भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पाश्चात्त्य-दर्शन (पृष्ठ २९)

वस्तु नहीं। विचार या ज्ञान अखण्ड बोध ब्रह्मसे भिन्न नहीं है, इस दृष्टिसे वस्तु एव विचार सबका ही पर्यवसान अखण्ड बोधस्वरूप वस्तुमे ही होता है । हेगेलका अन्तर्विरोध या द्वन्द्वमानका अभिप्राय क्रमिक विवर्तके स्वरूपका ही विवेचन है । मूल वस्तु अखण्डबोध आन्तरिक वस्तु है । मन, विचार आदि उसके अति संनिहित है । अतः उनमे हलचल होनेसे ही विचारान्तर या वस्त्वन्तर उत्पन्न होते हे । विचार-सघर्षसे विरोधी विचारोमे सर्वबाध होनेके अनन्तर बाधाधिष्ठान परमार्थ वस्तुका बोध होता है । वही सब विरोधो, सब सघर्षोका अन्त हो जाता है । सुन्दोपसुन्दन्यायसे सत्कार्यवाद-असत्कार्यवाद दोनोके ही सांख्यो एव नैयायिकोद्वारा खण्डित हो जानेपर अनिर्वचनीयता एव विवर्तकी सिद्धि होती है । इसी तरह जैसे बीजमे अन्तर्विरोधद्वारा उसका विध्वस होता है तब अङ्कुरकी उत्पत्ति होती है, वैसे ही हर एक कारणमें अन्तर्विरोध होनेके बाद विध्वस या विकृति