भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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३४ मार्क्सवाद और रामराज्य भी खण्डन किया था, पर मार्क्सने उसे ग्रहण कर ही अपना द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद बनाया । वह जगत्का असली रूप भूतको ही मानता है। जगत्के विचित्र एवं विभिन्न रूप एवं व्यापारभूतकी ही गतिके विभिन्न रूप हैं। इन व्यापारोंके आपसी सम्बन्ध गतिशील भूतके विकासके नियम हैं। इन्ही नियमोंके अनुसार जगत्का विकास होता है, इसे किसी विकासकर्ताकी आवश्यकता नही है । भूतप्रकृति जीवका अस्तित्व भी भूतके अंदर है । प्रथम भूत ही है, मन द्वितीय है, क्योकि यह भूतसे ही उत्पन्न होता है। उसके अनुसार मनन या चिन्तन-क्रिया भूतकी ही उपज है और भूत ही मस्तिष्कका रूप प्राप्त कर चुका है । एञ्जिल्सके शब्दोंमें 'भौतिक अस्तित्व, मनन, प्रकृति और जीवात्माके अस्तित्वका प्रश्न ही दर्शनशास्त्रका मुख्य प्रश्न है। आदर्शवादी जीवात्माको पहले मानते हैं, भौतिकवादी प्रकृतिको । मार्क्स कहता है—'जो भूत चिन्तन करता है उस भूतसे चिन्तनको पृथक् नहीं किया जा सकता । जो ज्ञान प्रयोग एवं अनुभवद्वारा व्याप्त है वही वास्तविक ज्ञान है। इसको बाह्य जगत्से मिलाकर जाँचा जा सकता है। जगत्मे कोई अज्ञेय वस्तु नहीं है। जगत् और उसके नियम पूर्णरूपसे जाने जा सकते हैं। यह बात अलग है कि अभी हम पूर्ण- रूपसे नहीं जानते ।' उपर्युक्त बातोपर विचार करनेसे मालूम होता है कि यह भी अनुमान है कि मनुष्य सब संसार एवं उसके नियमोंको जान सकेगा; क्योकि अभीतक सम्पूर्ण जगत्की तो बात ही क्या, एक सूर्यके ही अंदर कितने तत्त्व हैं, इसीका पूरा अन्वेषण नहीं हुआ । एक कोयला या मिट्टीके तेलमें या एक परमाणुमे कितनी शक्तियाँ हैं, इसका भी परिज्ञान पूरा नहीं हुआ । विज्ञानके बलसे आज वैज्ञानिक एक वस्तुको जाननेका दावा करता है, कुछ दिन बाद उसे अपनी भूल भी मालूम पड़ती है। किसी चीजको आज किसी रोगपर लाभदायक समझा जाता है, कालान्तरमे ही उसे ही हानिकारक मान लिया जाता है । फिर स्वेतरसकलवस्तुप्रतियोगी घटको ही आजतक कौन जान सका है ? और आगे भी जाननेकी आशा कौन बुद्धिमान् कर सकता है ? किसी भी प्रयोग या यन्त्रसे कोई भी सम्पूर्ण प्रपञ्च एवं तद्गत विचित्रताको कैसे जान सकता है ? जैसे एक उदुम्बरके भीतर ही रहनेवाला नगण्य कीट बाहरकी वार्त्ताको नहीं जानता, उसी तरह एक क्षुद्र भूखण्ड तथा ब्रह्माण्डगोलकके भीतरका जन्तु सर्वज्ञ होनेका दावा करे, यह साहसमात्र है। एक तीक्ष्ण संखियाके स्वादका वैशिष्ट्य समझ लेनेके लिये लाखों जीवन समाप्त हो जाना भी पर्याप्त नहीं है, फिर उसके अन्य रस, वीर्य, गुण, विपाकादिको समझना चींटीद्वारा आकाश-परिवेष्टनकी कल्पना-जैसी बात है। एञ्जिल्सका यह कहना भी सही नहीं कि 'यदि हम अपनी किसी कल्पनाकी