भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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द्वितीय परिच्छेद पाश्चात्य राजनीति यूनानका राज्यदर्शन पाश्चात्य राजनीतिपर विचार करते समय सर्वप्रथम उसके प्राचीन यूनानी राज्यदर्शनपर विचारना पड़ता है । वहाँकी सबसे प्राचीन रचनाएँ होमरकृत महाकाव्य ‘इलियड’ तथा ‘ओडेसी’ हैं । इनका महाभारतके साथ इतना साम्य है कि सिकन्दरके सैनिकोंको भ्रम हो गया कि ‘कही महाभारत होमरकी रचनाओंका भारतीय संस्करण तो नहीं है ।’ उक्त महाकाव्यमें प्राप्त जीवनदर्शनके अनुसार राजाका स्वरूप सामने आता है । राजा न्यायकर्त्ता था, किंतु तभी जब कोई समस्या सार्वजनिक हितके लिये उठती अथवा कोई प्रपीड़ित व्यक्ति फरियाद लेकर राजद्वारपर आता । अन्यथा नरवधके मामले भी कुलपतियोंद्वारा सुलझा दिये जाते थे । राजा सैन्यशक्तिका प्रधान था । राजाकी स्थिति यद्यपि जनस्वीकृतिपर आधारित थी, फिर भी राजाका व्यक्तित्व उसके अधिकारप्रयोगमें अधिक महत्त्व रखता था । हेसियड अपने वर्तमानको निकृष्ट तथा अतीतको स्वर्ण-युग मानता था । उसका विश्वास था कि मानव-इतिहासका उपःकाल अत्यन्त सुखमय था । क्रमशः दुःखकी वृद्धि मानववर्गमें होती गयी, जिससे स्वर्णके बाद रौप्य (चाँदी) युग आया । इसके बाद ताम्रयुग तथा अन्तमे लौहयुग आया। अपने समयको वह लौहयुग मानता था। प्लूटार्कने अपोलोके सात सतोंका उल्लेख किया है, किंतु अर्नस्ट वार्करके अनुसार इनमें केवल सोलन नामक सत ही ऐतिहासिक है । सोलनने सामाजिक तथा राजनैतिक जीवनमें महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किये । उसका प्रमुख आधार न्याय एव दण्ड था । वह एक ही साथ निर्धनोंका मित्र तथा धनवानोंका रक्षक था । उसका युग शोषणका युग था । उसके लिये उसने केवल वैधानिक राज्यकी ही स्थापना नहीं की, अपितु कार्यकारिणीकी अपेक्षा न्यायकी उच्चता एव राजसत्ताका आधार जनसत्तामें स्थापित किया । तथापि उसका जनतन्त्र न्यायकी सीमाके अदर ही था । सीधे-सीधे राज्यकी नीति तथा सचालनमे जनताको कोई अधिकार नहीं था । जनता इस बातका ध्यान रख सकती थी कि ‘स्वीकृत नियमो तथा परम्पराके अनुसार ही वह शासित हो रही है ।’ साफिस्टोंके पूर्व, उपर्युक्त दार्शनिकोंके अतिरिक्त, आयोनियाके भौतिक- वादी दार्शनिकोंका भी महत्त्वपूर्ण स्थान है । वस्तुतः यूनान विषमताओंका पुञ्ज था । एक ओर गणतन्त्रीय राज्यसघ तथा दूसरी ओर मेसेडोनियाका विशाल साम्राज्य । एक ओर हेराक्लीटसका पदार्थ-परिवर्तनवाद और दूसरी ओर परमेनाईडीजके द्वारा उसका खण्डन । ये सब विरोधी भाव साथ ही चल रहे थे ।