भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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अन्तर्विरोधको द्वन्द्वमान मानकर कहता है 'यह क्रिया भूतकी ही है मनकी नहीं, मन- में तो भूतकी ही क्रिया प्रतिबिम्बित होती है।' परन्तु वेदान्त-मतानुसार विनाश या विध्वंसको अङ्कुरका कारण नहीं माना जाता, किंतु बीजके अवयव ही अङ्कुरके रूपमें परिणत या विवर्तित होते हैं क्योंकि कार्यमें बीजके अवयवोंका ही अन्वय दिखायी देता है। अतः विनाश या विध्वंस विकासका कारण नहीं, इसके अतिरिक्त कारण ब्रह्म कार्यरूपमें परिणत होनेपर भी अविकृत मुक्तोपसृप्य ब्रह्म बना ही रहता है। आकाश, वायु आदि भी उन उन कार्योंके रूपमें परिणत होनेपर भी समाप्त नहीं हो जाते। उनका भी पृथक् अस्तित्व बना ही रहता है। इसके अतिरिक्त हेगेलके यहाँ इस सङ्घर्ष-क्रियाकी सीमा है। हर कार्यमें अन्तर्विरोध या सङ्घर्षसे उत्तम वस्तुका विकास नहीं होता, इसीलिये कोई कार्योंके विनाशसे कोई भी अच्छी चीज उत्पन्न नहीं होती। तभी लोग कार्यध्वंससे उद्विग्न होते हैं। वस्तुतः मार्क्सने हेगेलके द्वन्द्वमानका गलत अभिप्राय समझकर दुरुपयोग किया है। किसी कार्यमें भावरूप उसका उपादान कारण एवं रजके हलचलके साथ तमका अवष्टम्भ तथा सत्त्वका प्रकाश भी अपेक्षित होता है, इस तरह कार्योत्पत्तिमें आंगिक सङ्घर्षसे अधिक प्रकाश एवं अवष्टम्भका महत्त्वपूर्ण हाथ रहता है। हलवाश एवं हुवेलवैशियस अठारहवीं शताब्दीके भौतिकवादियोंके प्रतीक समझे जाते थे। हलवाशकी पुस्तक 'प्रकृति-विन्यास' है। उसका कहना है कि 'यदि सत्ताका अर्थ है सच्चा स्वरूप तो हमें वस्तुकी सत्ताका कोई ज्ञान नहीं। प्रत्यक्षावलो- कनसे तथा तज्जनित स्पन्दन और विचारोंसे हमें भूतका ज्ञान प्राप्त है। इन्द्रियोंके अनुसार विषमेच्छा—अच्छी या बुरी राय कायम करते हैं। उसकी प्रतिक्रियाके अनुसार उसके कुछ गुणोंका परिचय यद्यपि हमें मिलता है, फिर भी भूतकी सत्ता या सच्चे स्वरूपका ज्ञान नहीं होता। मनुष्य भूतोंका ही बना है। अतः भूतोंके अतिरिक्त उसका और कोई विचार नहीं है। अतः भूत ही विचारशक्ति-सम्पन्न है। अथवा भूतका परिणाम ही मनन शक्ति है।' पृथिवीके सम्बन्धमें उसका अनुमान है कि सम्भव है कि यह एक भूतपिण्ड है, जो किसी नक्षत्रसे विच्छिन्न हो गया होगा। अथवा सूर्यस्थित काले बिन्दुओंके विस्तारका ही परिणाम है अथवा बूझी हुई धूमकेतु होगी।' ऐसे ही वह मनुष्य- को भी प्रकृतिकी आकस्मिक उपज होनेकी कल्पना करता है। इस समयके दार्शनिक धर्मके विरोधी थे और बुद्धि एवं अनुभवपर प्रतिष्ठित नीतिके साथ धर्मके सम्बन्धको भयंकर समझते थे, क्योंकि धर्मको वे बुद्धिविरुद्ध एवं नैतिक शिक्षाको कमजोर बनानेवाला मानते थे। हलवाश वासनाको ही वासना-पूर्तिकी औषध समझता था। वह वासनाओंका दमन अनावश्यक समझता था। उसका