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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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भारतीय राजनीतिमे सदासे ही समाजको सर्वश्रेष्ठ माना जाता है और उसमें वर्णाश्रमधर्मका समन्वय है । शासक धर्म एवं समाजके प्रति उत्तरदायी हैं । शासन बदलते रहते हैं पर समाज और धर्म नहीं बदलते । राज्यके नियम धर्मशास्त्रोंके ही अनुकूल हो सकते हैं । व्यक्तिगत वैध सम्पत्तिपर आघात अन्याय माना जाता है । लॉक समाजको सत्ताधारी मानता है, साथ ही व्यक्तिको भी उच्चस्थान देता है । वह राजाको व्यक्तिका सेवक मानता है । इस सिद्धान्तको सेवाइनने बेमेल बताया । लॉकके अनुसार राज्यकार्य सुरक्षातक ही सीमित है । उसे नैतिकता-शिक्षा आदिके कामोंमें हाथ नहीं डालना चाहिये ।' यह विचारधारा धर्मनियन्त्रित रामराज्यकी ही है; क्योंकि उसमें शिक्षा, सम्पत्ति एवं धर्मको सदा ही स्वतन्त्र रहना उचित समझा जाता है । राज्यलक्ष्मी चपला होती है । वह कभी देवता और कभी दानवके हाथ भी जा सकती है । उसके हाथमें शिक्षा-सम्पत्ति एवं धर्मके जानेसे व्यक्ति और समाज सदाके लिये नष्ट हो जायेंगे । उसीके बलपर व्यक्ति एव समाज शासनोंमें रद्दोबदल कर सकते हैं । संसद्के नामसे न सही परंतु नीतिशास्त्र एवं मन्त्रिमण्डलकी व्यवस्था सदासे ही धर्म नियन्त्रित शासनतन्त्रमें थी । आजकल समझा जाता है कि 'मानव-जातिका इतिहास उन्नतिका ही इति- हास है।' अतः लॉकका यह कथन कि 'व्यक्ति पहलेसे ही नैतिक है उसे नैसर्गिक नियमोका ज्ञान था' संगत नहीं है । यदि ऐसा ही था तो उसने प्राकृतिक स्थितिका त्याग क्यों किया ? उसमें असुविधा, अनैतिकता क्यों आयी ? उसे समाजकी आवश्यकता क्यों पडी ? अतः नैतिकता, शिक्षा आदि सब समाजकी या व्यक्तिकी देन माननी चाहिये, परंतु रामराज्यके अनुसार इसका समाधान सरल है । जैसा कि कहा जा चुका है कि 'सत्त्व एवं धर्मके ह्राससे नैतिकतामें एवं ज्ञानमें कमी आयी, तभी राज्यकी अपेक्षा हुई । इस पक्षमें व्यक्ति और समाजकी स्थिति और सम्बन्ध सदा उसी ढंगका होता है जैसे वृक्ष एवं वनका, सैनिको एवं सेनाका । निरीश्वर जडवादके अनुसार ही 'उत्तरोत्तर विकास हो रहा है। पूर्वज लोग असभ्य, अज्ञानी एव जगली थे।' ईश्वरवादीके यहाँ तो विज्ञानपूर्वक विश्वकी सृष्टि है। अतः सृष्टि-कालमें लोग आजकी अपेक्षा अधिक ज्ञानशक्ति एव नैतिकतासे पूर्ण थे। युग-ह्रासके अनुसार सत्त्व एव शक्तिका ह्रास होनेसे ही विभिन्न प्रकारकी असुविधाएँ हुईं । धर्मनियन्त्रित शासनतन्त्रमे जनवाद एव राजतन्त्रका समन्वय है, विरोध नहीं । धर्मशास्त्र सभीपर लागू होता है । अन्यथा लॉकके मतानुसार 'व्यक्ति कभी नैसर्गिक नियमोके हननके नामपर विरोध करते और नागरिकता स्वीकार करने न करनेमें स्वतन्त्र होते' तब तो राज्यका चलाना ही कठिन हो जाता । 'श्रम-मिश्रणसे ही धन

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