मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६ मार्क्सवाद और रामराज्य यदाकिञ्चिज्ज्ञोऽहं द्विप इव मदान्ध. सम्भवं तदा सर्वज्ञोऽस्मीत्यभवदवलिप्तं मम मन.। यदा किंचित् किंचिद् बुधजनसकाशादवगतं तदा मूर्खोऽस्मीति ज्वर इव मदो मे व्यपगत. ॥ ( नीतिशतक ८ ) अर्थात् जब मै अत्यन्त नासमझ था तब हाथीके समान मदान्ध होकर अपनेको सर्वज्ञ मानता था; किंतु जब बुधजनोके अनुग्रहसे कुछ समझने लगा, तब मुझे मालूम पडा कि मै तो निरा मूर्ख ही हूँ और तब ज्वरके समान मेरा सर्वज्ञताका मद भी उतर गया । अध्यात्मवादियोकी आज भी चुनौती है । सब वस्तुका ज्ञान तो दूर रहा, एक घटका भी सम्यक् ज्ञान कोई सिद्ध कर दे । वस्तुतः सत्त्वकी शुद्धतासे ज्ञानमे विशेषता आती है । उपासना एवं योगसे जितनी सत्त्वकी शुद्धता बढ़ती है, उतना ही ज्ञान बढता है । सर्वातिशायी सत्त्व-शुद्धि ईश्वरकी है, अतः पूर्ण सर्वज्ञ वही है । अन्योमें सर्वज्ञताकी कल्पना होती है, वस्तुतः सर्वज्ञता नही होती । इसी प्रकार भूत और मानसकी प्राथमिकताकी बात भी भौतिकवादियोकी भ्रमपूर्ण है । वस्तुतः भूतसे प्रथम अत्यन्ताबाध्य स्वप्रकाश सत्का अस्तित्व ही वेदान्त सिद्धान्त है । उसे भौतिकवादी भ्रमसे मानस कहते हैं । मनको तो अद्वैतवादी वेदान्ती भी भौतिक ही मानते हैं । प्रमाणाधीन प्रमेयकी सिद्धि होती है । बोधाधीन बोध्य तथा उसके व्यवहारकी सिद्धि होती है। सत्ता एव बोध बिना सब वस्तुएँ ही अस्तित्वहीन- होनेसे असत् ठहरेगी । फिर तत्स्वरूप बोध पहले कि भूत पहले ? मृत्तिका बिना घट रहता ही नही । घटके बाहर-भीतर मृत्तिका ही है । फिर मृत्तिका पहले या घट पहले ? इसका क्या उत्तर है ? घट न रहनेपर भी मृत्तिका उदंचनमें है ही । वैसे ही अस्तित्व एक वस्तुमें न सही दूसरी वस्तुमे बना ही रहता है । घटबुद्धि यद्यपि घटान्तरमें हो सकती है, तथापि पटमें घटबुद्धि नहीं होती; परन्तु सद्बुद्धि सबमें ही अनुवृत्त होती है । भूत परस्पर व्यावृत्त हैं, परन्तु सत् सर्वत्र अव्यावृत्त है । अतः जैसे व्यावृत्त पुष्पोसे अनुवृत्तसूत्रको पहले ही मानना पड़ेगा उसी तरह व्यावृत्त भूतोसे पहले ही सबमें अनुवृत्त सत् तथा तत्स्वरूप बोधको मानना अनिवार्य होगा । कोई प्रयोग, प्रयोक्ता एवं प्रयोगफल भी स्वप्रकाश सत्के बिना सिद्ध नहीं हो सकते । फिर बोधके प्रथम भूतको मानना सर्वथा ही निराधार है । वस्तुतः जैसे घटानुस्यूत मृत्तिका सामान्य ही घटविशेष रूपसे उपलब्ध होता है, कटक मुकुट आदिमे अनुस्यूत सुवर्ण सामान्य ही कटकादि सुवर्णविशेष रूपमें व्यक्त होता है, वैसे ही सर्वप्रपञ्चानुस्यूत सत्तासामान्य ही सद्विशेष प्रपञ्चके रूपमें उपलब्ध होता है । अतः वही सर्वप्रथम है ।