मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपाश्चात्त्य दर्शन ३३
है, विचार उसकी क्रिया है । विचार एव विरोधके अस्तित्वकी समस्याका यही हल है। प्रकृति या भूतोको दबाकर या मिथ्या कहकर समस्याका हल नहीं हो सकता ।' फायरवाखका कहना है कि 'यदि स्पिनोजाके सिद्धान्तमे धर्म विद्याका जंजाल निकाल दिया जाय तो मूलतः यह बहुत सही है।' कहते हैं, आदर्शवादसे नाता तोडनेके बाद पहले-पहल मार्क्स एवं एंजिल्सने इसी दर्शनको अपनाया था । फायरवाखका कहना था कि 'बाहरी वस्तुकी क्रियाका विषयमात्र बनकर मनुष्य उन वस्तुओंको पहचानता है' परंतु मार्क्सका कहना है कि 'वस्तुके ऊपर अपनी प्रति- क्रियाद्वारा हम उसकी पहचान करते हैं।' उपर्युक्त विद्वानोंके विचार भारतीय दर्शनोकी दृष्टिसे बहुत स्थूल हैं । विषयेन्द्रियमयोगजन्य सुख ही वास्तविक सुख नहीं है। अनश्वर सुख आत्मस्वरूप ही है । या तो दादके खुजलानेमे भी सुखकी प्रतीति होती है, पर क्या उसे कोई बुद्धिमान् सुख मान सकता है ? इसी तरह सूक्ष्म विवेचन बिना अस्तित्वयुक्त पदार्थको ही अस्तित्व मानकर उसके कर्ता एव विचारको कर्म मान लिया गया । अस्तित्व तो वह सूक्ष्म वस्तु है जो विचारमे भी अनुस्यूत है, जिस अस्तित्वके बिना देह एव देहान्तर्गत उसकी समग्रताके पूरक सभी असत् हो जाते हैं। सर्व विशेषणरहित अस्तित्व ही सर्वत्र समानरूपसे अनुस्यूत होनेके कारण सर्वबीज है, विचारकी सूक्ष्मता उससे अधिक सनिकट है। उसमें ही मैं और तुम सबका अन्तर्भाव हो जाता है । अवश्य ही बहिर्मुख प्राणीका 'मैं' की अपेक्षा 'तुम' अधिक स्पष्ट है। इसीलिये तो भाष्यकार शंकराचार्यने 'युष्मदस्मत्प्रत्ययगोचरयोः' इत्यादि रूपसे तुमसे ही विचार प्रारम्भ किया था । भौतिकवादियोके मै और तुम सभी शंकरके युष्मत्प्रत्ययगोचर ही ठहरते हैं, क्योंकि दृश्य अनात्ममात्र युष्मत्प्रत्ययगोचर होता है । निर्द्वयदृक् आत्मा ही अस्मत्प्रत्ययगोचर भाष्यकारको मान्य है । मार्क्सने फायरवाखके दर्शनपर टिप्पणी करते हुए लिखा है—'उस भौतिक सिद्धान्तमे जिसके अनुसार मनुष्य परिस्थितियों एव शिक्षाकी उपज कहा जाता है, इस बातको भुला दिया जाता है कि मनुष्य परिस्थितियोंमें परिवर्तन कर सकता और करता है और शिक्षकको स्वयं शिक्षित होनेकी आवश्यकता रहती है। ज्यों ही इस समस्याका समाधान होता है, इतिहासकी भौतिक धारणाका रहस्य खुल जाता है।' फायरवाख विचारप्रणालियोंके विकासका आधार मानवसत्ताके विकासको ही कहता है। 'मानवसत्ता क्या है' इसका उत्तर देते हुए वह कहता है कि 'मानवसत्ता मनुष्यके साथ मनुष्यके ऐक्यमें उनके परस्पर संयोगमें मिलती है।' मार्क्स कहता है 'सामाजिक सम्बन्धी समग्रता ही मानवसत्ता है।' पहलेमे इसमे स्पष्टता अधिक है । फायरवाखने पहले घोषणा की कि 'भूत मानस (ज्ञान) की उपज नहीं है, मानस ही भूतकी सर्वोत्कृष्ट उपज है।' उसने हेगेलके द्वन्द्ववादका
मा० श० ३—