भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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३२ मार्क्सवाद और रामराज्य कहता है 'मनुष्यमात्र सुख चाहता है । दुःखसे घबराता है । इसीलिये सुख-साधन भले तथा दुःख-साधन बुरे हैं। कोई सरकार ऐसा कष्ट नहीं उठाती जिससे उसकी प्रजाको न्याय, भलाई और ईमानदारीमे ही सुविधा मालूम हो । इसके विपरीत अन्यायी दोषी बननेके लिये प्रेरित किया जाता है । प्रकृतिने मनुष्यको बुरा नहीं बनाया । सामाजिक व्यवस्था ही इसके लिये जिम्मेदार है।' वाल्टेयरके मतानुसार 'समाज न्याय-अन्यायकी धारणा बिना नहीं रह सकता ।' किंतु हलवाश इसमे ईश्वरकी आवश्यकता नहीं समझता । 'न्याय, संयम, उपकार जीवनके लिये लाभदायक हैं, यह सभी समझ सकते हैं।' रूसो कहता है, 'फिर भी अपने सुखके लिये कोई मौतका सामना क्यो करेगा ? अतः ऐसे स्थलका स्वार्थ सामाजिक स्वार्थ ही समझा जाना चाहिये, व्यक्तिगत नहीं ।' १८ वीं शतीके भौतिकवादी समझते थे कि 'भूलसे ही मनुष्यको दुःख होता है, यदि मनुष्य अपने स्वभावपर कायम रहेगा तो सदा सुखी रहेगा।' सियरबेलके शङ्कावाद लङ्क, कन्डिलाक बर्क आदिके इन्द्रियानुभूतिवादसे भौतिकवादको बडा बल मिला, हल्वेशियसने भी बताया कि 'मनुष्यकी बुद्धिमे प्रकृतिगत समानता, विचारशक्ति तथा उद्योगकी उन्नतिमें एकता तथा पालन-पोषणकी महान् शक्ति स्वाभाविक गुण है।' इन सवसे समाजवादको बल मिला। सेंट साइमन लई तथा राबर्ट एडवर्ड लासाल आदिने समाजवादकी रूपरेखा व्यक्त की। यद्यपि ये सभी ईश्वर एवं धर्ममे विश्वास रखते थे। मार्क्स यद्यपि दार्शनिक विचारोमे हेगेलका शिष्य था तो भी उसका कहना था कि 'हेगेल सिरके बल खडा था । आज मै उसे पैरके बल खडा कर रहा हूँ।' हेगेल एव मार्क्सके बीच फायरबाखका दर्शन है। इसके कई अंशोको मार्क्स- ने ग्रहण किया, कईका खण्डन किया । बीटेने लिखा है-ईश्वर मेरा पहला विचार है, ज्ञान दूसरा तथा मनुष्य तीसरा और अन्तिम ।' इसपर फायरबाखने कहा है, 'आदर्शवाद एव भौतिकवादके झगड़ेका केन्द्र है मनुष्यका मस्तिष्क । मस्तिष्क किस प्रकारकी वस्तुसे बना है, यह मालूम हो जाय तब अन्य वस्तुओके सम्बन्धमे विचार स्पष्ट होते हैं।' उसका यह भी कहना है कि 'अस्तित्व कर्ता है और विचार क्रिया है। विचार अस्तित्वका कार्य है कारण नहीं । अस्तित्व स्वयं मूल है।' वह कहता है, 'आदर्शवादी दर्शनका आरम्भ ही गलत है। सच्चे दर्शनका आरम्भ केवल मैंसे न होकर मै और तुमसे होना चाहिये। यहाँसे विचार एवं पदार्थ तथा कर्ता एवं कर्मके सम्बन्धको ठीक रूपमें समझ सकते हैं। मै स्वयं अपने लिये मै हूँ परन्तु दूसरोंके लिये तुम । मै एक साथ कर्ता हूँ एव कर्म भी, मै अमूर्त्त- सत्ता नहीं। मेरा वास्तविक अस्तित्व है मेरा शरीर ही । अपने समग्ररूपमे मेरी वास्तविक सत्ता है । जो विचार करता है वह अमूर्त्त नही, भौतिक अस्तित्व ही कर्ता