन्तर्विरोध होनेके बाद विध्वस या विकृति

उपस्थित होता है । अर्थात् कार्य-कारणभाव तो प्रत्यक्ष दृष्ट ही है । दृष्ट व्याघात इस शङ्काकी अवधि है । 'व्याघातावधिरशङ्का शङ्का तर्कावधिर्मतः ।' इस तरह अन्तिम परम सत्य परम संवादको वाद बनाना तथा अन्तिम कार्यरूप संवादको भी वाद बनाकर कार्यानन्तरकी कल्पना करना भी अनवस्था एव दृष्ट व्याघात-दोषसे दुष्ट है । यो तो हेगेलके द्वन्द्ववादको भी वाद बनाकर उसका भी ऐकात्म्यवादमे लय हो जानेकी कल्पना की ही जाती है । जब द्वन्द्ववादके आधारपर अधिनायकवाद, समष्टिवाद, भूतवाद और चेतनवाद-जैसे परस्पर विरुद्ध मत सिद्ध हो सकते हैं तब उसके बलपर तो किसी 'इदमित्थम्' सिद्धान्तका निर्णय असम्भवप्राय ही है । हेगेलके मतानुसार 'राज्य मानवकी सामाजिक प्रगतिकी चरम सीमा है ।' इसका अर्थ है कि 'वह संवाद आगे वाद नही बनेगा ।' परतु मार्क्सने उसे भी वाद बनाया ही । वह मजदूर-नायकत्व या समष्टिवादको चरम सवाद कहता है, परंतु रामराज्यवादी जड-चेतन दोनोको आध्यात्मिक सम्बन्धसे समन्वित करता है तथा राजतन्त्र-प्रजातन्त्र, व्यष्टि-समष्टि वित्तविभाग एव श्रमविभागको समन्वित करता है । इस तरह अध्यात्मवादपर आवृत धर्म-नियन्त्रित धर्मसापेक्ष पक्षपातविहीन शासन-तन्त्र राज्यको ही अन्तिम सवाद एव सामाजिक प्रगतिकी चरम सीमा मानता है । इस पक्षमे निश्चित : प्रत्यक्षानुमान, अपौरुषेय आगम आर्षशास्त्र एव परम्परा सभी अनुकूल है । भारतीय अध्यात्मवादमें समष्टि अनन्तकोटि ब्रह्माण्डात्मा कार्य-कारणातीत ब्रह्मका स्थूल रूप है । उसके भीतर समष्टि लिङ्गात्मा हिरण्यगर्भ सूक्ष्मरूप है । उसमे भी आन्तरसमष्टिकारणात्मा महाकारण ईश्वर है और सर्वान्तर सूक्ष्मतम कार्य- कारणातीत शुद्ध ब्रह्म है । महाविराट्की अपेक्षा भी हेगेलका विश्वात्मा बहुत स्थूल एव सकीर्ण है । मार्क्स दर्शन कार्लमार्क्सने (१८१८-८३) हेगेलके द्वन्द्वमानको भौतिकवादसे जोड लिया, परतु मार्क्स मानस या बोधको स्वयंविकास या विवर्त मानता है । इस प्रक्रियाका प्रथम अंग हे एक अविभाजित इकाई । यह इकाई दो विरोधी अगोमे विभाजित हो जाती है । पुन. इन विरोधोका समन्वय होकर एक नयी सम्बन्धित इकाईका जन्म होता है । इसी प्रकार सृष्टिका विकास होता रहता है । इन बातोंको ब्रह्मवादमें भी जोड़ा जा सकता है । अविभाजित ब्रह्मका भी दृक्-दृश्य, ज्ञान-ज्ञेयरूपमें विभाजन हुआ । पुनः दोनोंके समन्वयसे ही महदादि प्रपञ्चकी सृष्टि होती है । इसी तरह उत्तरोत्तर कारणका विभाजन, विध्वंस या समन्वयसे उत्तरोत्तर सृष्टि होती है । एक बीजमें धरणी, अनिल, जलके सम्पर्कसे उच्छूनावस्था (अङ्कुरोत्पत्तिके पहले बीजकी फूलनेकी अवस्था) होती है । फिर अन्तर्विरोधसे बीजका विध्वंस या विभाजन होता है, पुन' समन्वय होकर अङ्कुर उत्पन्न होता है । मार्क्स इसी

अन्तर्विरोधको द्वन्द्वमान मानकर कहता है 'यह क्रिया भूतकी ही है मनकी नहीं, मन- में तो भूतकी ही क्रिया प्रतिबिम्बित होती है।' परन्तु वेदान्त-मतानुसार विनाश या विध्वंसको अङ्कुरका कारण नहीं माना जाता, किंतु बीजके अवयव ही अङ्कुरके रूपमें परिणत या विवर्तित होते हैं क्योंकि कार्यमें बीजके अवयवोंका ही अन्वय दिखायी देता है। अतः विनाश या विध्वंस विकासका कारण नहीं, इसके अतिरिक्त कारण ब्रह्म कार्यरूपमें परिणत होनेपर भी अविकृत मुक्तोपसृप्य ब्रह्म बना ही रहता है। आकाश, वायु आदि भी उन उन कार्योंके रूपमें परिणत होनेपर भी समाप्त नहीं हो जाते। उनका भी पृथक् अस्तित्व बना ही रहता है। इसके अतिरिक्त हेगेलके यहाँ इस सङ्घर्ष-क्रियाकी सीमा है। हर कार्यमें अन्तर्विरोध या सङ्घर्षसे उत्तम वस्तुका विकास नहीं होता, इसीलिये कोई कार्योंके विनाशसे कोई भी अच्छी चीज उत्पन्न नहीं होती। तभी लोग कार्यध्वंससे उद्विग्न होते हैं। वस्तुतः मार्क्सने हेगेलके द्वन्द्वमानका गलत अभिप्राय समझकर दुरुपयोग किया है। किसी कार्यमें भावरूप उसका उपादान कारण एवं रजके हलचलके साथ तमका अवष्टम्भ तथा सत्त्वका प्रकाश भी अपेक्षित होता है, इस तरह कार्योत्पत्तिमें आंगिक सङ्घर्षसे अधिक प्रकाश एवं अवष्टम्भका महत्त्वपूर्ण हाथ रहता है। हलवाश एवं हुवेलवैशियस अठारहवीं शताब्दीके भौतिकवादियोंके प्रतीक समझे जाते थे। हलवाशकी पुस्तक 'प्रकृति-विन्यास' है। उसका कहना है कि 'यदि सत्ताका अर्थ है सच्चा स्वरूप तो हमें वस्तुकी सत्ताका कोई ज्ञान नहीं। प्रत्यक्षावलो- कनसे तथा तज्जनित स्पन्दन और विचारोंसे हमें भूतका ज्ञान प्राप्त है। इन्द्रियोंके अनुसार विषमेच्छा—अच्छी या बुरी राय कायम करते हैं। उसकी प्रतिक्रियाके अनुसार उसके कुछ गुणोंका परिचय यद्यपि हमें मिलता है, फिर भी भूतकी सत्ता या सच्चे स्वरूपका ज्ञान नहीं होता। मनुष्य भूतोंका ही बना है। अतः भूतोंके अतिरिक्त उसका और कोई विचार नहीं है। अतः भूत ही विचारशक्ति-सम्पन्न है। अथवा भूतका परिणाम ही मनन शक्ति है।' पृथिवीके सम्बन्धमें उसका अनुमान है कि सम्भव है कि यह एक भूतपिण्ड है, जो किसी नक्षत्रसे विच्छिन्न हो गया होगा। अथवा सूर्यस्थित काले बिन्दुओंके विस्तारका ही परिणाम है अथवा बूझी हुई धूमकेतु होगी।' ऐसे ही वह मनुष्य- को भी प्रकृतिकी आकस्मिक उपज होनेकी कल्पना करता है। इस समयके दार्शनिक धर्मके विरोधी थे और बुद्धि एवं अनुभवपर प्रतिष्ठित नीतिके साथ धर्मके सम्बन्धको भयंकर समझते थे, क्योंकि धर्मको वे बुद्धिविरुद्ध एवं नैतिक शिक्षाको कमजोर बनानेवाला मानते थे। हलवाश वासनाको ही वासना-पूर्तिकी औषध समझता था। वह वासनाओंका दमन अनावश्यक समझता था। उसका

३२ मार्क्सवाद और रामराज्य कहता है 'मनुष्यमात्र सुख चाहता है । दुःखसे घबराता है । इसीलिये सुख-साधन भले तथा दुःख-साधन बुरे हैं। कोई सरकार ऐसा कष्ट नहीं उठाती जिससे उसकी प्रजाको न्याय, भलाई और ईमानदारीमे ही सुविधा मालूम हो । इसके विपरीत अन्यायी दोषी बननेके लिये प्रेरित किया जाता है । प्रकृतिने मनुष्यको बुरा नहीं बनाया । सामाजिक व्यवस्था ही इसके लिये जिम्मेदार है।' वाल्टेयरके मतानुसार 'समाज न्याय-अन्यायकी धारणा बिना नहीं रह सकता ।' किंतु हलवाश इसमे ईश्वरकी आवश्यकता नहीं समझता । 'न्याय, संयम, उपकार जीवनके लिये लाभदायक हैं, यह सभी समझ सकते हैं।' रूसो कहता है, 'फिर भी अपने सुखके लिये कोई मौतका सामना क्यो करेगा ? अतः ऐसे स्थलका स्वार्थ सामाजिक स्वार्थ ही समझा जाना चाहिये, व्यक्तिगत नहीं ।' १८ वीं शतीके भौतिकवादी समझते थे कि 'भूलसे ही मनुष्यको दुःख होता है, यदि मनुष्य अपने स्वभावपर कायम रहेगा तो सदा सुखी रहेगा।' सियरबेलके शङ्कावाद लङ्क, कन्डिलाक बर्क आदिके इन्द्रियानुभूतिवादसे भौतिकवादको बडा बल मिला, हल्वेशियसने भी बताया कि 'मनुष्यकी बुद्धिमे प्रकृतिगत समानता, विचारशक्ति तथा उद्योगकी उन्नतिमें एकता तथा पालन-पोषणकी महान् शक्ति स्वाभाविक गुण है।' इन सवसे समाजवादको बल मिला। सेंट साइमन लई तथा राबर्ट एडवर्ड लासाल आदिने समाजवादकी रूपरेखा व्यक्त की। यद्यपि ये सभी ईश्वर एवं धर्ममे विश्वास रखते थे। मार्क्स यद्यपि दार्शनिक विचारोमे हेगेलका शिष्य था तो भी उसका कहना था कि 'हेगेल सिरके बल खडा था । आज मै उसे पैरके बल खडा कर रहा हूँ।' हेगेल एव मार्क्सके बीच फायरबाखका दर्शन है। इसके कई अंशोको मार्क्स- ने ग्रहण किया, कईका खण्डन किया । बीटेने लिखा है-ईश्वर मेरा पहला विचार है, ज्ञान दूसरा तथा मनुष्य तीसरा और अन्तिम ।' इसपर फायरबाखने कहा है, 'आदर्शवाद एव भौतिकवादके झगड़ेका केन्द्र है मनुष्यका मस्तिष्क । मस्तिष्क किस प्रकारकी वस्तुसे बना है, यह मालूम हो जाय तब अन्य वस्तुओके सम्बन्धमे विचार स्पष्ट होते हैं।' उसका यह भी कहना है कि 'अस्तित्व कर्ता है और विचार क्रिया है। विचार अस्तित्वका कार्य है कारण नहीं । अस्तित्व स्वयं मूल है।' वह कहता है, 'आदर्शवादी दर्शनका आरम्भ ही गलत है। सच्चे दर्शनका आरम्भ केवल मैंसे न होकर मै और तुमसे होना चाहिये। यहाँसे विचार एवं पदार्थ तथा कर्ता एवं कर्मके सम्बन्धको ठीक रूपमें समझ सकते हैं। मै स्वयं अपने लिये मै हूँ परन्तु दूसरोंके लिये तुम । मै एक साथ कर्ता हूँ एव कर्म भी, मै अमूर्त्त- सत्ता नहीं। मेरा वास्तविक अस्तित्व है मेरा शरीर ही । अपने समग्ररूपमे मेरी वास्तविक सत्ता है । जो विचार करता है वह अमूर्त्त नही, भौतिक अस्तित्व ही कर्ता

पाश्चात्त्य दर्शन ३३

है, विचार उसकी क्रिया है । विचार एव विरोधके अस्तित्वकी समस्याका यही हल है। प्रकृति या भूतोको दबाकर या मिथ्या कहकर समस्याका हल नहीं हो सकता ।' फायरवाखका कहना है कि 'यदि स्पिनोजाके सिद्धान्तमे धर्म विद्याका जंजाल निकाल दिया जाय तो मूलतः यह बहुत सही है।' कहते हैं, आदर्शवादसे नाता तोडनेके बाद पहले-पहल मार्क्स एवं एंजिल्सने इसी दर्शनको अपनाया था । फायरवाखका कहना था कि 'बाहरी वस्तुकी क्रियाका विषयमात्र बनकर मनुष्य उन वस्तुओंको पहचानता है' परंतु मार्क्सका कहना है कि 'वस्तुके ऊपर अपनी प्रति- क्रियाद्वारा हम उसकी पहचान करते हैं।' उपर्युक्त विद्वानोंके विचार भारतीय दर्शनोकी दृष्टिसे बहुत स्थूल हैं । विषयेन्द्रियमयोगजन्य सुख ही वास्तविक सुख नहीं है। अनश्वर सुख आत्मस्वरूप ही है । या तो दादके खुजलानेमे भी सुखकी प्रतीति होती है, पर क्या उसे कोई बुद्धिमान् सुख मान सकता है ? इसी तरह सूक्ष्म विवेचन बिना अस्तित्वयुक्त पदार्थको ही अस्तित्व मानकर उसके कर्ता एव विचारको कर्म मान लिया गया । अस्तित्व तो वह सूक्ष्म वस्तु है जो विचारमे भी अनुस्यूत है, जिस अस्तित्वके बिना देह एव देहान्तर्गत उसकी समग्रताके पूरक सभी असत् हो जाते हैं। सर्व विशेषणरहित अस्तित्व ही सर्वत्र समानरूपसे अनुस्यूत होनेके कारण सर्वबीज है, विचारकी सूक्ष्मता उससे अधिक सनिकट है। उसमें ही मैं और तुम सबका अन्तर्भाव हो जाता है । अवश्य ही बहिर्मुख प्राणीका 'मैं' की अपेक्षा 'तुम' अधिक स्पष्ट है। इसीलिये तो भाष्यकार शंकराचार्यने 'युष्मदस्मत्प्रत्ययगोचरयोः' इत्यादि रूपसे तुमसे ही विचार प्रारम्भ किया था । भौतिकवादियोके मै और तुम सभी शंकरके युष्मत्प्रत्ययगोचर ही ठहरते हैं, क्योंकि दृश्य अनात्ममात्र युष्मत्प्रत्ययगोचर होता है । निर्द्वयदृक् आत्मा ही अस्मत्प्रत्ययगोचर भाष्यकारको मान्य है । मार्क्सने फायरवाखके दर्शनपर टिप्पणी करते हुए लिखा है—'उस भौतिक सिद्धान्तमे जिसके अनुसार मनुष्य परिस्थितियों एव शिक्षाकी उपज कहा जाता है, इस बातको भुला दिया जाता है कि मनुष्य परिस्थितियोंमें परिवर्तन कर सकता और करता है और शिक्षकको स्वयं शिक्षित होनेकी आवश्यकता रहती है। ज्यों ही इस समस्याका समाधान होता है, इतिहासकी भौतिक धारणाका रहस्य खुल जाता है।' फायरवाख विचारप्रणालियोंके विकासका आधार मानवसत्ताके विकासको ही कहता है। 'मानवसत्ता क्या है' इसका उत्तर देते हुए वह कहता है कि 'मानवसत्ता मनुष्यके साथ मनुष्यके ऐक्यमें उनके परस्पर संयोगमें मिलती है।' मार्क्स कहता है 'सामाजिक सम्बन्धी समग्रता ही मानवसत्ता है।' पहलेमे इसमे स्पष्टता अधिक है । फायरवाखने पहले घोषणा की कि 'भूत मानस (ज्ञान) की उपज नहीं है, मानस ही भूतकी सर्वोत्कृष्ट उपज है।' उसने हेगेलके द्वन्द्ववादका

मा० श० ३—

३४ मार्क्सवाद और रामराज्य भी खण्डन किया था, पर मार्क्सने उसे ग्रहण कर ही अपना द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद बनाया । वह जगत्का असली रूप भूतको ही मानता है। जगत्के विचित्र एवं विभिन्न रूप एवं व्यापारभूतकी ही गतिके विभिन्न रूप हैं। इन व्यापारोंके आपसी सम्बन्ध गतिशील भूतके विकासके नियम हैं। इन्ही नियमोंके अनुसार जगत्का विकास होता है, इसे किसी विकासकर्ताकी आवश्यकता नही है । भूतप्रकृति जीवका अस्तित्व भी भूतके अंदर है । प्रथम भूत ही है, मन द्वितीय है, क्योकि यह भूतसे ही उत्पन्न होता है। उसके अनुसार मनन या चिन्तन-क्रिया भूतकी ही उपज है और भूत ही मस्तिष्कका रूप प्राप्त कर चुका है । एञ्जिल्सके शब्दोंमें 'भौतिक अस्तित्व, मनन, प्रकृति और जीवात्माके अस्तित्वका प्रश्न ही दर्शनशास्त्रका मुख्य प्रश्न है। आदर्शवादी जीवात्माको पहले मानते हैं, भौतिकवादी प्रकृतिको । मार्क्स कहता है—'जो भूत चिन्तन करता है उस भूतसे चिन्तनको पृथक् नहीं किया जा सकता । जो ज्ञान प्रयोग एवं अनुभवद्वारा व्याप्त है वही वास्तविक ज्ञान है। इसको बाह्य जगत्से मिलाकर जाँचा जा सकता है। जगत्मे कोई अज्ञेय वस्तु नहीं है। जगत् और उसके नियम पूर्णरूपसे जाने जा सकते हैं। यह बात अलग है कि अभी हम पूर्ण- रूपसे नहीं जानते ।' उपर्युक्त बातोपर विचार करनेसे मालूम होता है कि यह भी अनुमान है कि मनुष्य सब संसार एवं उसके नियमोंको जान सकेगा; क्योकि अभीतक सम्पूर्ण जगत्की तो बात ही क्या, एक सूर्यके ही अंदर कितने तत्त्व हैं, इसीका पूरा अन्वेषण नहीं हुआ । एक कोयला या मिट्टीके तेलमें या एक परमाणुमे कितनी शक्तियाँ हैं, इसका भी परिज्ञान पूरा नहीं हुआ । विज्ञानके बलसे आज वैज्ञानिक एक वस्तुको जाननेका दावा करता है, कुछ दिन बाद उसे अपनी भूल भी मालूम पड़ती है। किसी चीजको आज किसी रोगपर लाभदायक समझा जाता है, कालान्तरमे ही उसे ही हानिकारक मान लिया जाता है । फिर स्वेतरसकलवस्तुप्रतियोगी घटको ही आजतक कौन जान सका है ? और आगे भी जाननेकी आशा कौन बुद्धिमान् कर सकता है ? किसी भी प्रयोग या यन्त्रसे कोई भी सम्पूर्ण प्रपञ्च एवं तद्गत विचित्रताको कैसे जान सकता है ? जैसे एक उदुम्बरके भीतर ही रहनेवाला नगण्य कीट बाहरकी वार्त्ताको नहीं जानता, उसी तरह एक क्षुद्र भूखण्ड तथा ब्रह्माण्डगोलकके भीतरका जन्तु सर्वज्ञ होनेका दावा करे, यह साहसमात्र है। एक तीक्ष्ण संखियाके स्वादका वैशिष्ट्य समझ लेनेके लिये लाखों जीवन समाप्त हो जाना भी पर्याप्त नहीं है, फिर उसके अन्य रस, वीर्य, गुण, विपाकादिको समझना चींटीद्वारा आकाश-परिवेष्टनकी कल्पना-जैसी बात है। एञ्जिल्सका यह कहना भी सही नहीं कि 'यदि हम अपनी किसी कल्पनाकी

े मनके व्यापारोंका बोध नहीं होता । मनसे तो मनका पता लग सकता है,`

  • 'व्यापारोंका': yes.

परंतु मन एव अह मत्रका भान जिससे होता है उसका बोध—भास्यभूत मन

  • Wait! Look at एव अह मत्रका? Let's look closely at line 16: परंतु मन एवं अह मत्रका? Wait! अहंकारका or अहंभावका or अहं प्रत्ययका? Let's zoom into line 16: परंतु मन एव अह मत्रका? Wait: परंतु मन एव -> एवं? There is no anusvara on एव? Or is it एवम्? It's एव. Then: अह -> is there anusvara? अहं? No, wait: Look at the letters: त्र का? Wait: अहंकारका? Let's look at the letters after मन: (or एवं) Then: म्? Wait: "मन एवं अहम् प्रत्यय का"? Look at the characters: म् प्र त्य `

३६ मार्क्सवाद और रामराज्य यदाकिञ्चिज्ज्ञोऽहं द्विप इव मदान्ध. सम्भवं तदा सर्वज्ञोऽस्मीत्यभवदवलिप्तं मम मन.। यदा किंचित् किंचिद् बुधजनसकाशादवगतं तदा मूर्खोऽस्मीति ज्वर इव मदो मे व्यपगत. ॥ ( नीतिशतक ८ ) अर्थात् जब मै अत्यन्त नासमझ था तब हाथीके समान मदान्ध होकर अपनेको सर्वज्ञ मानता था; किंतु जब बुधजनोके अनुग्रहसे कुछ समझने लगा, तब मुझे मालूम पडा कि मै तो निरा मूर्ख ही हूँ और तब ज्वरके समान मेरा सर्वज्ञताका मद भी उतर गया । अध्यात्मवादियोकी आज भी चुनौती है । सब वस्तुका ज्ञान तो दूर रहा, एक घटका भी सम्यक् ज्ञान कोई सिद्ध कर दे । वस्तुतः सत्त्वकी शुद्धतासे ज्ञानमे विशेषता आती है । उपासना एवं योगसे जितनी सत्त्वकी शुद्धता बढ़ती है, उतना ही ज्ञान बढता है । सर्वातिशायी सत्त्व-शुद्धि ईश्वरकी है, अतः पूर्ण सर्वज्ञ वही है । अन्योमें सर्वज्ञताकी कल्पना होती है, वस्तुतः सर्वज्ञता नही होती । इसी प्रकार भूत और मानसकी प्राथमिकताकी बात भी भौतिकवादियोकी भ्रमपूर्ण है । वस्तुतः भूतसे प्रथम अत्यन्ताबाध्य स्वप्रकाश सत्‌का अस्तित्व ही वेदान्त सिद्धान्त है । उसे भौतिकवादी भ्रमसे मानस कहते हैं । मनको तो अद्वैतवादी वेदान्ती भी भौतिक ही मानते हैं । प्रमाणाधीन प्रमेयकी सिद्धि होती है । बोधाधीन बोध्य तथा उसके व्यवहारकी सिद्धि होती है। सत्ता एव बोध बिना सब वस्तुएँ ही अस्तित्वहीन- होनेसे असत् ठहरेगी । फिर तत्स्वरूप बोध पहले कि भूत पहले ? मृत्तिका बिना घट रहता ही नही । घटके बाहर-भीतर मृत्तिका ही है । फिर मृत्तिका पहले या घट पहले ? इसका क्या उत्तर है ? घट न रहनेपर भी मृत्तिका उदंचनमें है ही । वैसे ही अस्तित्व एक वस्तुमें न सही दूसरी वस्तुमे बना ही रहता है । घटबुद्धि यद्यपि घटान्तरमें हो सकती है, तथापि पटमें घटबुद्धि नहीं होती; परन्तु सद्बुद्धि सबमें ही अनुवृत्त होती है । भूत परस्पर व्यावृत्त हैं, परन्तु सत् सर्वत्र अव्यावृत्त है । अतः जैसे व्यावृत्त पुष्पोसे अनुवृत्तसूत्रको पहले ही मानना पड़ेगा उसी तरह व्यावृत्त भूतोसे पहले ही सबमें अनुवृत्त सत् तथा तत्स्वरूप बोधको मानना अनिवार्य होगा । कोई प्रयोग, प्रयोक्ता एवं प्रयोगफल भी स्वप्रकाश सत्‌के बिना सिद्ध नहीं हो सकते । फिर बोधके प्रथम भूतको मानना सर्वथा ही निराधार है । वस्तुतः जैसे घटानुस्यूत मृत्तिका सामान्य ही घटविशेष रूपसे उपलब्ध होता है, कटक मुकुट आदिमे अनुस्यूत सुवर्ण सामान्य ही कटकादि सुवर्णविशेष रूपमें व्यक्त होता है, वैसे ही सर्वप्रपञ्चानुस्यूत सत्तासामान्य ही सद्विशेष प्रपञ्चके रूपमें उपलब्ध होता है । अतः वही सर्वप्रथम है ।

द्वितीय परिच्छेद पाश्चात्य राजनीति यूनानका राज्यदर्शन पाश्चात्य राजनीतिपर विचार करते समय सर्वप्रथम उसके प्राचीन यूनानी राज्यदर्शनपर विचारना पड़ता है । वहाँकी सबसे प्राचीन रचनाएँ होमरकृत महाकाव्य ‘इलियड’ तथा ‘ओडेसी’ हैं । इनका महाभारतके साथ इतना साम्य है कि सिकन्दरके सैनिकोंको भ्रम हो गया कि ‘कही महाभारत होमरकी रचनाओंका भारतीय संस्करण तो नहीं है ।’ उक्त महाकाव्यमें प्राप्त जीवनदर्शनके अनुसार राजाका स्वरूप सामने आता है । राजा न्यायकर्त्ता था, किंतु तभी जब कोई समस्या सार्वजनिक हितके लिये उठती अथवा कोई प्रपीड़ित व्यक्ति फरियाद लेकर राजद्वारपर आता । अन्यथा नरवधके मामले भी कुलपतियोंद्वारा सुलझा दिये जाते थे । राजा सैन्यशक्तिका प्रधान था । राजाकी स्थिति यद्यपि जनस्वीकृतिपर आधारित थी, फिर भी राजाका व्यक्तित्व उसके अधिकारप्रयोगमें अधिक महत्त्व रखता था । हेसियड अपने वर्तमानको निकृष्ट तथा अतीतको स्वर्ण-युग मानता था । उसका विश्वास था कि मानव-इतिहासका उपःकाल अत्यन्त सुखमय था । क्रमशः दुःखकी वृद्धि मानववर्गमें होती गयी, जिससे स्वर्णके बाद रौप्य (चाँदी) युग आया । इसके बाद ताम्रयुग तथा अन्तमे लौहयुग आया। अपने समयको वह लौहयुग मानता था। प्लूटार्कने अपोलोके सात सतोंका उल्लेख किया है, किंतु अर्नस्ट वार्करके अनुसार इनमें केवल सोलन नामक सत ही ऐतिहासिक है । सोलनने सामाजिक तथा राजनैतिक जीवनमें महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किये । उसका प्रमुख आधार न्याय एव दण्ड था । वह एक ही साथ निर्धनोंका मित्र तथा धनवानोंका रक्षक था । उसका युग शोषणका युग था । उसके लिये उसने केवल वैधानिक राज्यकी ही स्थापना नहीं की, अपितु कार्यकारिणीकी अपेक्षा न्यायकी उच्चता एव राजसत्ताका आधार जनसत्तामें स्थापित किया । तथापि उसका जनतन्त्र न्यायकी सीमाके अदर ही था । सीधे-सीधे राज्यकी नीति तथा सचालनमे जनताको कोई अधिकार नहीं था । जनता इस बातका ध्यान रख सकती थी कि ‘स्वीकृत नियमो तथा परम्पराके अनुसार ही वह शासित हो रही है ।’ साफिस्टोंके पूर्व, उपर्युक्त दार्शनिकोंके अतिरिक्त, आयोनियाके भौतिक- वादी दार्शनिकोंका भी महत्त्वपूर्ण स्थान है । वस्तुतः यूनान विषमताओंका पुञ्ज था । एक ओर गणतन्त्रीय राज्यसघ तथा दूसरी ओर मेसेडोनियाका विशाल साम्राज्य । एक ओर हेराक्लीटसका पदार्थ-परिवर्तनवाद और दूसरी ओर परमेनाईडीजके द्वारा उसका खण्डन । ये सब विरोधी भाव साथ ही चल रहे थे ।

३८ मार्क्सवाद और रामराज्य इसी प्रकार यूनानमें जिस समय डायनीशसका परिष्कृतरूप आरफ्यूसवाद बनकर जनप्रिय हो रहा था, उसी समय आयोनियामें उसका विरोधी पक्ष भी उपस्थित हो गया था । यह नवीन विचारधारा अपने उद्गम आयोनियासे पेरिकिल्सके समयमें अनेक्सागोरसद्वारा एथेन्स लायी गयी थी । इस दार्शनिक विचारकी उत्पत्तिका कारण वार्करके अनुसार 'पूर्वका प्रभाव' है । हेराक्लीटसका सर्वव्यापक तत्त्व अग्नि, जल थे । जिस प्रकार उसके दर्शनमे अग्नि, जल तथा उष्ण एव शीतकी धारणाएँ थी, उसी प्रकार समाजके क्षेत्रमें वह ऊँच-नीचका विचार मानता था । वह शुष्क एव अग्निप्रधान व्यक्तिको श्रेष्ठ, गीले एव जलप्रधान व्यक्तिको नीच मानता था । आयोनियाके अन्य दार्शनिकोंकी भाँति पिथागोरस भी अनेक रूपात्मक जगत्में एक तत्त्वकी व्यापकता मानता था । किंतु उसका एक तत्त्व अग्नि तथा जल आदिसे अधिक सूक्ष्म 'संख्या' था । 'संख्या' के अस्तित्वमें स्थान (अवकाश) भी सम्मिलित है । इस प्रकार ससारकी प्रत्येक वस्तुका सार सख्या ही है । पिथागोरसके मतसे 'समस्त प्राणियोंकी आत्मा समान है तथा 'जन्मचक्र' मे एक मनुष्यकी आत्मा अगले या पिछले जन्ममे कुत्ते, हाथी या किसी जन्तुके देहमें भी हो सकती है । 'जन्म-चक्र' से मुक्ति पानेके लिये साधना और सस्कार अपेक्षित हैं । साथ ही ज्ञानकी महत्ता सर्वाधिक है ।' प्लेटो (अफलातून) प्लेटोके दर्शनमे दो पक्ष है- आदर्श तथा वास्तविक । अपने समयके स्वरूप अध्ययन करनेके बाद वह इस निष्कर्षपर पहुँचा कि 'लोग पतनशील हैं।' उसने एक आदर्श राज्यका चित्रण 'रिपब्लिक' नामक ग्रन्थमे किया, किंतु वह अमानवीय हो गया । इसके अनुसार इस आदर्शके निकट जितना ही पहुँचा जायगा उतना ही कल्याण होगा । इस प्रकार वह आदर्शवादका जन्मदाता माना जाता है । कहा जाता है कि साम्यवाद तथा फासीवादका मूल प्लेटोके दर्शनमें ही था । वह कहता है 'अच्छे राज्य और अच्छे नागरिकका तात्पर्य एक ही है; क्योंकि आदर्श राज्यके बिना आदर्श व्यक्ति सम्भव नही । इसी प्रकार आदर्श राज्य भी आदर्श व्यक्तिके बिना सम्भव नही । आदर्श नागरिकका विस्तृत प्रतिबिम्ब आदर्श राज्य है । वह अपने गुरु सुकरातके वाक्य 'सद्गुण ज्ञान है' का कायल था । अतः राज्यमे वह सद्गुणका प्राधान्य मानता था । उसके युगमे तीन वर्ग थे- संरक्षक, सहायक-संरक्षक तथा कृषक-वर्ग । उनको वह ज्ञान (स्वर्ण), मान (चाँदी) तथा वासना (लोहा) मानता था । इन्हींको वह शरीरकी तीन विशेषताएँ भी मानता था ।

सद्गुणी जीवनकी स्थापनाके लिये वह साम्यवादकी स्थापना करना चाहता था। साम्यवादी राज्यमें वह सामान्य सम्पत्तिका पक्षपाती था। 'प्लेटो जब वास्तविक स्वरूपपर आता है, तब वैयक्तिक सम्पत्ति, परिवार-नियम-प्राधान्य कुछ अंशमें मानने लगता है। उसके अनुसार स्त्री-पुरुषके स्थायी (जीवनपर्यन्त) समागममे लोलुपता बढ़ती है। बालकोंकी देख-रेखका उत्तरदायित्व राज्यपर माना गया, क्योंकि आदर्श राज्यमें ही आदर्श नागरिककी स्थापना हो सकेगी। वह स्त्रियोंको घरकी सीमासे बाहर नागरिक जीवनतक ले आया। उसने उनके समानाधिकारकी स्थापना की।

उसने आदर्श स्थितिके लिये आदर्श शिक्षाकी आवश्यकता बतलायी। उसके मतानुसार '१८ वर्षतक शिक्षा, व्यायाम आवश्यक है, क्योकि इससे धैर्य, सहनशीलता तथा मनपर प्रभाव पड़ता है। इसी बीच संगीतका भी अध्ययन होना चाहिये, क्योंकि इनके द्वारा मनपर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता तथा आत्मसयम बढ़ता है। १८ से २० वर्षतक सैनिकशिक्षा, २० से ३० वर्षतक बुद्धिगम्य विषय (गणित, तर्क, ज्योतिष), ३०-३५ वर्षतक दर्शन, ३५-५० वर्षतक समाज-सेवा तथा ५० वर्षके बाद सत्यप्राप्तिके लिये संन्यास, यही उसकी शिक्षाका क्रम था। ऐसी शिक्षासे ही व्यक्ति सद्गुणी बन सकता है।

उसकी राजनीतिका सार तत्त्व है—१-आदर्श राज्य, २-ज्ञानका प्राधान्य, ३-सद्गुणी राज्य, ४-सद्गुणी नागरिक, ५-शिक्षा और ६-साम्यवाद। वह 'सामाजिक तथा आर्थिक' न्याय मानता था। उसके अनुसार 'व्यक्ति योग्यतानुसार कार्य करे और वह वस्तु ले जिसे वह लेनेके योग्य हो। उसे अन्य कामोंमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये। न्याय जीवनका क्रम है। न्यायकी विशाल धारामें समस्त जीवन ही आ जाता है।'

अरस्तू

यह यथार्थवादी दार्शनिक था। अपने युगके लगभग १५० संविधानोंका अध्ययन करके इसने 'पालिटिक्स' नामक ग्रन्थ लिखा था। इसने प्लेटोकी आगमन- पद्धतिके स्थानपर निगमन-पद्धतिको स्वीकार किया। इसके अनुसार अध्ययनके बाद आदर्शकी स्थापना करनी चाहिये। उसने राजनीतिक तथा आर्थिक दो पक्षोंसे अध्ययन कर राज्योको छः भागोंमें बाँटा। राजतन्त्र, उच्चजनतन्त्र, लोकहिताय जनवादको वह प्राकृतरूपमे मानता था। अत्याचार, सामन्ततन्त्र तथा जनवाद (डेमोक्रेसी) को उनका विकृतरूप मानता था। इस प्रकार नियमनिर्धारण तथा संविधानोंका वर्गीकरण -- ये दो देने उसकी हुईं। तीसरी देन उसकी 'शक्ति-

पृथकीकरण है। इसके अनुसार व्यवस्थापन, शासन तथा न्याय—इन तीनोको उसने अलग किया । ४-प्लेटोने विवेकको प्रधान माना था । यद्यपि आगे चलकर उसने भी नियमपर जोर दिया, किंतु अरस्तूने नियमका ही प्राधान्य माना है, जिनमे परम्परागत तथा नैसर्गिक नियम मुख्य है । सत्ताधारीको इनके अधीन होना चाहिये । ५-आदर्श राज्य वह है, जिसमे मध्यम मार्गीय व्यवस्था हो—न ज्यादा गरीब न ज्यादा अमीर । प्लेटोने ५०४० व्यक्तियोके राज्यको आदर्श राज्य माना था, किंतु अरस्तूने माना कि आदर्श राज्यमें गुणात्मक तथा मात्रात्मक दोनोका संतुलन होना चाहिये । ६-राजनीति शास्त्रको इसने धर्मसे स्वतन्त्र किया, जब कि प्लेटोने आचार-शास्त्रपर आधारित राजनीतिका ही श्रेष्ठ तथा उपयुक्त माना था । उसके अनुसार सद्गुणी नागरिकके लिये सद्गुणी शासन आवश्यक था । अरस्तूने राजनीतिकी प्रधानता दी; यद्यपि उसका भी लक्ष्य आदर्श नागरिक निर्माण ही था । वह राजनीतिको शास्त्र ही नही, कला भी मानता था । उसके अनुसार 'राजनीति शास्त्र' उसे कहते है ‘जो राजनीतिक बन्धनके आधारका विश्लेषण करे ।' वैय

अफलातून और अरस्तू दोनोंने इस बातपर जोर दिया था कि राज्य और व्यक्तिमे किसी प्रकारकी विभिन्नता न थी, दोनों एक ही थे । कुछ तार्किकोंने इसपर जोर दिया था कि 'राज्य और व्यष्टिके स्वार्थमे विभिन्नता थी' और कुछने इस बातपर कि 'राज्यकी उत्पत्ति समझौताद्वारा हुई थी।' अफलातूनने प्रथम पक्षके तार्किकोंको यह उत्तर दिया था कि राज्य व्यक्तिका बृहत्तम रूप था और व्यक्ति राज्यका सूक्ष्मरूप । इस प्रकार दोनोंके स्वार्थोंमें किसीका विरोध न था । अरस्तूने दूसरे वर्गके तार्किकोंको यह उत्तर दिया कि 'राज्य एक प्राकृतिक संस्था है, जिसका सावयवीकी भाँति क्रमशः विकास हुआ है।' दोनों विचारक राज्यकी आवश्यकताको स्वीकार करते थे । अरस्तूके मतानुक्ल यदि कोई व्यक्ति राज्यके बिना रह सकता था, तो वह या तो देवता था या दानव । अफलातूनके विचारोंमें नीतिशास्त्रोंकी प्रधानता थी । अरस्तू अफलातूनकी भाँति क्रान्तिकारी नहीं था । उसके राज्यमें राजनीति, नीतिशास्त्र और अर्थशास्त्र--तीनोंका समन्वय इस प्रकार किया गया था कि मनुष्य सुखमय जीवनको प्राप्त कर सके । यूनानी विचारकोंने मध्यवर्ती मार्गका प्रतिपादन बड़े प्रभावशाली ढंगसे किया था। इसका आरम्भ डेल्फीकी देववाणियोंसे हुआ और सोलनके सुधारोंमे यह कार्यरूपमें परिणत किया गया । अरस्तू और अफलातूनने भी इस सिद्धान्तका अनुसरण किया । अफलातून और अरस्तू दोनों अपने समयके राज्योंसे सन्तुष्ट न थे । अतः उन्होंने ऐसे राज्योंका चित्रण किया, जिनके अनुरूप वे वास्तविक राज्योको परिवर्तित करना चाहते थे । संरक्षकोंको निःस्वार्थसेवामें रत रखनेके लिये अफलातूनने आर्थिक और सामाजिक साम्यवादके सिद्धान्तका प्रतिपादन किया था । अरस्तू इसका विरोधी था । उसके मतसे 'मानसिक विकार, मानसिक ओषधियों- द्वारा ही दूर किये जा सकते हैं।' दोनो ही शिक्षाको राज्यके अधीन मानते थे। इस्टोइक दार्शनिकोंने समस्त मनुष्योंकी समानताके सिद्धान्तका प्रतिपादन किया था। यूनानी विचारक मनुष्यकी स्वतन्त्रताके समर्थक थे । राजनीतिक विचारोंमे रोमकी प्रमुख देन कानून है । उसका प्रभाव आज भी समस्त यूरोपपर छाया हुआ है । यूनानियोंका राजनीतिक आदर्श व्यक्ति और राष्ट्रकी स्वतन्त्रताका आदर्श था। रोमन लोगोने स्वतन्त्रताके स्थानपर व्यवस्थाके आदर्शको अपनाया । यूनानी लोग नगर-राज्योंकी ही सरकारोसे परिचित थे । उनमें शासको और शासितोका सम्पर्क था। इसके विपरीत रोमने एक विशाल साम्राज्यका निर्माण करके वहींसे उसका शासन-संचालन किया । यूनानियोंका दृष्टिकोण नगर-राज्योंकी सीमासे परिमित होनेके कारण संकुचित था । रोमन लोगोंने संसारके एक बडे भागकी राजनीतिक एकता स्थापित करके लोगोंके हृदयमें यह धारणा उत्पन्न कर दी थी कि समस्त संसारको एक ही सूत्रमें बाँधा जा सकता है ।

रोमन साम्राज्यके पश्चात् यूरोपीय इतिहासका मध्य-काल आरम्भ होता है। इसके दो भाग किये जाते हैं, पूर्वार्ध ( अंधकार-युग ) और उत्तरार्ध । पूर्वार्धमें रोमन लोगोंद्वारा निर्मित सड़कोंकी इतिश्री हो गयी थी। यूनानी और रोमन सभ्यताका अन्त-सा हो गया था। लोगोंमें आतङ्क छाया था। क्रमबद्ध राजनीतिक विचार नष्ट-से हो गये थे। संस्कृति और धर्मका भ्रष्ट स्वरूप सामने प्रस्तुत किया जा रहा था। ईसाइयोंका एक सम्प्रदाय बन चुका था। सारी उन्नति, आदर तथा सौहार्द सम्प्रदायतक ही सीमित था। परिणामस्वरूप धर्मसत्ता और राजसत्ताका संघर्ष प्रारम्भ हो गया। धर्म और संस्कृतिका वास्तविक स्वरूप न होनेसे राजसत्ता निरङ्कुश होकर आगे बढ़ी। तेरहवीं शताब्दीमें धार्मिक सत्ता पराकाष्ठाको पहुँच गयी थी । चौदहवीं शताब्दीके आरम्भमें उसके विरुद्ध प्रतिक्रिया प्रारम्भ हुई। राज्याधिकारियोंने पोपकी प्रधानताको अमनस्कतासे स्वीकार किया था। पोपोने आत्मबलके अभावमें अपना नाश स्वयं किया। सम्पत्तिके कारण तथा संयमके अभावमें उनमें विलासिताका प्रादुर्भाव हुआ। अरस्तूका बढ़ता हुआ प्रभाव भी धार्मिकताकी प्रधानताके विरुद्ध था। विवेक, बुद्धि तथा आत्मप्रेरणाकी उत्पत्तिसे धार्मिक विश्वास नष्ट हुए। राष्ट्रीय भावनाके उदयका प्रभाव भी धार्मिक सत्ताकी प्रधानताके प्रतिकूल तथा राजकीय सत्ताकी प्रधानताके अनुकूल था। फ्रांसके धर्माधिकारियोंतकने धार्मिक भावनाकी अपेक्षा राष्ट्रीय भावनाको उच्चतर समझा और पोपके आदेशोंकी अवज्ञा करके राजाका साथ देने लगे। स्वयं ईसाईसंघमें कुछ ऐसे लोग थे जो पोपके अनियन्त्रित सत्ताके विरोधी हो गये थे। परिणाम यह हुआ कि राजनीतिपरसे धर्मका अङ्कुश समाप्त हो गया और धर्मविहीन लौकिक राजनीतिका उदय हुआ। इस लौकिक राजनीतिका स्वरूप-निर्धारण मेकियाविली जैसे कूटनीतिज्ञके हाथोंसे हुआ। मेकिया- विलीके युगमें विद्याका पुनर्जन्म तथा धार्मिक सुधारोंका प्रचार था। उसने पहले ही पक्षको ग्रहण किया। पुनर्जागरणके भी दो पक्ष होते हैं-एक स्वार्थवादी, जिसमें ईर्ष्या, स्पर्धा, स्वार्थ इत्यादिका प्राधान्य रहता है और दूसरा मानवतावादी, जिसमें सहिष्णुता, प्रेम और सहयोगका प्राधान्य रहता है। मेकियाविलीने इसके भी प्रथम पक्षको ही ग्रहण किया, क्योंकि उनके अनुसार 'मनुष्य स्वभावतः कृतघ्न, सनकी, धोखेबाज, भीरु और लालची होता है। वह स्वार्थमयी इच्छाओंकी पूर्तिके लिये सतत प्रयत्नशील रहता है। उसे उसकी पूर्तिमें धर्म, अधर्म, नीति, अनीति किसीका विचार नहीं रहता। प्रेमका बन्धन तभीतक स्थिर रहता है, जबतक उससे स्वार्थकी पूर्ति होती है।' अरस्तूके विपरीत उसका कहना था कि 'मनुष्य सामाजिक जीवनमें नीच प्रकृतिका होता है। अपने स्वार्थोंकी पूर्तिके लिये ही वह सामाजिक समझौतोंका प्रयोग करता है।'

पाश्चात्य राजनीति ४३ मध्ययुगमें राजनीति और धर्ममें एकता थी । मेकियाविलीने उन दोनोंको अलग किया । धर्मके विषयमें उसका कहना था-'हमारे धर्मके अनुसार परमानन्द विनम्रता, तुच्छता और सांसारिक विरक्ततामें मिलती है। उनके स्थानपर रोमनचर्चने आत्माकी शान-शौकत, शरीरकी शक्ति और उन बातोंपर अधिक जोर दिया है, जो कि मनुष्यको दुर्बल बना देती हैं।' उसके अनुसार 'राज्यको धर्मकी आवश्यकता थी, किंतु इसी रूपमें कि वह राज्यके उद्देश्यकी पूर्ति करता रहे ।' उसका कहना था कि 'राजनीति और धर्मका पृथक्करण मनुष्यके स्वाभाविक जीवनके अनुकूल है।' उसके अनुसार 'समाज और तन्निर्भर राजाकी उत्पत्ति स्वार्थके साधनार्थ हुई है ।' उसका कहना था- 'वह राज्य जो स्थायित्वके आधारपर संगठित होता है, पतनोन्मुख हुए बिना नहीं रह सकता ।' राजाको उसने सलाह दी कि 'वह पुरुषार्थमें शेर और चालाकीमें लोमड़ीकी तरह व्यवहार करे ।' यद्यपि मेकियाविलीकी निन्दा उस समय लोगोंने की, किंतु समस्त यूरोपकी राजनीति उसके परामर्शानुसार ही संचालित होती रही । इसके बाद धार्मिक सुधारका युग आता है । मार्टिन लूथर तथा काल्विन इसके प्रमुख विचारक थे । इन्होंने नैतिकताकी स्थापना की, चेष्टा की, किंतु सुधार- का जो सबसे प्रमुख दोष होता है वह इनमें भी आया । सुधारवाद परिस्थिति सापेक्ष हुआ करता है, परिस्थितियोंके अनुसार उनमें परिवर्तन होते हैं; अतएव उसमें एकात्मकता कभी नहीं आती । लूथर और काल्विन दोनों ही लौकिक राजनीतिको नहीं चाहते थे, किंतु उनके अनुयायी आगे चलकर लौकिक नीतिके प्रतिष्ठापक बने । कारण यह था कि 'विचार-विशेषके विपरीत आचरण करनेवाले राज्य' का इन्होंने खण्डन किया था । फल यह हुआ कि इनका राजशक्तिसे संघर्ष हो गया । तब इन्होंने राजशक्तिको दैवीसिद्धान्तसे नीचे ले आनेवाले सिद्धान्तका प्रतिपादन किया । इसमें स्वभावतः लौकिक राजनीतिका प्रतिपादन हो गया । जानबोदाने राज्यकी आन्तरिक प्रभुताकी स्थापना की । बाह्य प्रभुताका स्पष्टीकरण ग्रोससके द्वारा हुआ । राजनीतिशास्त्रकी गतिमें इसने मध्ययुगीन तथा आगामी प्रवृत्तियोंका समन्वय करना चाहा । परिणाम यह हुआ कि इसमें स्वभावतः विरोध हो गया, फिर भी उसने राजनीतिशास्त्रके विकासमें बड़ा योग दिया । उसने जो कुछ कहा स्पष्ट तथा तर्कपूर्ण ढंगसे कहा । इससे वह एक शुद्ध राजनीतिक विचारक कहा जा सका । किंतु अन्तिम समयमें 'पालिटिक्स' में काम करनेके कारण दलीय राजनीतिको भी उसने दार्शनिक रूप देना चाहा । फलतः इनमें 'वदतोव्याघात' उत्पन्न हो गया । उसने इतिहासका विकासवादी सिद्धान्त सामने रक्खा । इसके पूर्व यह विश्वास था कि मनुष्य स्वर्णयुगसे पतनकी ओर अग्रसर हो रहा है । उसने

४४ मार्क्सवाद और रामराज्य राजनीतिक विचारकी स्थापनामें इतिहासको आधार माना । न्याय तथा नैतिक नियम ( मेकियाविलीसे भिन्न ) को राजनीतिका मूलतत्त्व स्वीकार किया । 'प्राकृतिक नियम' प्रत्येक सम्बन्धोंके आधार हैं। इन्हें उसने नैतिक नियमोंसे अभिन्न बताया और सर्वशक्तिमान् 'प्रभु' को भी इन नियमोंके अधीन माना । राज्यके उद्देश्यमें इन्हीं नैतिक नियमोंको स्वीकार किया। इसी नैतिक नियम तथा प्राकृतिक नियमकी प्रधानतामें आधुनिक व्यक्तिवादकी नींव थी। साथ ही उसकी प्रभुता नागरिकोंके ऊपर सर्वसत्तासम्पन्न नहीं थी, अपितु नैतिक, प्राकृतिक तथा कौटुम्बिक नियमोंसे बाध्य थी। उसने राज्य और सरकारका भेद सामने रखा । राज्य-प्रभुता राज्यकी विशेषता थी; किंतु उसका प्रयोग सरकारके द्वारा ही सम्भव माना। उसने सरकारके भेदोंका वर्णन किया। इतना सब होते हुए भी वह 'प्रयोगवादी' था। इसी आधारपर उसने राजनीति और इतिहासका गठबन्धन किया । इस गठबन्धनमें उसने नक्षत्र-विज्ञानका भी माध्यम लिया । फ्रांसकी धार्मिक असहिष्णुतामें उसने धार्मिक सहिष्णुताका बीजारोपण किया। कुटुम्बको राज्यका आधार माना और कुटुम्बका आधार अर्थको । इसीलिये उसने वैयक्तिक सम्पत्तिको मूलाधिकारके रूपमें स्वीकार किया, जो आजके व्यक्तिवादकी रीढ है । उसने 'प्रभुसत्ता' को धर्मसे अलग किया और उस प्रभुसत्ताको राज्यसे ऊपर माना । धर्म, अर्थ, सङ्गठन इत्यादि सबको राज्यके अंदर माना, साथ ही प्रभुसत्ताको कुटुम्बसे बाधित भी । जब उसने यह स्वीकार कर लिया कि नैतिक तथा प्राकृतिक नियमोंका व्याख्याता व्यक्ति है, तब तो उसकी प्रभुता व्यक्तिके नीचे आ गयी । इनमें असंगतियाँ अत्यन्त स्पष्ट हैं । आल्थूसियस—अपने पूर्वविचारकोंसे भी अधिक- सेक्युलर ( लोकायत ) था। वह जनताकी प्रभुसत्ताका दार्शनिक था। वह राज्यको एक क्रममें मानता था—अर्थात् कुटुम्ब, कारपोरेशन, कम्यून प्रान्त और उसके बाद राज्य; यह क्रम था । राज्यके बाद कुटुम्ब अधिक महत्त्व रखता था । पूर्ण ढाँचा लौकिक तथा स्पष्ट था । प्रत्येक क्रमके विकासका मूल (समझौता) था। उसने राज्यको जनताका सेवक माना । उसकी रायमें 'राज्यकी शक्ति सापेक्षमूलक थी । जनताने उसे कुछ कार्य दिये हैं, जिसे करना उसका कर्तव्य था। जनता किसी प्रकारसे बद्ध नहीं थी । शासक केवल मजिस्ट्रेटके रूपमें था। उसका अधिकार यदि कुछ था तो समझौतेसे ट्रस्टीके समान ही।' इसकी राजनीति-विश्लेषणकी सर्वप्रमुख विशेषता 'लौकिक- राजनीतिकी स्पष्ट स्थापना' थी । ग्रोशस—(१५८३—१६४५) अन्तर्राष्ट्रीय नियमका जन्मदाता था। सोलहवीं शताब्दी राजनीतिकी दृष्टिसे यदि फ्रांसकी थी तो सत्रहवीं शताब्दी इंग्लैण्डकी। ग्रोशसकी

पृष्ठभूमि वह युग था, जिसमें यूरोप अनेक धार्मिक मतमतान्तरोंमें विभक्त हो गया था। व्यवहारमें वह मेकियाविलीसे पूर्ण प्रभावित था। फिर भी वह मानवतावादी कहा जाता है। उसके अनुसार युगकी उद्दण्डताका कारण यह था कि 'मनुष्यने अपने सम्बन्धों, व्यवहारोंसे अध्यात्मवादको निकाल दिया था। उसने कहा कि 'पोप एक ऐसी तृतीय शक्ति थी जो कि नैतिकताका निर्माण करती थी। उसकी समाप्तिकी शून्यताको 'लौकिक नीति' पूर्ण कर रही है, अतएव अनैतिकताका विकास भी प्रारम्भ है। वस्तुतः उस शून्यको अन्तर्राष्ट्रीय नियमोंसे ही पूर्ण करना चाहिये। धार्मिक मतोंकी विभिन्नता तथा परस्पर विरोधके कारण प्राकृतिक नियमका एक स्तर नहीं रह गया। इसका परिणाम यह हुआ कि वह समाप्त ही हो गया।' इन मतमतान्तरोंसे बचनेके लिये ग्रोशसने ईसा-पूर्व युगमे अपने विचारोंका मूल रखा; क्योंकि उसके अनुसार वहाँपर एकताका सूत्र था। उसने अरस्तूके विचारोंका 'पुनर्जागरण काल' की विशेषताओंके प्रकाशमें विश्लेषण किया। प्रमाणस्वरूप अरस्तूने कहा था कि 'मनुष्य सामाजिक प्राणी है।' ग्रोशसके अनुसार यही प्राकृतिक नियमकी माँ है, क्योंकि जब वह एक साथ रहना चाहता है तो निश्चय ही प्राकृतिक नियमसे प्रभावित होगा और यह मनुष्य स्वभाव सम- झौता करनेके लिये बाध्य करेगा। यह समझौता सिविल लाकी उत्पत्तिका कारण होगा। मनुष्य स्वभावसे विवेकी है, इसीलिये वह समझौतेका आदर करता है। यह किसी भी शक्तिसे परिवर्तित नहीं हो सकता, क्योंकि यह प्रकृतिपर आधारित है। इसी प्राकृतिक नियमसे अन्तर्राष्ट्रीय नियमका विकास होता है। मनुष्य स्वभावसे श्रद्धा, न्याय, आदर इत्यादिका पालक है। उसके दैनिक कार्यक्रम कुछ समझौतोंपर व्यतीत होते हैं, जो कि प्राकृतिक हैं। हम दूसरोंका विश्वास करते हैं, सत्य बोलते हैं, यह सब उपयोगिताके कारण नहीं, बल्कि यह हमारा स्वभाव है। संसारमें प्रबल, निर्बल दोनोंकी सत्ता है। ऐसा इसलिये कि हम प्राकृतिक नियमका पालन करते हैं। अन्तर्राष्ट्रीय जगत्में श्रद्धा, विश्वासका प्रयोग होता है, यही अन्तर्राष्ट्रीय नियमके आधार हैं। यहाँतक कि युद्धके समयमें भी कुछ नियम उभयतः मान्य होते हैं। ग्रोशसका यह आन्तरिक विश्लेषण हाब्स, लाक तथा रूसो इत्यादि दार्शनिकोंके विश्लेषणका मूल आधार बना, क्योंकि वे सब पहले प्राकृतिक स्थितिका विवेचन प्रस्तुत करते हैं और पुनः उसीके आधारपर अपने सारे दर्शनकी आधारभित्ति निश्चित करते हैं।

आधुनिक विचार-धारा राज्यका जन्म और सामाजिक अनुबन्ध कहा जाता है कि 'सर्वप्रथम समझौता-सिद्धान्त' या 'अनुबन्ध-वाद' ही राजनीतिक सिद्धान्त था । इसीको 'सोशल कॉन्ट्राक्ट थ्योरी' कहा जाता है। प्रजाने परस्पर समझौतेसे एक व्यक्तिको अपने सब अधिकारोको शपथपूर्वक अर्पित किया । सामन्तो और किसानोका, सामन्तो तथा राजाओका एव राजाओ और सम्राट्का सम्बन्ध समझौतोपर आश्रित था । राजा अपने सामन्तोएव प्रजाके सम्मुख सच्चरित्रता, न्याय-परायणताकी शपथ लेता था । यह परम्परा अब भी है । १३ वीं शतीके एक्वानसका कहना था कि 'राज्यका जन्म-अधिकार एवं सचालन समझौतो या अनुबन्धोपर आश्रित है । प्रथम अनुबन्धसे ईश्वरने राजसत्ता या राज्यकी स्थापना की । द्वितीय अनुबन्धद्वारा जनताने राज्यका वैधानिकरूप निर्धारित किया । तीसरे अनुबन्धद्वारा राजाकी सत्ताको जन- इच्छापर आश्रित किया गया । यदि राजा इन अनुबन्धोका उल्लङ्घन करे, तो जनता उसे सिहासनच्युत करके दूसरा राजा बना सकती है। सुव्यवस्थाकी स्थापना ही राजाका मुख्य कार्य है । समाज सर्वोपरि है, शासन परिवर्तनीय ।' यह विचारधारा मध्य-युगकी है। कहा जाता है कि सोलहवीं शतीतक धर्मकी प्रधानता थी, अतः राज्यशासन भी धर्ममिश्रित था । राजा देवांश है, यह सिद्धान्त प्रचलित था । १६ वी शतीमें यूरोपमें दो धार्मिक सम्प्रदाय बने—एक परम्परावादी रोमन कैथोलिक और दूसरा प्रोटेस्टेण्ट । प्रोटेस्टेण्टसे प्यूरिटन, प्रेसबिटेरियन, ह्यूगेनोज आदि कई उपसम्प्रदाय बने । फ्रांसके ३६ वर्षव्यापी गृहयुद्धमे एक पक्ष था रोमन कैथोलिक पादरियो एव सामन्तोका और दूसरा ह्यूगेनोज व्यापारियो एवं कुछ सामन्तोका । पहला पक्ष राजभक्तिका उपदेश देता था ओर दूसरा राज्योत्पत्तिका श्रेय अनुबन्धोंको देता था । उसके अनुसार 'राजाकी सत्ता निरपेक्ष नहीं, किंतु अनुबन्धोपर आश्रित है ।' १७ वीं शतीमें ब्रिटेनमें गृहयुद्ध चला । इसमे एक पक्ष था निरपेक्ष राजतन्त्रीय लोगोंका और दूसरा संसद्-वादियोंका । पहला पक्ष राजाको ईश्वरका प्रतिनिधि मानता था । स्टूअर्ट नरेश जेम्स प्रथम इस सिद्धान्तका प्रसिद्ध दार्शनिक था । उसका एव उसके पुत्र चार्ल्स प्रथमका कहना था कि 'देवी प्रतिनिधि होनेके कारण राजाका प्रजाके जान-मालपर पूर्ण अधिकार है ।' संसद्-वादी पक्षमें व्यापारियो एवं मध्यम-वर्गका बहुमत था । यह पक्ष राजाकी सीमित सत्ता मानता था । राजा लौकिक नियमो एव ससदीय नियमोका उल्लङ्घन नहीं कर सकता । जनताकी परोक्ष या प्रत्यक्ष अनुमति बिना राजा व्यक्तिगत सम्पत्तिपर कर नहीं लगा सकता । ये लोग 'ह्यूगेनोज' के अनुबन्धोको

आधुनिक विचार-धारा ८७ अंशतः आधार मानते थे । उपर्युक्त पक्षामें अनुबन्धको धर्मसे स्वतन्त्र नहीं माना गया, परन्तु हॉब्स ने अनुबन्धवादको धर्मसे विमुक्त कर उसे राज्यशास्त्रीय रूप दिया । 'लॉक' एव 'रूसो' ने भी इसी सिद्धान्तको विभिन्न दृष्टिकोणोंमें अपनाया । हॉब्सने निरपेक्ष राजतन्त्र, लॉकने सीमित राजतन्त्र और रूसोने प्रत्यक्ष जनवादको न्यायसंगत बताया । थामस हॉब्स (१५८८-१६७९) ब्रिटेनके गृहयुद्धकाल (१६४२-४९) का दार्शनिक था । कहा जाता है कि उसकी माताने भयभीत होकर समयसे पहले उसे जन्म दिया था, इसलिये वह भयसे अत्यधिक प्रभावित रहता था । १६४० में इंग्लैण्डकी दीर्घ संसद्‌की बैठकके समय ब्रिटेनसे भागनेवालोंमें वह सर्वप्रथम व्यक्ति था । उस समय वहाँ राजनियम, राजसत्ता, नागरिकता सम्बन्धी विभिन्न विचार- धाराएँ प्रचलित थीं। राजसत्ताका प्रश्न मुख्य था। स्टुअर्ट आदिके मतानुसार 'राजा ईश्वरके प्रति उत्तरदायी है, नागरिकोंके प्रति नहीं' यह विचार राजाको निरपेक्ष सत्ताधारी बनाता है। संसद्वादियोंके मतानुसार 'राजसत्ता और राजा संसद्‌मे निहित है । राजाकी सत्ता सीमित है।' दार्शनिकोंके अनुसार 'नैसर्गिक नियम सर्वोपरि है । कोई भी संस्था उसका लङ्घन नहीं कर सकती।' जनतन्त्रवादियोंका कहना था कि 'आज्ञापालन अनुबन्धके पालनपर आश्रित है । राज्यका जन्म अनुबन्धके द्वारा हुआ है । यदि राजा अनुबन्धका लङ्घन करे तो नागरिक राज्यका विरोध कर सकते हैं।' कैथोलिकों और काल्विनिस्टोंके अनुसार 'धर्म सर्वश्रेष्ठ है, राज्य उसके अधीन है।' ये ही मतभेद गृहयुद्धकी पृष्ठभूमिमें थे । हॉब्सने अपने कालके सर्वश्रेष्ठ प्रश्न 'राजसत्ता कहाँ निहित है' का उत्तर दिया था। हॉब्स सुव्यवस्थाको परमावश्यक समझता था । चाहे वह नरेशद्वारा स्थापित हो, चाहे क्रामवेल (१५९९-१६५८)-जैसे शासकद्वारा। राज्यके पूर्वकी स्थितिको 'प्राकृतिक स्थिति' (दि स्टेट आफ नेचर) कहते हैं । जब कोई इंजन खराब हो जाता है तो मिस्त्री उसके कलपुर्जोंको पृथक् करता है । इस क्रमसे उसे इंजिनकी खराबी मालूम पड जाती है। खराबी दूर कर फिर वह कलपुर्जोको जोडता है । हॉब्सका कहना था कि 'मनुष्य समाज और मकानमें रहते हुए भी सन्दूकमें ताला क्यों लगाता है ? सोते समय दरवाजा क्यों बन्द करता है ? इसका स्पष्ट अर्थ है कि मनुष्य एक दूसरेके प्रति विश्वास नहीं रखता । फिर जब राज्यव्यवस्थामें यह हालत है तब प्राकृतिक स्थितिमें तो कहना ही क्या ?' वह मनुष्यको स्वभावसे स्वार्थी मानता था । मनुष्य सत्ताधारी शक्तिके द्वारा ही सहयोगी बनकर रह सकता है । इसलिये प्राकृतिक स्थितिमे मनुष्य अलग-अलग ही रहते थे । उस समय न कोई व्यवस्था थी, न कोई सत्ताधारी था ।