भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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३८ मार्क्सवाद और रामराज्य इसी प्रकार यूनानमें जिस समय डायनीशसका परिष्कृतरूप आरफ्यूसवाद बनकर जनप्रिय हो रहा था, उसी समय आयोनियामें उसका विरोधी पक्ष भी उपस्थित हो गया था । यह नवीन विचारधारा अपने उद्गम आयोनियासे पेरिकिल्सके समयमें अनेक्सागोरसद्वारा एथेन्स लायी गयी थी । इस दार्शनिक विचारकी उत्पत्तिका कारण वार्करके अनुसार 'पूर्वका प्रभाव' है । हेराक्लीटसका सर्वव्यापक तत्त्व अग्नि, जल थे । जिस प्रकार उसके दर्शनमे अग्नि, जल तथा उष्ण एव शीतकी धारणाएँ थी, उसी प्रकार समाजके क्षेत्रमें वह ऊँच-नीचका विचार मानता था । वह शुष्क एव अग्निप्रधान व्यक्तिको श्रेष्ठ, गीले एव जलप्रधान व्यक्तिको नीच मानता था । आयोनियाके अन्य दार्शनिकोंकी भाँति पिथागोरस भी अनेक रूपात्मक जगत्में एक तत्त्वकी व्यापकता मानता था । किंतु उसका एक तत्त्व अग्नि तथा जल आदिसे अधिक सूक्ष्म 'संख्या' था । 'संख्या' के अस्तित्वमें स्थान (अवकाश) भी सम्मिलित है । इस प्रकार ससारकी प्रत्येक वस्तुका सार सख्या ही है । पिथागोरसके मतसे 'समस्त प्राणियोंकी आत्मा समान है तथा 'जन्मचक्र' मे एक मनुष्यकी आत्मा अगले या पिछले जन्ममे कुत्ते, हाथी या किसी जन्तुके देहमें भी हो सकती है । 'जन्म-चक्र' से मुक्ति पानेके लिये साधना और सस्कार अपेक्षित हैं । साथ ही ज्ञानकी महत्ता सर्वाधिक है ।' प्लेटो (अफलातून) प्लेटोके दर्शनमे दो पक्ष है- आदर्श तथा वास्तविक । अपने समयके स्वरूप अध्ययन करनेके बाद वह इस निष्कर्षपर पहुँचा कि 'लोग पतनशील हैं।' उसने एक आदर्श राज्यका चित्रण 'रिपब्लिक' नामक ग्रन्थमे किया, किंतु वह अमानवीय हो गया । इसके अनुसार इस आदर्शके निकट जितना ही पहुँचा जायगा उतना ही कल्याण होगा । इस प्रकार वह आदर्शवादका जन्मदाता माना जाता है । कहा जाता है कि साम्यवाद तथा फासीवादका मूल प्लेटोके दर्शनमें ही था । वह कहता है 'अच्छे राज्य और अच्छे नागरिकका तात्पर्य एक ही है; क्योंकि आदर्श राज्यके बिना आदर्श व्यक्ति सम्भव नही । इसी प्रकार आदर्श राज्य भी आदर्श व्यक्तिके बिना सम्भव नही । आदर्श नागरिकका विस्तृत प्रतिबिम्ब आदर्श राज्य है । वह अपने गुरु सुकरातके वाक्य 'सद्गुण ज्ञान है' का कायल था । अतः राज्यमे वह सद्गुणका प्राधान्य मानता था । उसके युगमे तीन वर्ग थे- संरक्षक, सहायक-संरक्षक तथा कृषक-वर्ग । उनको वह ज्ञान (स्वर्ण), मान (चाँदी) तथा वासना (लोहा) मानता था । इन्हींको वह शरीरकी तीन विशेषताएँ भी मानता था ।