मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
DevanagariHindipublished866 पृष्ठ
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े मनके व्यापारोंका बोध नहीं होता । मनसे तो मनका पता लग सकता है,`
- 'व्यापारोंका': yes.
परंतु मन एव अह मत्रका भान जिससे होता है उसका बोध—भास्यभूत मन
- Wait! Look at
एव अह मत्रका? Let's look closely at line 16:परंतु मन एवं अह मत्रका? Wait!अहंकारकाorअहंभावकाorअहं प्रत्ययका? Let's zoom into line 16:परंतु मन एव अह मत्रका? Wait:परंतु मन एव->एवं? There is no anusvara onएव? Or is itएवम्? It'sएव. Then:अह-> is there anusvara?अहं? No, wait: Look at the letters:अहमत्रका? Wait:अहंकारका? Let's look at the letters afterमन:एव(orएवं) Then:अहम्? Wait: "मन एवं अहम् प्रत्यय का"? Look at the characters:अहम्प्रत्य`