मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपस्थित होता है । अर्थात् कार्य-कारणभाव तो प्रत्यक्ष दृष्ट ही है । दृष्ट व्याघात इस शङ्काकी अवधि है । 'व्याघातावधिरशङ्का शङ्का तर्कावधिर्मतः ।' इस तरह अन्तिम परम सत्य परम संवादको वाद बनाना तथा अन्तिम कार्यरूप संवादको भी वाद बनाकर कार्यानन्तरकी कल्पना करना भी अनवस्था एव दृष्ट व्याघात-दोषसे दुष्ट है । यो तो हेगेलके द्वन्द्ववादको भी वाद बनाकर उसका भी ऐकात्म्यवादमे लय हो जानेकी कल्पना की ही जाती है । जब द्वन्द्ववादके आधारपर अधिनायकवाद, समष्टिवाद, भूतवाद और चेतनवाद-जैसे परस्पर विरुद्ध मत सिद्ध हो सकते हैं तब उसके बलपर तो किसी 'इदमित्थम्' सिद्धान्तका निर्णय असम्भवप्राय ही है । हेगेलके मतानुसार 'राज्य मानवकी सामाजिक प्रगतिकी चरम सीमा है ।' इसका अर्थ है कि 'वह संवाद आगे वाद नही बनेगा ।' परतु मार्क्सने उसे भी वाद बनाया ही । वह मजदूर-नायकत्व या समष्टिवादको चरम सवाद कहता है, परंतु रामराज्यवादी जड-चेतन दोनोको आध्यात्मिक सम्बन्धसे समन्वित करता है तथा राजतन्त्र-प्रजातन्त्र, व्यष्टि-समष्टि वित्तविभाग एव श्रमविभागको समन्वित करता है । इस तरह अध्यात्मवादपर आवृत धर्म-नियन्त्रित धर्मसापेक्ष पक्षपातविहीन शासन-तन्त्र राज्यको ही अन्तिम सवाद एव सामाजिक प्रगतिकी चरम सीमा मानता है । इस पक्षमे निश्चित : प्रत्यक्षानुमान, अपौरुषेय आगम आर्षशास्त्र एव परम्परा सभी अनुकूल है । भारतीय अध्यात्मवादमें समष्टि अनन्तकोटि ब्रह्माण्डात्मा कार्य-कारणातीत ब्रह्मका स्थूल रूप है । उसके भीतर समष्टि लिङ्गात्मा हिरण्यगर्भ सूक्ष्मरूप है । उसमे भी आन्तरसमष्टिकारणात्मा महाकारण ईश्वर है और सर्वान्तर सूक्ष्मतम कार्य- कारणातीत शुद्ध ब्रह्म है । महाविराट्की अपेक्षा भी हेगेलका विश्वात्मा बहुत स्थूल एव सकीर्ण है । मार्क्स दर्शन कार्लमार्क्सने (१८१८-८३) हेगेलके द्वन्द्वमानको भौतिकवादसे जोड लिया, परतु मार्क्स मानस या बोधको स्वयंविकास या विवर्त मानता है । इस प्रक्रियाका प्रथम अंग हे एक अविभाजित इकाई । यह इकाई दो विरोधी अगोमे विभाजित हो जाती है । पुन. इन विरोधोका समन्वय होकर एक नयी सम्बन्धित इकाईका जन्म होता है । इसी प्रकार सृष्टिका विकास होता रहता है । इन बातोंको ब्रह्मवादमें भी जोड़ा जा सकता है । अविभाजित ब्रह्मका भी दृक्-दृश्य, ज्ञान-ज्ञेयरूपमें विभाजन हुआ । पुनः दोनोंके समन्वयसे ही महदादि प्रपञ्चकी सृष्टि होती है । इसी तरह उत्तरोत्तर कारणका विभाजन, विध्वंस या समन्वयसे उत्तरोत्तर सृष्टि होती है । एक बीजमें धरणी, अनिल, जलके सम्पर्कसे उच्छूनावस्था (अङ्कुरोत्पत्तिके पहले बीजकी फूलनेकी अवस्था) होती है । फिर अन्तर्विरोधसे बीजका विध्वंस या विभाजन होता है, पुन' समन्वय होकर अङ्कुर उत्पन्न होता है । मार्क्स इसी