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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

३८ मार्क्सवाद और रामराज्य इसी प्रकार यूनानमें जिस समय डायनीशसका परिष्कृतरूप आरफ्यूसवाद बनकर जनप्रिय हो रहा था, उसी समय आयोनियामें उसका विरोधी पक्ष भी उपस्थित हो गया था । यह नवीन विचारधारा अपने उद्गम आयोनियासे पेरिकिल्सके समयमें अनेक्सागोरसद्वारा एथेन्स लायी गयी थी । इस दार्शनिक विचारकी उत्पत्तिका कारण वार्करके अनुसार 'पूर्वका प्रभाव' है । हेराक्लीटसका सर्वव्यापक तत्त्व अग्नि, जल थे । जिस प्रकार उसके दर्शनमे अग्नि, जल तथा उष्ण एव शीतकी धारणाएँ थी, उसी प्रकार समाजके क्षेत्रमें वह ऊँच-नीचका विचार मानता था । वह शुष्क एव अग्निप्रधान व्यक्तिको श्रेष्ठ, गीले एव जलप्रधान व्यक्तिको नीच मानता था । आयोनियाके अन्य दार्शनिकोंकी भाँति पिथागोरस भी अनेक रूपात्मक जगत्में एक तत्त्वकी व्यापकता मानता था । किंतु उसका एक तत्त्व अग्नि तथा जल आदिसे अधिक सूक्ष्म 'संख्या' था । 'संख्या' के अस्तित्वमें स्थान (अवकाश) भी सम्मिलित है । इस प्रकार ससारकी प्रत्येक वस्तुका सार सख्या ही है । पिथागोरसके मतसे 'समस्त प्राणियोंकी आत्मा समान है तथा 'जन्मचक्र' मे एक मनुष्यकी आत्मा अगले या पिछले जन्ममे कुत्ते, हाथी या किसी जन्तुके देहमें भी हो सकती है । 'जन्म-चक्र' से मुक्ति पानेके लिये साधना और सस्कार अपेक्षित हैं । साथ ही ज्ञानकी महत्ता सर्वाधिक है ।' प्लेटो (अफलातून) प्लेटोके दर्शनमे दो पक्ष है- आदर्श तथा वास्तविक । अपने समयके स्वरूप अध्ययन करनेके बाद वह इस निष्कर्षपर पहुँचा कि 'लोग पतनशील हैं।' उसने एक आदर्श राज्यका चित्रण 'रिपब्लिक' नामक ग्रन्थमे किया, किंतु वह अमानवीय हो गया । इसके अनुसार इस आदर्शके निकट जितना ही पहुँचा जायगा उतना ही कल्याण होगा । इस प्रकार वह आदर्शवादका जन्मदाता माना जाता है । कहा जाता है कि साम्यवाद तथा फासीवादका मूल प्लेटोके दर्शनमें ही था । वह कहता है 'अच्छे राज्य और अच्छे नागरिकका तात्पर्य एक ही है; क्योंकि आदर्श राज्यके बिना आदर्श व्यक्ति सम्भव नही । इसी प्रकार आदर्श राज्य भी आदर्श व्यक्तिके बिना सम्भव नही । आदर्श नागरिकका विस्तृत प्रतिबिम्ब आदर्श राज्य है । वह अपने गुरु सुकरातके वाक्य 'सद्गुण ज्ञान है' का कायल था । अतः राज्यमे वह सद्गुणका प्राधान्य मानता था । उसके युगमे तीन वर्ग थे- संरक्षक, सहायक-संरक्षक तथा कृषक-वर्ग । उनको वह ज्ञान (स्वर्ण), मान (चाँदी) तथा वासना (लोहा) मानता था । इन्हींको वह शरीरकी तीन विशेषताएँ भी मानता था ।

सद्गुणी जीवनकी स्थापनाके लिये वह साम्यवादकी स्थापना करना चाहता था। साम्यवादी राज्यमें वह सामान्य सम्पत्तिका पक्षपाती था। 'प्लेटो जब वास्तविक स्वरूपपर आता है, तब वैयक्तिक सम्पत्ति, परिवार-नियम-प्राधान्य कुछ अंशमें मानने लगता है। उसके अनुसार स्त्री-पुरुषके स्थायी (जीवनपर्यन्त) समागममे लोलुपता बढ़ती है। बालकोंकी देख-रेखका उत्तरदायित्व राज्यपर माना गया, क्योंकि आदर्श राज्यमें ही आदर्श नागरिककी स्थापना हो सकेगी। वह स्त्रियोंको घरकी सीमासे बाहर नागरिक जीवनतक ले आया। उसने उनके समानाधिकारकी स्थापना की।

उसने आदर्श स्थितिके लिये आदर्श शिक्षाकी आवश्यकता बतलायी। उसके मतानुसार '१८ वर्षतक शिक्षा, व्यायाम आवश्यक है, क्योकि इससे धैर्य, सहनशीलता तथा मनपर प्रभाव पड़ता है। इसी बीच संगीतका भी अध्ययन होना चाहिये, क्योंकि इनके द्वारा मनपर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता तथा आत्मसयम बढ़ता है। १८ से २० वर्षतक सैनिकशिक्षा, २० से ३० वर्षतक बुद्धिगम्य विषय (गणित, तर्क, ज्योतिष), ३०-३५ वर्षतक दर्शन, ३५-५० वर्षतक समाज-सेवा तथा ५० वर्षके बाद सत्यप्राप्तिके लिये संन्यास, यही उसकी शिक्षाका क्रम था। ऐसी शिक्षासे ही व्यक्ति सद्गुणी बन सकता है।

उसकी राजनीतिका सार तत्त्व है—१-आदर्श राज्य, २-ज्ञानका प्राधान्य, ३-सद्गुणी राज्य, ४-सद्गुणी नागरिक, ५-शिक्षा और ६-साम्यवाद। वह 'सामाजिक तथा आर्थिक' न्याय मानता था। उसके अनुसार 'व्यक्ति योग्यतानुसार कार्य करे और वह वस्तु ले जिसे वह लेनेके योग्य हो। उसे अन्य कामोंमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये। न्याय जीवनका क्रम है। न्यायकी विशाल धारामें समस्त जीवन ही आ जाता है।'

अरस्तू

यह यथार्थवादी दार्शनिक था। अपने युगके लगभग १५० संविधानोंका अध्ययन करके इसने 'पालिटिक्स' नामक ग्रन्थ लिखा था। इसने प्लेटोकी आगमन- पद्धतिके स्थानपर निगमन-पद्धतिको स्वीकार किया। इसके अनुसार अध्ययनके बाद आदर्शकी स्थापना करनी चाहिये। उसने राजनीतिक तथा आर्थिक दो पक्षोंसे अध्ययन कर राज्योको छः भागोंमें बाँटा। राजतन्त्र, उच्चजनतन्त्र, लोकहिताय जनवादको वह प्राकृतरूपमे मानता था। अत्याचार, सामन्ततन्त्र तथा जनवाद (डेमोक्रेसी) को उनका विकृतरूप मानता था। इस प्रकार नियमनिर्धारण तथा संविधानोंका वर्गीकरण -- ये दो देने उसकी हुईं। तीसरी देन उसकी 'शक्ति-

पृथकीकरण है। इसके अनुसार व्यवस्थापन, शासन तथा न्याय—इन तीनोको उसने अलग किया । ४-प्लेटोने विवेकको प्रधान माना था । यद्यपि आगे चलकर उसने भी नियमपर जोर दिया, किंतु अरस्तूने नियमका ही प्राधान्य माना है, जिनमे परम्परागत तथा नैसर्गिक नियम मुख्य है । सत्ताधारीको इनके अधीन होना चाहिये । ५-आदर्श राज्य वह है, जिसमे मध्यम मार्गीय व्यवस्था हो—न ज्यादा गरीब न ज्यादा अमीर । प्लेटोने ५०४० व्यक्तियोके राज्यको आदर्श राज्य माना था, किंतु अरस्तूने माना कि आदर्श राज्यमें गुणात्मक तथा मात्रात्मक दोनोका संतुलन होना चाहिये । ६-राजनीति शास्त्रको इसने धर्मसे स्वतन्त्र किया, जब कि प्लेटोने आचार-शास्त्रपर आधारित राजनीतिका ही श्रेष्ठ तथा उपयुक्त माना था । उसके अनुसार सद्गुणी नागरिकके लिये सद्गुणी शासन आवश्यक था । अरस्तूने राजनीतिकी प्रधानता दी; यद्यपि उसका भी लक्ष्य आदर्श नागरिक निर्माण ही था । वह राजनीतिको शास्त्र ही नही, कला भी मानता था । उसके अनुसार 'राजनीति शास्त्र' उसे कहते है ‘जो राजनीतिक बन्धनके आधारका विश्लेषण करे ।' वैय

अफलातून और अरस्तू दोनोंने इस बातपर जोर दिया था कि राज्य और व्यक्तिमे किसी प्रकारकी विभिन्नता न थी, दोनों एक ही थे । कुछ तार्किकोंने इसपर जोर दिया था कि 'राज्य और व्यष्टिके स्वार्थमे विभिन्नता थी' और कुछने इस बातपर कि 'राज्यकी उत्पत्ति समझौताद्वारा हुई थी।' अफलातूनने प्रथम पक्षके तार्किकोंको यह उत्तर दिया था कि राज्य व्यक्तिका बृहत्तम रूप था और व्यक्ति राज्यका सूक्ष्मरूप । इस प्रकार दोनोंके स्वार्थोंमें किसीका विरोध न था । अरस्तूने दूसरे वर्गके तार्किकोंको यह उत्तर दिया कि 'राज्य एक प्राकृतिक संस्था है, जिसका सावयवीकी भाँति क्रमशः विकास हुआ है।' दोनों विचारक राज्यकी आवश्यकताको स्वीकार करते थे । अरस्तूके मतानुक्ल यदि कोई व्यक्ति राज्यके बिना रह सकता था, तो वह या तो देवता था या दानव । अफलातूनके विचारोंमें नीतिशास्त्रोंकी प्रधानता थी । अरस्तू अफलातूनकी भाँति क्रान्तिकारी नहीं था । उसके राज्यमें राजनीति, नीतिशास्त्र और अर्थशास्त्र--तीनोंका समन्वय इस प्रकार किया गया था कि मनुष्य सुखमय जीवनको प्राप्त कर सके । यूनानी विचारकोंने मध्यवर्ती मार्गका प्रतिपादन बड़े प्रभावशाली ढंगसे किया था। इसका आरम्भ डेल्फीकी देववाणियोंसे हुआ और सोलनके सुधारोंमे यह कार्यरूपमें परिणत किया गया । अरस्तू और अफलातूनने भी इस सिद्धान्तका अनुसरण किया । अफलातून और अरस्तू दोनों अपने समयके राज्योंसे सन्तुष्ट न थे । अतः उन्होंने ऐसे राज्योंका चित्रण किया, जिनके अनुरूप वे वास्तविक राज्योको परिवर्तित करना चाहते थे । संरक्षकोंको निःस्वार्थसेवामें रत रखनेके लिये अफलातूनने आर्थिक और सामाजिक साम्यवादके सिद्धान्तका प्रतिपादन किया था । अरस्तू इसका विरोधी था । उसके मतसे 'मानसिक विकार, मानसिक ओषधियों- द्वारा ही दूर किये जा सकते हैं।' दोनो ही शिक्षाको राज्यके अधीन मानते थे। इस्टोइक दार्शनिकोंने समस्त मनुष्योंकी समानताके सिद्धान्तका प्रतिपादन किया था। यूनानी विचारक मनुष्यकी स्वतन्त्रताके समर्थक थे । राजनीतिक विचारोंमे रोमकी प्रमुख देन कानून है । उसका प्रभाव आज भी समस्त यूरोपपर छाया हुआ है । यूनानियोंका राजनीतिक आदर्श व्यक्ति और राष्ट्रकी स्वतन्त्रताका आदर्श था। रोमन लोगोने स्वतन्त्रताके स्थानपर व्यवस्थाके आदर्शको अपनाया । यूनानी लोग नगर-राज्योंकी ही सरकारोसे परिचित थे । उनमें शासको और शासितोका सम्पर्क था। इसके विपरीत रोमने एक विशाल साम्राज्यका निर्माण करके वहींसे उसका शासन-संचालन किया । यूनानियोंका दृष्टिकोण नगर-राज्योंकी सीमासे परिमित होनेके कारण संकुचित था । रोमन लोगोंने संसारके एक बडे भागकी राजनीतिक एकता स्थापित करके लोगोंके हृदयमें यह धारणा उत्पन्न कर दी थी कि समस्त संसारको एक ही सूत्रमें बाँधा जा सकता है ।

रोमन साम्राज्यके पश्चात् यूरोपीय इतिहासका मध्य-काल आरम्भ होता है। इसके दो भाग किये जाते हैं, पूर्वार्ध ( अंधकार-युग ) और उत्तरार्ध । पूर्वार्धमें रोमन लोगोंद्वारा निर्मित सड़कोंकी इतिश्री हो गयी थी। यूनानी और रोमन सभ्यताका अन्त-सा हो गया था। लोगोंमें आतङ्क छाया था। क्रमबद्ध राजनीतिक विचार नष्ट-से हो गये थे। संस्कृति और धर्मका भ्रष्ट स्वरूप सामने प्रस्तुत किया जा रहा था। ईसाइयोंका एक सम्प्रदाय बन चुका था। सारी उन्नति, आदर तथा सौहार्द सम्प्रदायतक ही सीमित था। परिणामस्वरूप धर्मसत्ता और राजसत्ताका संघर्ष प्रारम्भ हो गया। धर्म और संस्कृतिका वास्तविक स्वरूप न होनेसे राजसत्ता निरङ्कुश होकर आगे बढ़ी। तेरहवीं शताब्दीमें धार्मिक सत्ता पराकाष्ठाको पहुँच गयी थी । चौदहवीं शताब्दीके आरम्भमें उसके विरुद्ध प्रतिक्रिया प्रारम्भ हुई। राज्याधिकारियोंने पोपकी प्रधानताको अमनस्कतासे स्वीकार किया था। पोपोने आत्मबलके अभावमें अपना नाश स्वयं किया। सम्पत्तिके कारण तथा संयमके अभावमें उनमें विलासिताका प्रादुर्भाव हुआ। अरस्तूका बढ़ता हुआ प्रभाव भी धार्मिकताकी प्रधानताके विरुद्ध था। विवेक, बुद्धि तथा आत्मप्रेरणाकी उत्पत्तिसे धार्मिक विश्वास नष्ट हुए। राष्ट्रीय भावनाके उदयका प्रभाव भी धार्मिक सत्ताकी प्रधानताके प्रतिकूल तथा राजकीय सत्ताकी प्रधानताके अनुकूल था। फ्रांसके धर्माधिकारियोंतकने धार्मिक भावनाकी अपेक्षा राष्ट्रीय भावनाको उच्चतर समझा और पोपके आदेशोंकी अवज्ञा करके राजाका साथ देने लगे। स्वयं ईसाईसंघमें कुछ ऐसे लोग थे जो पोपके अनियन्त्रित सत्ताके विरोधी हो गये थे। परिणाम यह हुआ कि राजनीतिपरसे धर्मका अङ्कुश समाप्त हो गया और धर्मविहीन लौकिक राजनीतिका उदय हुआ। इस लौकिक राजनीतिका स्वरूप-निर्धारण मेकियाविली जैसे कूटनीतिज्ञके हाथोंसे हुआ। मेकिया- विलीके युगमें विद्याका पुनर्जन्म तथा धार्मिक सुधारोंका प्रचार था। उसने पहले ही पक्षको ग्रहण किया। पुनर्जागरणके भी दो पक्ष होते हैं-एक स्वार्थवादी, जिसमें ईर्ष्या, स्पर्धा, स्वार्थ इत्यादिका प्राधान्य रहता है और दूसरा मानवतावादी, जिसमें सहिष्णुता, प्रेम और सहयोगका प्राधान्य रहता है। मेकियाविलीने इसके भी प्रथम पक्षको ही ग्रहण किया, क्योंकि उनके अनुसार 'मनुष्य स्वभावतः कृतघ्न, सनकी, धोखेबाज, भीरु और लालची होता है। वह स्वार्थमयी इच्छाओंकी पूर्तिके लिये सतत प्रयत्नशील रहता है। उसे उसकी पूर्तिमें धर्म, अधर्म, नीति, अनीति किसीका विचार नहीं रहता। प्रेमका बन्धन तभीतक स्थिर रहता है, जबतक उससे स्वार्थकी पूर्ति होती है।' अरस्तूके विपरीत उसका कहना था कि 'मनुष्य सामाजिक जीवनमें नीच प्रकृतिका होता है। अपने स्वार्थोंकी पूर्तिके लिये ही वह सामाजिक समझौतोंका प्रयोग करता है।'

पाश्चात्य राजनीति ४३ मध्ययुगमें राजनीति और धर्ममें एकता थी । मेकियाविलीने उन दोनोंको अलग किया । धर्मके विषयमें उसका कहना था-'हमारे धर्मके अनुसार परमानन्द विनम्रता, तुच्छता और सांसारिक विरक्ततामें मिलती है। उनके स्थानपर रोमनचर्चने आत्माकी शान-शौकत, शरीरकी शक्ति और उन बातोंपर अधिक जोर दिया है, जो कि मनुष्यको दुर्बल बना देती हैं।' उसके अनुसार 'राज्यको धर्मकी आवश्यकता थी, किंतु इसी रूपमें कि वह राज्यके उद्देश्यकी पूर्ति करता रहे ।' उसका कहना था कि 'राजनीति और धर्मका पृथक्करण मनुष्यके स्वाभाविक जीवनके अनुकूल है।' उसके अनुसार 'समाज और तन्निर्भर राजाकी उत्पत्ति स्वार्थके साधनार्थ हुई है ।' उसका कहना था- 'वह राज्य जो स्थायित्वके आधारपर संगठित होता है, पतनोन्मुख हुए बिना नहीं रह सकता ।' राजाको उसने सलाह दी कि 'वह पुरुषार्थमें शेर और चालाकीमें लोमड़ीकी तरह व्यवहार करे ।' यद्यपि मेकियाविलीकी निन्दा उस समय लोगोंने की, किंतु समस्त यूरोपकी राजनीति उसके परामर्शानुसार ही संचालित होती रही । इसके बाद धार्मिक सुधारका युग आता है । मार्टिन लूथर तथा काल्विन इसके प्रमुख विचारक थे । इन्होंने नैतिकताकी स्थापना की, चेष्टा की, किंतु सुधार- का जो सबसे प्रमुख दोष होता है वह इनमें भी आया । सुधारवाद परिस्थिति सापेक्ष हुआ करता है, परिस्थितियोंके अनुसार उनमें परिवर्तन होते हैं; अतएव उसमें एकात्मकता कभी नहीं आती । लूथर और काल्विन दोनों ही लौकिक राजनीतिको नहीं चाहते थे, किंतु उनके अनुयायी आगे चलकर लौकिक नीतिके प्रतिष्ठापक बने । कारण यह था कि 'विचार-विशेषके विपरीत आचरण करनेवाले राज्य' का इन्होंने खण्डन किया था । फल यह हुआ कि इनका राजशक्तिसे संघर्ष हो गया । तब इन्होंने राजशक्तिको दैवीसिद्धान्तसे नीचे ले आनेवाले सिद्धान्तका प्रतिपादन किया । इसमें स्वभावतः लौकिक राजनीतिका प्रतिपादन हो गया । जानबोदाने राज्यकी आन्तरिक प्रभुताकी स्थापना की । बाह्य प्रभुताका स्पष्टीकरण ग्रोससके द्वारा हुआ । राजनीतिशास्त्रकी गतिमें इसने मध्ययुगीन तथा आगामी प्रवृत्तियोंका समन्वय करना चाहा । परिणाम यह हुआ कि इसमें स्वभावतः विरोध हो गया, फिर भी उसने राजनीतिशास्त्रके विकासमें बड़ा योग दिया । उसने जो कुछ कहा स्पष्ट तथा तर्कपूर्ण ढंगसे कहा । इससे वह एक शुद्ध राजनीतिक विचारक कहा जा सका । किंतु अन्तिम समयमें 'पालिटिक्स' में काम करनेके कारण दलीय राजनीतिको भी उसने दार्शनिक रूप देना चाहा । फलतः इनमें 'वदतोव्याघात' उत्पन्न हो गया । उसने इतिहासका विकासवादी सिद्धान्त सामने रक्खा । इसके पूर्व यह विश्वास था कि मनुष्य स्वर्णयुगसे पतनकी ओर अग्रसर हो रहा है । उसने

४४ मार्क्सवाद और रामराज्य राजनीतिक विचारकी स्थापनामें इतिहासको आधार माना । न्याय तथा नैतिक नियम ( मेकियाविलीसे भिन्न ) को राजनीतिका मूलतत्त्व स्वीकार किया । 'प्राकृतिक नियम' प्रत्येक सम्बन्धोंके आधार हैं। इन्हें उसने नैतिक नियमोंसे अभिन्न बताया और सर्वशक्तिमान् 'प्रभु' को भी इन नियमोंके अधीन माना । राज्यके उद्देश्यमें इन्हीं नैतिक नियमोंको स्वीकार किया। इसी नैतिक नियम तथा प्राकृतिक नियमकी प्रधानतामें आधुनिक व्यक्तिवादकी नींव थी। साथ ही उसकी प्रभुता नागरिकोंके ऊपर सर्वसत्तासम्पन्न नहीं थी, अपितु नैतिक, प्राकृतिक तथा कौटुम्बिक नियमोंसे बाध्य थी। उसने राज्य और सरकारका भेद सामने रखा । राज्य-प्रभुता राज्यकी विशेषता थी; किंतु उसका प्रयोग सरकारके द्वारा ही सम्भव माना। उसने सरकारके भेदोंका वर्णन किया। इतना सब होते हुए भी वह 'प्रयोगवादी' था। इसी आधारपर उसने राजनीति और इतिहासका गठबन्धन किया । इस गठबन्धनमें उसने नक्षत्र-विज्ञानका भी माध्यम लिया । फ्रांसकी धार्मिक असहिष्णुतामें उसने धार्मिक सहिष्णुताका बीजारोपण किया। कुटुम्बको राज्यका आधार माना और कुटुम्बका आधार अर्थको । इसीलिये उसने वैयक्तिक सम्पत्तिको मूलाधिकारके रूपमें स्वीकार किया, जो आजके व्यक्तिवादकी रीढ है । उसने 'प्रभुसत्ता' को धर्मसे अलग किया और उस प्रभुसत्ताको राज्यसे ऊपर माना । धर्म, अर्थ, सङ्गठन इत्यादि सबको राज्यके अंदर माना, साथ ही प्रभुसत्ताको कुटुम्बसे बाधित भी । जब उसने यह स्वीकार कर लिया कि नैतिक तथा प्राकृतिक नियमोंका व्याख्याता व्यक्ति है, तब तो उसकी प्रभुता व्यक्तिके नीचे आ गयी । इनमें असंगतियाँ अत्यन्त स्पष्ट हैं । आल्थूसियस—अपने पूर्वविचारकोंसे भी अधिक- सेक्युलर ( लोकायत ) था। वह जनताकी प्रभुसत्ताका दार्शनिक था। वह राज्यको एक क्रममें मानता था—अर्थात् कुटुम्ब, कारपोरेशन, कम्यून प्रान्त और उसके बाद राज्य; यह क्रम था । राज्यके बाद कुटुम्ब अधिक महत्त्व रखता था । पूर्ण ढाँचा लौकिक तथा स्पष्ट था । प्रत्येक क्रमके विकासका मूल (समझौता) था। उसने राज्यको जनताका सेवक माना । उसकी रायमें 'राज्यकी शक्ति सापेक्षमूलक थी । जनताने उसे कुछ कार्य दिये हैं, जिसे करना उसका कर्तव्य था। जनता किसी प्रकारसे बद्ध नहीं थी । शासक केवल मजिस्ट्रेटके रूपमें था। उसका अधिकार यदि कुछ था तो समझौतेसे ट्रस्टीके समान ही।' इसकी राजनीति-विश्लेषणकी सर्वप्रमुख विशेषता 'लौकिक- राजनीतिकी स्पष्ट स्थापना' थी । ग्रोशस—(१५८३—१६४५) अन्तर्राष्ट्रीय नियमका जन्मदाता था। सोलहवीं शताब्दी राजनीतिकी दृष्टिसे यदि फ्रांसकी थी तो सत्रहवीं शताब्दी इंग्लैण्डकी। ग्रोशसकी

पृष्ठभूमि वह युग था, जिसमें यूरोप अनेक धार्मिक मतमतान्तरोंमें विभक्त हो गया था। व्यवहारमें वह मेकियाविलीसे पूर्ण प्रभावित था। फिर भी वह मानवतावादी कहा जाता है। उसके अनुसार युगकी उद्दण्डताका कारण यह था कि 'मनुष्यने अपने सम्बन्धों, व्यवहारोंसे अध्यात्मवादको निकाल दिया था। उसने कहा कि 'पोप एक ऐसी तृतीय शक्ति थी जो कि नैतिकताका निर्माण करती थी। उसकी समाप्तिकी शून्यताको 'लौकिक नीति' पूर्ण कर रही है, अतएव अनैतिकताका विकास भी प्रारम्भ है। वस्तुतः उस शून्यको अन्तर्राष्ट्रीय नियमोंसे ही पूर्ण करना चाहिये। धार्मिक मतोंकी विभिन्नता तथा परस्पर विरोधके कारण प्राकृतिक नियमका एक स्तर नहीं रह गया। इसका परिणाम यह हुआ कि वह समाप्त ही हो गया।' इन मतमतान्तरोंसे बचनेके लिये ग्रोशसने ईसा-पूर्व युगमे अपने विचारोंका मूल रखा; क्योंकि उसके अनुसार वहाँपर एकताका सूत्र था। उसने अरस्तूके विचारोंका 'पुनर्जागरण काल' की विशेषताओंके प्रकाशमें विश्लेषण किया। प्रमाणस्वरूप अरस्तूने कहा था कि 'मनुष्य सामाजिक प्राणी है।' ग्रोशसके अनुसार यही प्राकृतिक नियमकी माँ है, क्योंकि जब वह एक साथ रहना चाहता है तो निश्चय ही प्राकृतिक नियमसे प्रभावित होगा और यह मनुष्य स्वभाव सम- झौता करनेके लिये बाध्य करेगा। यह समझौता सिविल लाकी उत्पत्तिका कारण होगा। मनुष्य स्वभावसे विवेकी है, इसीलिये वह समझौतेका आदर करता है। यह किसी भी शक्तिसे परिवर्तित नहीं हो सकता, क्योंकि यह प्रकृतिपर आधारित है। इसी प्राकृतिक नियमसे अन्तर्राष्ट्रीय नियमका विकास होता है। मनुष्य स्वभावसे श्रद्धा, न्याय, आदर इत्यादिका पालक है। उसके दैनिक कार्यक्रम कुछ समझौतोंपर व्यतीत होते हैं, जो कि प्राकृतिक हैं। हम दूसरोंका विश्वास करते हैं, सत्य बोलते हैं, यह सब उपयोगिताके कारण नहीं, बल्कि यह हमारा स्वभाव है। संसारमें प्रबल, निर्बल दोनोंकी सत्ता है। ऐसा इसलिये कि हम प्राकृतिक नियमका पालन करते हैं। अन्तर्राष्ट्रीय जगत्में श्रद्धा, विश्वासका प्रयोग होता है, यही अन्तर्राष्ट्रीय नियमके आधार हैं। यहाँतक कि युद्धके समयमें भी कुछ नियम उभयतः मान्य होते हैं। ग्रोशसका यह आन्तरिक विश्लेषण हाब्स, लाक तथा रूसो इत्यादि दार्शनिकोंके विश्लेषणका मूल आधार बना, क्योंकि वे सब पहले प्राकृतिक स्थितिका विवेचन प्रस्तुत करते हैं और पुनः उसीके आधारपर अपने सारे दर्शनकी आधारभित्ति निश्चित करते हैं।

आधुनिक विचार-धारा राज्यका जन्म और सामाजिक अनुबन्ध कहा जाता है कि 'सर्वप्रथम समझौता-सिद्धान्त' या 'अनुबन्ध-वाद' ही राजनीतिक सिद्धान्त था । इसीको 'सोशल कॉन्ट्राक्ट थ्योरी' कहा जाता है। प्रजाने परस्पर समझौतेसे एक व्यक्तिको अपने सब अधिकारोको शपथपूर्वक अर्पित किया । सामन्तो और किसानोका, सामन्तो तथा राजाओका एव राजाओ और सम्राट्का सम्बन्ध समझौतोपर आश्रित था । राजा अपने सामन्तोएव प्रजाके सम्मुख सच्चरित्रता, न्याय-परायणताकी शपथ लेता था । यह परम्परा अब भी है । १३ वीं शतीके एक्वानसका कहना था कि 'राज्यका जन्म-अधिकार एवं सचालन समझौतो या अनुबन्धोपर आश्रित है । प्रथम अनुबन्धसे ईश्वरने राजसत्ता या राज्यकी स्थापना की । द्वितीय अनुबन्धद्वारा जनताने राज्यका वैधानिकरूप निर्धारित किया । तीसरे अनुबन्धद्वारा राजाकी सत्ताको जन- इच्छापर आश्रित किया गया । यदि राजा इन अनुबन्धोका उल्लङ्घन करे, तो जनता उसे सिहासनच्युत करके दूसरा राजा बना सकती है। सुव्यवस्थाकी स्थापना ही राजाका मुख्य कार्य है । समाज सर्वोपरि है, शासन परिवर्तनीय ।' यह विचारधारा मध्य-युगकी है। कहा जाता है कि सोलहवीं शतीतक धर्मकी प्रधानता थी, अतः राज्यशासन भी धर्ममिश्रित था । राजा देवांश है, यह सिद्धान्त प्रचलित था । १६ वी शतीमें यूरोपमें दो धार्मिक सम्प्रदाय बने—एक परम्परावादी रोमन कैथोलिक और दूसरा प्रोटेस्टेण्ट । प्रोटेस्टेण्टसे प्यूरिटन, प्रेसबिटेरियन, ह्यूगेनोज आदि कई उपसम्प्रदाय बने । फ्रांसके ३६ वर्षव्यापी गृहयुद्धमे एक पक्ष था रोमन कैथोलिक पादरियो एव सामन्तोका और दूसरा ह्यूगेनोज व्यापारियो एवं कुछ सामन्तोका । पहला पक्ष राजभक्तिका उपदेश देता था ओर दूसरा राज्योत्पत्तिका श्रेय अनुबन्धोंको देता था । उसके अनुसार 'राजाकी सत्ता निरपेक्ष नहीं, किंतु अनुबन्धोपर आश्रित है ।' १७ वीं शतीमें ब्रिटेनमें गृहयुद्ध चला । इसमे एक पक्ष था निरपेक्ष राजतन्त्रीय लोगोंका और दूसरा संसद्-वादियोंका । पहला पक्ष राजाको ईश्वरका प्रतिनिधि मानता था । स्टूअर्ट नरेश जेम्स प्रथम इस सिद्धान्तका प्रसिद्ध दार्शनिक था । उसका एव उसके पुत्र चार्ल्स प्रथमका कहना था कि 'देवी प्रतिनिधि होनेके कारण राजाका प्रजाके जान-मालपर पूर्ण अधिकार है ।' संसद्-वादी पक्षमें व्यापारियो एवं मध्यम-वर्गका बहुमत था । यह पक्ष राजाकी सीमित सत्ता मानता था । राजा लौकिक नियमो एव ससदीय नियमोका उल्लङ्घन नहीं कर सकता । जनताकी परोक्ष या प्रत्यक्ष अनुमति बिना राजा व्यक्तिगत सम्पत्तिपर कर नहीं लगा सकता । ये लोग 'ह्यूगेनोज' के अनुबन्धोको

आधुनिक विचार-धारा ८७ अंशतः आधार मानते थे । उपर्युक्त पक्षामें अनुबन्धको धर्मसे स्वतन्त्र नहीं माना गया, परन्तु हॉब्स ने अनुबन्धवादको धर्मसे विमुक्त कर उसे राज्यशास्त्रीय रूप दिया । 'लॉक' एव 'रूसो' ने भी इसी सिद्धान्तको विभिन्न दृष्टिकोणोंमें अपनाया । हॉब्सने निरपेक्ष राजतन्त्र, लॉकने सीमित राजतन्त्र और रूसोने प्रत्यक्ष जनवादको न्यायसंगत बताया । थामस हॉब्स (१५८८-१६७९) ब्रिटेनके गृहयुद्धकाल (१६४२-४९) का दार्शनिक था । कहा जाता है कि उसकी माताने भयभीत होकर समयसे पहले उसे जन्म दिया था, इसलिये वह भयसे अत्यधिक प्रभावित रहता था । १६४० में इंग्लैण्डकी दीर्घ संसद्‌की बैठकके समय ब्रिटेनसे भागनेवालोंमें वह सर्वप्रथम व्यक्ति था । उस समय वहाँ राजनियम, राजसत्ता, नागरिकता सम्बन्धी विभिन्न विचार- धाराएँ प्रचलित थीं। राजसत्ताका प्रश्न मुख्य था। स्टुअर्ट आदिके मतानुसार 'राजा ईश्वरके प्रति उत्तरदायी है, नागरिकोंके प्रति नहीं' यह विचार राजाको निरपेक्ष सत्ताधारी बनाता है। संसद्वादियोंके मतानुसार 'राजसत्ता और राजा संसद्‌मे निहित है । राजाकी सत्ता सीमित है।' दार्शनिकोंके अनुसार 'नैसर्गिक नियम सर्वोपरि है । कोई भी संस्था उसका लङ्घन नहीं कर सकती।' जनतन्त्रवादियोंका कहना था कि 'आज्ञापालन अनुबन्धके पालनपर आश्रित है । राज्यका जन्म अनुबन्धके द्वारा हुआ है । यदि राजा अनुबन्धका लङ्घन करे तो नागरिक राज्यका विरोध कर सकते हैं।' कैथोलिकों और काल्विनिस्टोंके अनुसार 'धर्म सर्वश्रेष्ठ है, राज्य उसके अधीन है।' ये ही मतभेद गृहयुद्धकी पृष्ठभूमिमें थे । हॉब्सने अपने कालके सर्वश्रेष्ठ प्रश्न 'राजसत्ता कहाँ निहित है' का उत्तर दिया था। हॉब्स सुव्यवस्थाको परमावश्यक समझता था । चाहे वह नरेशद्वारा स्थापित हो, चाहे क्रामवेल (१५९९-१६५८)-जैसे शासकद्वारा। राज्यके पूर्वकी स्थितिको 'प्राकृतिक स्थिति' (दि स्टेट आफ नेचर) कहते हैं । जब कोई इंजन खराब हो जाता है तो मिस्त्री उसके कलपुर्जोंको पृथक् करता है । इस क्रमसे उसे इंजिनकी खराबी मालूम पड जाती है। खराबी दूर कर फिर वह कलपुर्जोको जोडता है । हॉब्सका कहना था कि 'मनुष्य समाज और मकानमें रहते हुए भी सन्दूकमें ताला क्यों लगाता है ? सोते समय दरवाजा क्यों बन्द करता है ? इसका स्पष्ट अर्थ है कि मनुष्य एक दूसरेके प्रति विश्वास नहीं रखता । फिर जब राज्यव्यवस्थामें यह हालत है तब प्राकृतिक स्थितिमें तो कहना ही क्या ?' वह मनुष्यको स्वभावसे स्वार्थी मानता था । मनुष्य सत्ताधारी शक्तिके द्वारा ही सहयोगी बनकर रह सकता है । इसलिये प्राकृतिक स्थितिमे मनुष्य अलग-अलग ही रहते थे । उस समय न कोई व्यवस्था थी, न कोई सत्ताधारी था ।

दृष्टिसे कमजोर रहता था तो वह शारीरिक कमजोरीको मस्तिष्कशक्तिसे पूरा कर लेता था । अतः प्राकृतिक स्थितिमे व्यक्तियोकी समानता थी । स्वार्थपूर्ति ही उनका लक्ष्य था । सहयोगका उनमें कोई स्थान नहीं था । स्पर्धा ही स्वार्थपूर्तिका साधन था । संघर्षद्वारा ही आधिपत्य जमाया जाता था । दूसरोद्वारा अपनी कीर्ति स्वीकृत करायी जाती थी । यदि प्राकृतिक स्थितिमें समानता न होती तो अवश्य ही एक दूसरेपर आधिपत्य जमा सकते । कोई अपनी कीर्ति दूसरोसे स्वीकृत नहीं करा सकता था । सभी स्वार्थपूर्तिके संघर्षमें लगे रहते थे । भौतिकशास्त्र एवं जीवशास्त्रकी खोजोको भी समाजशास्त्रपर लागू किया जाता था । गैलिलियो और केपलरने नक्षत्रोकी गतिविधि सम्बन्धी खोज की थी । हर्वेने रक्तसंचरणके विषयमें खोज किया था । हॉब्सने समाजशास्त्रीय गतिविधि- की खोज की । उसने मानवजीवनकी गतिविधिका वैसा व्यापक बताया जैसे नक्षत्रों तथा प्राणियोके रक्तकी । हाब्सके अनुसार 'संघर्षगति ही मानव-जीवनका सार है । जैसे नक्षत्र-गतिविधिकी अनुपस्थितिमे विश्वका संहार होता है और रक्तगति बिना मनुष्यकी मृत्यु हो जाती है, वैसे ही संघर्षके बिना भी मृत्यु हो जाती है ।' उसने इस गतिका लक्ष्य स्वास्थ्यपूर्ति एवं कीर्तिवृद्धि ही बताया । ‘इस तरह प्रकृतिकी स्थितिमें सब युद्धरत ही थे । यह एक युद्धकी स्थिति थी । उस समय व्यक्तिगत सम्पत्ति, संस्कृति, विद्या, कला, विज्ञान, आयात- निर्यात, विश्व-ज्ञान, समय ज्ञान, कुछ भी सम्भव नहीं थे । नैतिकता-अनैतिकता, भलाई-बुराई, वैध-अवैधका कुछ भी ज्ञान नही था । लोगोको हत्याका भय सदा बना रहता था । जीवन एकाकी, निर्धन, जंगली, घृणित एवं क्षणिक था, अर्थात् यह प्राकृतिक स्थिति मात्स्यन्यायकी थी । 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' का सिद्धान्त लागू था ।' हॉब्सके विश्वासानुसार 'मनुष्य एक प्रेरणाप्रभावित प्राणी है । प्रेरणा ही प्राकृतिक स्थितिकी कारण थी ।' साथ ही वह यह भी कहता है कि 'मनुष्य एक विवेकशील प्राणी है' केवल प्रेरणाकी कठपुतली नही है । इस भीषण दशामें पहुँचकर मनुष्यने विवेकका उपयोग किया और उसे नैसर्गिक नियमोंका भान हुआ । ये नियम ईश्वराज्ञा-तुल्य होते हैं । उनका पालन व्यक्तियों- के लिये अनिवार्य है ।' वैसे तो १९ नैसर्गिक नियमोको उसने गिनाया, फिर भी तीनको मुख्य मानता था । प्रथम—मनुष्यको शान्तिस्थापनाका प्रयत्न करना चाहिये । दूसरा यह कि जब अन्य व्यक्ति भी राजी हो तो प्रत्येक व्यक्तिकी शान्ति- स्थापना और व्यक्तिगत सुरक्षाके लिये अपने सब अधिकारोके त्यागके लिये प्रस्तुत रहना चाहिये । और तीसरा यह कि प्रत्येक व्यक्तिको समझौता ( इकरार- नामा ) मानना चाहिये । प्राकृतिक स्थितिसे ऊबकर मनुष्योने विवेकसे इन तीन नैसर्गिक नियमो-

थामस हाब्स ४९ द्वारा असह्य स्थितिसे मुक्त होनेका प्रयत्न किया। प्रेरणाका परित्यागकर विवेकको मनुष्योंने मार्गदर्शक बनाया। फलतः एकत्रित होकर एक समझौता किया और प्रत्येक व्यक्तिने शपथ दोहरायी कि यदि आपलोग अपने अधिकारोंको इसी भाँति समर्पित करनेके लिये प्रस्तुत हैं तो मैं भी अपने अधिकारोंको इस व्यक्ति या व्यक्ति-समूहको समर्पित करता हूँ।' इस शपथद्वारा प्राकृतिक स्थितिका अन्त हुआ और समाज तथा राज्यका जन्म हुआ। मानव इतिहासका एक नया अध्याय आरम्भ हुआ और एक व्यक्ति राजा हुआ। बहुसंख्यक लोगोंने समझौतेमें भाग लिया। यदि कुछ अल्पसंख्यक लोगोंने प्राकृतिक स्थितिमें ही रहनेका हठ किया तो उन्हें दण्ड मिलना अनुचित नहीं था। हाब्सके मतानुसार 'राजसत्ताधारी राजासे शपथ नहीं लिवायी गयी। व्यक्तियोंने ही शपथपूर्वक अपना अधिकार समर्पण किया। 'मरता क्या न करता' के सिद्धान्तानुसार प्राकृतिक स्थितिके मनुष्योंने भी शर्तहीन अधि- कारोंका त्याग किया। हाब्स इस सत्ताधारी व्यक्तिको 'दीर्घकाय' (मानवदेव) कहता है। दीर्घकाय (लेवियाथन) ही उसकी पुस्तकका नाम है। जैसे पीड़ित लोग देवताके सामने शपथ लेते हैं, वैसे ही प्राकृतिक स्थितिसे पीड़ित व्यक्तियोंने मानवदेवके सामने शपथ ली। जैसे देवता कोई शपथ नहीं लेता वैसे ही मानवदेवने भी शपथ नहीं ली। अतः यह पूर्ण स्वतन्त्र एवं स्वेच्छाचारी बना। हाब्सकी पुस्तकके मुख- पृष्ठपर बने चित्रमें दीर्घकायका शरीर छोटे-छोटे मनुष्योंके शरीरोंसे घिरा है। इससे विदित होता है कि यह सबका प्रतिनिधित्व करता है। उसके एक हाथमें तलवार, दूसरेमें धर्मशास्त्र—राजकीय शक्ति एवं धर्मरक्षाका प्रतीक है। दीर्घकाय मात्स्यन्याय और सभ्यताके मध्यकी दीवार है। वह समाज तथा राज्य दोनोंका ही प्रतीक है।' वस्तुतः भारतीय शास्त्रोंमें वर्णित मात्स्यन्याय एवं तदनन्तर स्थापित राज- तन्त्रका ही यह अनुकरण है। इतना भेद अवश्य है कि भारतीय दृष्टिसे मात्स्यन्यायके पहले सभी व्यक्तियोंमें सत्त्वगुणकी प्रधानता थी। सभी धार्मिक एवं ईश्वरवादी थे। सभी प्राणिमात्रको ईश्वरका पुत्र समझते थे। सभी सबके साथ समानता, स्वतन्त्रता, भ्रातृताका व्यवहार करते थे। कोई अपराधी शोषक था ही नहीं। इसलिये राजा, राज्य एवं दण्ड-विधान आदि अनावश्यक थे। धर्मनियन्त्रित जनता आपसमें ही सब काम चला लेती थी। जब उसमें सत्त्वका ह्रास हुआ, तमोगुण, रजोगुण बढ़ा, धर्म घटा, अधर्मका विस्तार हुआ, तब मात्स्यन्याय फैला। तब प्रजाने पीड़ित होकर ईश्वरसे प्रार्थना कर उसके अनुग्रहसे चन्द्र, सूर्य, इन्द्र, वरुण, कुबेर, यम आदि लोकपालोंके गुणों तथा अंशोंसे युक्त राजाको प्राप्त किया और उसे विविध प्रकारसे सम्मानित किया। महती देवता ह्येषा नररूपेण तिष्ठति। (मनु० ७।८) इत्यादि रूपसे भारतीय शास्त्रोंमें राजाका महत्त्व गाया गया है। मा० रा० ४—

५० मार्क्सवाद और रामराज्य हाब्सने राज्यका जन्म ईश्वरद्वारा न मानकर समझौतेद्वारा बताया। राजा निरपेक्ष अवश्य था; परंतु दैवी सिद्धान्तके अनुसार नहीं। संसदीय सिद्धान्तानुसार उसने राज और राजसत्ताको विभक्त नहीं माना। उसके अनुसार 'नैसर्गिक और लौकिक नियम राज्यकी तलवार बिना शब्दमात्र रह जाते हैं, अतः दीर्घकायकी घोषणाएँ ही नियम हैं। जब जनताने ही अनुबन्धद्वारा अपने अधिकार राज्यको समर्पित कर दिये, तब जनताको विरोध करनेका अधिकार कहाँ रहा ? वह अपने अधिकारोंसे च्युत हो चुकी, धर्मका भी रक्षक वही है।' इस तरह हाब्सने उस समयके गृहयुद्धकी पृष्ठभूमिमें स्थित विविध विचार-धाराओका उत्तर दिया; परंतु धार्मिक, नैसर्गिक, लौकिक, किन्ही नियमोंसे नियन्त्रित न होनेसे वह दीर्घकाय राजा मानवदेव न होकर दानव ही बन जायगा। इसीलिये भारतीय शास्त्रोने उसे धार्मिक नियमोसे नियन्त्रित रहना आवश्यक बताया। जैसे बिना नकेलका ऊँट, बिना लगामका घोड़ा, बिना ब्रेककी साइकिल या मोटर खतरनाक होते हैं, वैसे ही अनियन्त्रित शासक संसारके लिये अभिशाप होता है। जो जनता किसीको अधिकार दे सकती है, वह उद्देश्य पूरा न होनेपर उसे अधि- कारसे पदच्युत भी कर सकती है। इसीलिये वेन-जैसे उद्दण्ड शासकोको जनताने पदच्युत कर दिया था। हाब्सने राज्यको 'निरपेक्ष संस्था' कहा अर्थात् बाह्य नीति या संस्थाका उसपर प्रतिबन्ध नही होता। उसके मतानुसार 'किसी प्राकृतिक स्थितिके व्यक्तियो-जैसा राज्योका असहयोग एव स्पर्धापूर्ण सम्बन्ध रहता है। उसी तरह किसी व्यक्ति, समूह या किसी नियमद्वारा भी राज्यसत्ता सीमित नहीं होती।' सङ्घोंके सम्बन्धमें भी उसका कहना है कि 'सङ्घ प्राकृतिक मनुष्योंकी अँतडियोमें कीड़ोंके समान थे। राज्योत्पत्तिसे प्राकृतिक मनुष्योका अन्त हो गया। नये नागरिकोका जन्म हुआ। स्वभावतः प्राकृतिक मनुष्योके अँतडियोके कीड़ों (सङ्घो) का भी अन्त हो गया अर्थात् राज्यमें कोई स्वतन्त्र सङ्घ सम्भव नहीं रहा। फिर उनके द्वारा सत्ता कैसे सीमित हो सकती है? दैवी नियम, धर्म, नैसर्गिक नियम, नागरिकता, लौकिक नियमपरम्पराका भी कोई नियन्त्रण राज्यपर न रहा। इस तरह हाब्सकी राजसत्ता एक निरङ्कुश शासनसत्ता हो जाती है, जिसका कि भारतीय शास्त्रोने विरोध किया है। हाब्सके मतानुसार 'राजतन्त्रमे ही एकता, मन्त्रणा, गुप्तता, नीतिका स्थायित्व, व्यभिचारोंकी कमी और चापलूसी तथा तानाशाहीकी कमी सम्भव है। ये सब बातें नरेशको छोड़कर समूहों या संघोमे सम्भव नहीं है। यह सत्ता विभाव्य भी नही होती।' हाब्सके राज्यका अधिकार बहुत व्यापक था। वह जीवनके सभी क्षेत्रोंमे तथा विचारोंपर भी राज्यका हस्तक्षेप सह्य मानता था; क्योंकि विचारके नियन्त्रित होनेपर ही व्यक्तियोके कार्य भी नियन्त्रित हो सकते हैं और 'दीर्घकाय सत्ताधारी' ही सर्वोच्च न्यायाधीश एवं सर्वोच्च सेनापति है। विधि-निर्माण,

दण्डविधान, सन्धि, विग्रह तथा नियुक्ति आदि उसीके अधिकारमे होते हैं। प्राकृतिक स्थितिमें हर समय जीवन एव सम्पत्ति खतरेमें रहती है। अतः वह राज्यकी ही शरण लेना व्यक्तियोके लिये एकमात्र परमावश्यक समझता था। इसे वह नैतिक भी मानता था। जब व्यक्तियोंने अपने अधिकार राज्यको दे दिये, तब उनका पुनः अपहरण अनैतिकता है। राज्यप्रदत्त नागरिक स्वतन्त्रतासे अधिक स्वतन्त्रता सम्भव नहीं। मनुष्योंने जीवन-रक्षाके लिये राज्यकी स्थापना की, राज्यका नियन्त्रण स्वीकार किया। अतः मृत्युभय, स्वार्थ, उपयोगिता ये ही उसके आधार हैं, इसी उपयोगिताके आधारपर वह राज्य-विरोधको न्यायसङ्गत मानता है। 'यदि राज्यका नियम नागरिक- की जीवन-रक्षापर आघात करता है तो नागरिकोको ऐसे नियमके विरोध करनेका अधिकार है।' ईश्वर एव धर्मका नियन्त्रण अस्वीकारकर अनियन्त्रित धर्महीन शासकको सुख- शान्ति एवं राज्यस्थापनाका उद्देश्य भी पूरा नहीं हो सकता। कहा जाता है कि धर्म और ईश्वर माननेसे प्राणीका विचार करनेका अवकाश नहीं रहता; परंतु धर्म एव ईश्वरका अस्तित्व स्वीकार करते हुए भी हिताहित सुव्यवस्थाका पूर्ण विचार करनेका सदा ही अवकाश रहता है। विचारपूर्वक ही प्रत्येक कार्यमें प्रवृत्त होना आवश्यक है। फिर भी अनियन्त्रण, उच्छृङ्खलतासे हटकर किसी ढंगके भी नियन्त्रण- का अङ्गीकार करना श्रेष्ठ है। इसके अतिरिक्त हॉब्सका व्यक्तियोके सम्बन्धका वर्णन एकाङ्गी भी है। अपने बन्धुओंकी बरबादीसे सुख पानेवाले लोगोंकी संख्या वस्तुतः सदा ही कम थी। बच्चों एव बन्धुओकी मृत्युपर प्रसन्न होनेवाले सोते हुए असहाय प्राणीको पाकर सर्वप्रथम मारनेकी भावना रखनेवाले मनुष्य कभी भी कम ही थे। फिर ऐसे मनुष्योंद्वारा राज्य-जैसी पवित्र संस्थाका निर्माण भी कैसे हो सकता है? रूसोका कहना है कि 'यह कैसे सम्भव है कि मनुष्य जो एक क्षण दूसरेके गलेपर छुरी मारनेके लिये तत्पर थे, वे ही दूसरे क्षण एक दूसरेके गले मिलने लगे?' मानव- इतिहासमें कायाकल्पका कोई दृष्टान्त नहीं, वस्तुतः प्रेरणा और विवेक सभी कार्योंमें प्राणियोंके साथ रहते हैं। हॉब्स एव हल्वैशियसके मतानुसार 'प्राणी परोपकार भी आत्महितके लिये ही करता है।' परंतु जब देखा जाता है कि व्याघ्र-सरीखे क्रूर प्राणी भी अपने बच्चोंकी रक्षाके लिये प्राण देनेको तैयार होते हैं तो कहना पड़ता है कि प्रेम-परोपकार प्राणियोंमें स्वाभाविक धर्म भी होते हैं। नीतिकारोंने इन्हें इस प्रकार श्रेणीबद्ध किया है- एके सत्पुरुषाः परार्थघटकाः स्वार्थं परित्यज्य ये सामान्यास्तु परार्थमुद्यमभृतः स्वार्थाविरोधेन ये। तेऽमी मानुषराक्षसाः परहितं स्वार्थाय निघ्नन्ति ये ये निघ्नन्ति निरर्थकं परहितं ते के न जानीमहे॥ (नीतिशतक ७४)

५२ मार्क्सवाद और रामराज्य 'जो स्वार्थ त्यागकर भी परोपकार ही करते हैं, वे सत्पुरुष हैं । जो अपने स्वार्थकी रक्षा करते हुए परोपकार करते हैं, वे सामान्यलोग हैं, जो लोग स्वार्थके लिये परहितका विघात करते हैं, वे तो मनुष्य-वेषमें राक्षस ही हैं; परंतु जो लोग निष्कारण ही परहित- विघात करते हैं, वे कौन हैं—उन्हे क्या कहा जाय—यह समझमें ही नही आता ।' सामान्यलोग भले ही स्वार्थी हो, परंतु इस आधारपर कोई व्यवस्था नही की जा सकती । सामान्यरूपसे भले ही प्राणी झूठ बोलता और घाट तौलता हो, तो भी व्यवहार-व्यवस्थापक यदि झूठ बोलने और घाट तोलनेको प्रश्रय देगा तब तो अनर्थ ही होगा । इससे भी आगे सामाजिक सुख अर्थात् मनुष्य जातिके सुखके उद्देश्यसे ही प्राणीको कार्याकार्यका निर्णय करना श्रेष्ठ है। फिर भी कभी उसी कार्यसे बहुतोको सुख होता है, पर तु कुछ लोगोको दुःख भी होता है । उलूकको प्रकाशसे कष्ट होता है, तो भी प्रकाश त्याज्य नही होता । अतः 'बहुजनसुखाय' का विचार आवश्यक है । यद्यपि एक ढंगसे चलनेवाली ठीक टाइम देनेवाली घड़ी ठीक समझी जाती है, परंतु मनुष्य यन्त्र नहीं है । यहाँ तो उसके अन्तःकरणको देखा जाता है । मान लीजिये—कोई घूस देकर या चोरबाजारीसे कोई चीज खरीदकर परोपकार करता है । भले ही उससे बहुजनहित हुआ, पर इतनेसे ही घूस या चोरी न्याय नहीं हो जायगा । अमेरिकाके एक शहरमे ट्राम्बेकी बड़ी आवश्यकता थी; परन्तु जल्दी सरकारी मंजूरी नहीं मिली । व्यवस्थापकने घूस देकर मंजूरी ली और ट्राम्बे चलाया । उससे बहुत लोगोका लाभ हुआ, हित हुआ; परंतु पीछेसे घूसकी बात खुली और व्यवस्थापकको दण्ड दिया गया । एक कार्यमे गरीबका चार पैसा और अमीरका लाखों रुपया भावनाकी दृष्टिसे समान या कभी-कभी चार पैसाका दान ही अधिक महत्त्वका होता है । इसी लिये बाह्य परिणामोंकी अपेक्षा नीतिमत्ता एव बुद्धिका ध्यान होना आवश्यक है । दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय । ( गीता २।४९) छोटे कीड़ोसे लेकर मनुष्यतक प्राणियोमें देखा जाता है कि वे अपने समान ही अपनी संतानो एव जातियोकी भी रक्षा करते हैं । किसीको दुःख न देकर बन्धुओं- की यथानम्भव सहायता ही करते हैं अतः सजीव सृष्टिका यही स्वभाव है । कई कीड़ोमें स्त्री-पुरुष-भेद नही होता । उनके देहमें ही भेद होकर दूसरे कीड़े उत्पन्न होते हैं । वहाँ यही कहना पड़ता है कि संतानके लिये उनमें अपने शरीरके अंशको त्यागनेकी बुद्धि होती है । जगली जानवरो, मनुष्योमें भी ऐसी ही प्रवृत्ति होती है । इसीलिये मनुष्य परार्थमे ही सुख मानता है, जैसा कि स्पेन्सरने भी माना है । भारतीय भावनाके अनुसार परार्थ ही जिसका स्वार्थ है, वही पुरुष सत्पुरुषोंसे श्रेष्ठ है—

क्षुद्राः सन्ति सहस्रशो स्वभरणव्यापारमात्रोद्यताः । स्वार्थो यस्य परार्थ एव स पुमानेकः सतामग्रणीः ॥ (सुभाषितावलि २८५) हाब्सके अनुसार हत्याके भयसे मनुष्यका व्यक्तिगत स्वतन्त्रताका परित्याग कर एक अनियन्त्रित शासकके शरण होना वैसा ही लगता है, जैसे एक जंगली बिल्ली- से डरकर खूँखार हिंस्र शेरकी शरण जाना । रूसोका कहना है कि ‘स्वतन्त्रता प्रकृतिकी देन है । स्वतन्त्रताका परित्याग मनुष्यताका ही परित्याग है ।’ हाब्सका सिद्धान्त न तो प्राचीन धार्मिक लोगोंने ही माना और न जडवादियोने ही। उसके मतानुसार ‘राज्यका अधिकार ईश्वरीय, धार्मिक एवं पैतृक भी नहीं और न जनतान्त्रिक ही है ।’ वस्तुतः पाश्चात्य दर्शनकार अपनी परिस्थितियोसे ऊँचे उठकर विचार कर ही नहीं सके । इसीलिये हाब्सने अपनी भीरु प्रकृतिके अनुसार ही भयमूलक ही सिद्धान्त भी स्थापित किया । जान लॉक जान लॉक (१६३२-१७०४) भी समझौतावादी था। उसे सीमित राजतन्त्रमें विश्वास था । उसका पिता ‘प्यूरिटन’ सम्प्रदायका अनुयायी था । ‘लॉक’ १६८८ की रक्तहीन क्रान्तिका दार्शनिक माना जाता है। इंग्लैंडके जेम्स द्वितीयके पदच्युत होनेपर विलियम और मेरीको राज्यपदके लिये निमन्त्रित किया गया । ‘बिल आफ राइटस्’ और ‘ऐक्ट आफ सैट्लमन्ट’ नियमोंद्वारा कार्यपालिका संसद्के अधीन बनी । संसद्का राज्यकोष, राज्यनीति तथा सेनापर पूर्ण नियन्त्रण स्थापित हुआ । इसी रक्तहीन क्रान्तिके द्वारा संसद् सत्ताधारी बनी और राजा केवल वैधानिक रह गया । यह एक प्रकारसे जनवादका आरम्भ हुआ । लॉक भी प्राकृतिक स्थिति और राज्यकी स्थिति मानता है। उसके मतानुसार ‘मनुष्य विवेकशील एवं सामाजिक प्राणी है। सत्य बोलना अच्छा, झूठ बोलना पाप है’—इत्यादि नैसर्गिक नियमोंका पालन वह आवश्यक समझता था । इन्हीं सब हेतुओंसे प्राणी शान्ति, स्वतन्त्रता एवं भ्रातृताकी ओर प्रवृत्त होता है। उसके मतानुसार ‘स्रष्टाने भूमि एव विविध पदार्थ सर्वसामान्यक प्रदान किया है । साथ ही श्रमशक्ति भी प्रदान की है । इसीके द्वारा सामान्य वस्तुओमेसे कुछको अपने उपयोग योग्य बनाता है । वही उसकी निजी सम्पत्ति होती है । उदाहरणार्थ नदीका पानी सर्वसामान्य वस्तु है । पर जब एक मनुष्य श्रमद्वारा उसकी कुछ मात्रा लाकर अपने घरमे रखता है, तो वह उसकी व्यक्तिगत सम्पत्ति होती है। श्रमके मिश्रणसे ही कोई वस्तु व्यक्तिगत सम्पत्ति बनती है । प्राकृतिक मनुष्य एक विवेकशील सामाजिक तथा नैतिक प्राणी था । वह नैतिकतापूर्ण नैसर्गिक नियमोका अनुयायी था । हाब्सके विपरीत लॉकके मतानुसार मनुष्य एक दूसरेके व्यक्तित्व एव व्यक्तिगत सम्पत्ति और अधिकारका आदान-प्रदान करते थे । वह स्थिति सुख, शान्ति, स्वतन्त्रता और भ्रातृत्वकी थी । लॉकका यह मत भारतीय भावनासे मिलता है । भारतीय दृष्टिकोणके अनुसार पहले यद्यपि राज्य, राजा, दण्ड-विधान नहीं था, परंतु कोई दण्डनीय भी नहीं था । सभी परस्पर

५४ मार्क्सवाद और रामराज्य एक दूसरेके पोषक थे, कोई किसीका शोषक नहीं था । सभी धर्मनियन्त्रित थे । धर्मयुक्त होकर सब आपसमे ही काम चला लेते थे । न वै राज्यं न राजासीन्न च दण्ड्यो न दाण्डिकः । धर्मेणैव प्रजाः सर्वा रक्षन्ति स्म परस्परम् ॥ ( महा० शा० प० ५९ । १४ ) ‘जो जैसा करेगा वैसा पायेगा’—यह नैसर्गिक नियम प्रचलित था । लॉकके मतानुसार ‘कुछ दिनो बाद सुखमय न्यायपूर्ण जीवनमें बाधाएँ उत्पन्न हो गयीं । व्यक्ति अज्ञानी और पक्षपाती हो गये । अध्ययनशून्य हो जानेसे उन्हे नियमोंका ज्ञान नहीं रहा । सभी मनमाना नियम लागू करने लगे । अतः लिखित नियमकी आवश्यकता पडी । एक निष्पक्ष न्यायाधीश अपेक्षित होने लगा । निर्णयको कार्यान्वित करनेके लिये पुलिसकी भी आवश्यकता हुई । तब समझौता— ‘अनुबन्धद्वारा’ सभ्य समाजका निर्माण कराया ।’ लॉकके मतानुसार व्यक्तियोंने अपने कुछ ही अधिकार सभ्य समाजको समर्पित किये । नैसर्गिक नियमोंके अनुसार सभ्य समाजको नियम निर्माण करके निश्चित निष्पक्ष न्यायाधीश नियुक्त करने एवं निर्णयको कार्यान्वित करनेका अधिकार दिया गया । परतु नैसर्गिक नियमोंके लङ्घन तथा व्यक्तिगत सम्पत्तिपर आघात करनेका अधिकार उस समाजको नहीं दिया गया ।’ लॉकने नैसर्गिक नियमोंको सर्वव्यापक एवं सर्वोपरि बतलाया । व्यक्तिगत सम्पत्तिकी सुरक्षाके लिये ही व्यक्तिने सभ्य समाजकी स्थापना की और असुविधासम्बन्धी उक्त तीनो अधिकारोका परित्याग किया तथा बहुमतका निर्णय स्वीकार करनेका भी नियम स्वीकार किया । यह सभ्य समाज कुछ व्यक्तियोका समूह था; परन्तु इस समूहको यह अनुभव हुआ कि वह असुविधाओ- को दूर करनेमें असमर्थ है । कारण कि न तो सैकड़ो मनुष्य नियम ही निर्माण कर सकते हैं और न न्यायालय और कार्यपालिकाका ही काम कर सकते हैं । इसीलिये सभ्य समाजने व्यवस्थापिका सभा और संसद्की स्थापना की । इसी सभाको नियम-निर्माणका अधिकार दिया गया । सभ्य समाजके समान ही यह सभा भी नैसर्गिक नियमों एवं व्यक्तिगत सम्पत्तिके अधिकारोका लङ्घन नहीं कर सकती थी। नैसर्गिक नियमोंके अनुसार कानून बनाना ही उसका काम था । व्यवस्थापिका सभाकी बैठकें स्थायी नहीं होती थीं; किंतु आवश्यकताओंके अनुसार होती थीं । इसीलिये संसद्ने एक स्थायी कार्यपालिकाकी स्थापना की । इसका कार्य नियमोंको कार्यान्वित करना था । कुछ परिस्थितियोंमें वह नियम- निर्माणमें भी भाग लेती थी । संसद्द्वारा नियुक्त न्यायाधीश नैसर्गिक नियमोपर आश्रित लिखित नियमोंके अनुसार निर्णय करते थे । इस प्रकार संसद्, कार्य- पालिका, न्यायपालिका—राज्यके इन तीनो अङ्गोंकी स्थापना हुई ।

जान लॉक ७५ युद्ध एवं शान्ति-सम्बन्धी कार्योंको कार्यपालिकाके जिम्मे किया गया और न्यायाधीशकी नियुक्ति संसद्के जिम्मे, परंतु न्यायपालिकाको कार्यपालिकाका अङ्ग माना गया । उस तरह शक्ति विभाजनकी बात भी आ जाती है । इसीके अनुसार फ्रांसके लेखक मांटेस्क्यूने 'व्यक्तिगत स्वतन्त्रता'का समर्थन किया । लाककी राज्य-संस्था स्वामी नहीं, किंतु एक सेवक है । उसे जनस्वीकृतिकी आवश्यकता थी । व्यक्ति और उसकी सम्पत्ति अर्थात् जीवनस्वतन्त्रता और सम्पत्तिकी सुरक्षा तथा नैसर्गिक नियमोंको लिपिबद्ध करना उसका कर्तव्य था । राजाके मनमाने शासन करने एवं संसद्के कार्यक्रम एवं निर्वाचनमें हस्तक्षेप करने, देशको विदेशी सत्ताके अधीन करने, संरक्षण- कार्यमें असफल होने आदिकी हालतमें कार्यपालिकाका विरोध किया जा सकता है एवं उसे हटाया जा सकता है । लाकके मतानुसार 'संसद् यद्यपि राज्यका प्राण है तथापि उसे भी नैसर्गिक नियमोंके विपरीत नियम-निर्माणका अधिकार नहीं। संसद् न मनमाने नियम बना सकती है, न नियम बनानेका भार किसी व्यक्ति या संस्थाको दे सकती है । ऐसी स्थितिमें नागरिक-समाजद्वारा उसे पदच्युत करके दूसरी संसद् बनायी जा सकती है।' लाक किसी राजाका जन्मसिद्ध असाधारण अधिकार नहीं मानता था और निरपेक्ष राजाका अपने मुकदमेमें स्वयं न्यायाधीश माननेको सर्वथा न्यायरहित मानता था । राजाको सभी अधिकार जनताद्वारा मिले होते हैं । जनता अन्यायी राजासे अपने दिये हुए अधिकारोंको वापस ले सकती है । उसके मतमें नागरिक समाज ही सर्वोत्कृष्ट संस्था है । नागरिक लोगोंको सदा अधिकार रहता है कि नियमोल्लङ्घन करनेवाले राजा या संसद्को वैधानिक ढंगसे अथवा हिंसाद्वारा अलग कर दे । लॉकके मतानुसार 'सर्वोत्कृष्ट सत्ता जनतामें ही निहित होती है, परंतु स्वतन्त्रताके लिये सतर्कता अत्यावश्यक है।' उसके विचारसे 'सतर्कता स्वतन्त्रताकी भगिनी है । शासनके कार्योंको देखते रहना, उसमें त्रुटि होनेपर विरोध करना आवश्यक है । जनता एक सुप्तसत्ताधारी है । किन्हीं विशेष परिस्थितियोंमें ही वह अपनी सत्ताका प्रयोग करती है। इस मतसे समाज ही सर्वश्रेष्ठ है । शासक उसीके प्रति उत्तरदायी होता है और नैतिक नियमोंके परतन्त्र होता है। सरकार एक संरक्षकमात्र है, भोक्ता नहीं । जैसे किसी अभिभावकको किमी बालकके शिक्षणके लिये कुछ रुपया दिया जाता है, तो वह उसका उसी कार्यमें विनियोग कर सकता है, उसे स्वयं भोग नहीं सकता । इसी प्रकार राजा राज्यका भोक्ता नहीं, किंतु संरक्षक मात्र है। इसमें विभिन्न वर्गोंके समन्वयमें कोई बाधा नहीं पड़ती।' हूकर, वर्क आदि भी इसी विचारधाराके थे ।

भारतीय राजनीतिमे सदासे ही समाजको सर्वश्रेष्ठ माना जाता है और उसमें वर्णाश्रमधर्मका समन्वय है । शासक धर्म एवं समाजके प्रति उत्तरदायी हैं । शासन बदलते रहते हैं पर समाज और धर्म नहीं बदलते । राज्यके नियम धर्मशास्त्रोंके ही अनुकूल हो सकते हैं । व्यक्तिगत वैध सम्पत्तिपर आघात अन्याय माना जाता है । लॉक समाजको सत्ताधारी मानता है, साथ ही व्यक्तिको भी उच्चस्थान देता है । वह राजाको व्यक्तिका सेवक मानता है । इस सिद्धान्तको सेवाइनने बेमेल बताया । लॉकके अनुसार राज्यकार्य सुरक्षातक ही सीमित है । उसे नैतिकता-शिक्षा आदिके कामोंमें हाथ नहीं डालना चाहिये ।' यह विचारधारा धर्मनियन्त्रित रामराज्यकी ही है; क्योंकि उसमें शिक्षा, सम्पत्ति एवं धर्मको सदा ही स्वतन्त्र रहना उचित समझा जाता है । राज्यलक्ष्मी चपला होती है । वह कभी देवता और कभी दानवके हाथ भी जा सकती है । उसके हाथमें शिक्षा-सम्पत्ति एवं धर्मके जानेसे व्यक्ति और समाज सदाके लिये नष्ट हो जायेंगे । उसीके बलपर व्यक्ति एव समाज शासनोंमें रद्दोबदल कर सकते हैं । संसद्के नामसे न सही परंतु नीतिशास्त्र एवं मन्त्रिमण्डलकी व्यवस्था सदासे ही धर्म नियन्त्रित शासनतन्त्रमें थी । आजकल समझा जाता है कि 'मानव-जातिका इतिहास उन्नतिका ही इति- हास है।' अतः लॉकका यह कथन कि 'व्यक्ति पहलेसे ही नैतिक है उसे नैसर्गिक नियमोका ज्ञान था' संगत नहीं है । यदि ऐसा ही था तो उसने प्राकृतिक स्थितिका त्याग क्यों किया ? उसमें असुविधा, अनैतिकता क्यों आयी ? उसे समाजकी आवश्यकता क्यों पडी ? अतः नैतिकता, शिक्षा आदि सब समाजकी या व्यक्तिकी देन माननी चाहिये, परंतु रामराज्यके अनुसार इसका समाधान सरल है । जैसा कि कहा जा चुका है कि 'सत्त्व एवं धर्मके ह्राससे नैतिकतामें एवं ज्ञानमें कमी आयी, तभी राज्यकी अपेक्षा हुई । इस पक्षमें व्यक्ति और समाजकी स्थिति और सम्बन्ध सदा उसी ढंगका होता है जैसे वृक्ष एवं वनका, सैनिको एवं सेनाका । निरीश्वर जडवादके अनुसार ही 'उत्तरोत्तर विकास हो रहा है। पूर्वज लोग असभ्य, अज्ञानी एव जगली थे।' ईश्वरवादीके यहाँ तो विज्ञानपूर्वक विश्वकी सृष्टि है। अतः सृष्टि-कालमें लोग आजकी अपेक्षा अधिक ज्ञानशक्ति एव नैतिकतासे पूर्ण थे। युग-ह्रासके अनुसार सत्त्व एव शक्तिका ह्रास होनेसे ही विभिन्न प्रकारकी असुविधाएँ हुईं । धर्मनियन्त्रित शासनतन्त्रमे जनवाद एव राजतन्त्रका समन्वय है, विरोध नहीं । धर्मशास्त्र सभीपर लागू होता है । अन्यथा लॉकके मतानुसार 'व्यक्ति कभी नैसर्गिक नियमोके हननके नामपर विरोध करते और नागरिकता स्वीकार करने न करनेमें स्वतन्त्र होते' तब तो राज्यका चलाना ही कठिन हो जाता । 'श्रम-मिश्रणसे ही धन

व्यक्तिगत होता है' लाकका सम्पत्ति सम्बन्धी यह सिद्धान्त सी०एच० ड्राइवर (C.H Driver) के मतानुसार 'एक अस्फुटित बम' के समान था। रेकार्डो आदिने तो श्रम- द्वारा ही वस्तुका मूल्य निर्धारित किया। मार्क्स ने भी श्रमको ही आधार मानकर अपना मत खड़ा किया है। परंतु धर्म-नियन्त्रित शासनकी दृष्टिमे यह सिद्धान्त भी त्रुटिपूर्ण है। क्योंकि पद्मरागमणि, वज्रमणि आदिका मूल्य उनके गुणोंपर अवलम्बित होता है, श्रमपर नहीं। इसके साथ ही यह भी समझ लेना आवश्यक है कि भूमि आदि अनेक वस्तुओमें श्रमयोग बिना भी पितृ-पितामहादि-परम्परासे स्वत्व प्राप्त होता है। तब भी धर्म- नियन्त्रित व्यक्ति, समाज एव राज्यद्वारा तथा उचित वितरणद्वारा आर्थिक सन्तुलन बना रहता था। अतः बेकारी, भुखमरीका प्रश्न ही नहीं उठता था। धर्म-नियन्त्रित व्यक्ति सब एक दूसरेके पोषक ही होते हैं, शोषक नहीं होते ।

रूसोके विचार

१७८९ की फ्रान्सकी राज्यक्रान्तिका प्रवर्त्तक रूसो ( १७१२-७८ ) दस वर्षकी अवस्थामें ही एक पादरीके यहाँ नौकरी करने लगा। बुरी आदतोंके कारण वहाँसे उसे हटा दिया गया। बादमें वह दूसरी नौकरीमें लग गया। वहाँ वह पूरा झूठा, चोर और आवारा बन गया। उसे मित्रोमे सदा ही सहायता मिलती रही। बादमें एक धनाढ्य स्त्रीके सहारे उसे पढनेकी सुविधा मिली। फिर वह गरीबोमें रहने लगा। वहाँ उसने शराबकी दूकान की, नौकरानीसे मैत्री करली और बिना विवाहके ही पाँच बच्चे पैदा किये। पीछे १७४९ में उसने 'विज्ञान और कलाकी उन्नतिसे नैतिकताकी वृद्धि हुई या अवनति' इस विषयपर निबन्ध लिखकर पारितोषिक प्राप्त किया। इसी निबन्ध लिखनेके प्रसगसे उसके जीवनमें परिवर्तन हुआ। उस निबन्धमें उसने बताया कि 'विज्ञान और कलाकी वृद्धिसे नैतिकताकी वृद्धि नहीं हुई, प्रत्युत पतन हुआ।' पश्चात् उसने अनेक पुस्तके लिखीं और आवारा रूसो एक दार्शनिक बन गया। १७५४ में असमानताके जन्मपर उसने पुस्तक लिखी। इसमें उसने प्राकृतिक स्थिति और राज्यका जन्म बतलाया। एक लेखमें उसने 'आदर्श सामान्य इच्छा' और 'आदर्श राज्य' का वर्णन किया। अपनी शिक्षासम्बन्धी पुस्तकमें उसने 'धर्मप्रभा- वित शिक्षा' का विरोध किया। इससे तात्कालिक पादरियो एवं सरकारने उसका विरोध किया। रूसोके समयमें किसानोंकी दशा बहुत शोचनीय थी। मध्यम वर्गमें निराशा एवं उदासीनता छायी हुई थी। रूसोके मतानुसार 'मानवमें भावनाका स्तर विवेकसे भी ऊँचा है।' उसके अनुसार 'आधुनिक सभ्यताने मनुष्यको अनैतिक एवं व्यभिचारी बनाया है। सभ्यताके पूर्व व्यक्तिका जीवन आदर्शमय था।' उस समयके अन्य विचारक कुशलताको महत्त्व देते थे, परंतु रूसोने स्वतन्त्रताको सर्वोच्च स्थान दिया। वह राजतन्त्रका कट्टर विरोधी था, सुतरा गरीबोँ और किसानोंका आदर्श दार्शनिक था।