मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजान लॉक ७५ युद्ध एवं शान्ति-सम्बन्धी कार्योंको कार्यपालिकाके जिम्मे किया गया और न्यायाधीशकी नियुक्ति संसद्के जिम्मे, परंतु न्यायपालिकाको कार्यपालिकाका अङ्ग माना गया । उस तरह शक्ति विभाजनकी बात भी आ जाती है । इसीके अनुसार फ्रांसके लेखक मांटेस्क्यूने 'व्यक्तिगत स्वतन्त्रता'का समर्थन किया । लाककी राज्य-संस्था स्वामी नहीं, किंतु एक सेवक है । उसे जनस्वीकृतिकी आवश्यकता थी । व्यक्ति और उसकी सम्पत्ति अर्थात् जीवनस्वतन्त्रता और सम्पत्तिकी सुरक्षा तथा नैसर्गिक नियमोंको लिपिबद्ध करना उसका कर्तव्य था । राजाके मनमाने शासन करने एवं संसद्के कार्यक्रम एवं निर्वाचनमें हस्तक्षेप करने, देशको विदेशी सत्ताके अधीन करने, संरक्षण- कार्यमें असफल होने आदिकी हालतमें कार्यपालिकाका विरोध किया जा सकता है एवं उसे हटाया जा सकता है । लाकके मतानुसार 'संसद् यद्यपि राज्यका प्राण है तथापि उसे भी नैसर्गिक नियमोंके विपरीत नियम-निर्माणका अधिकार नहीं। संसद् न मनमाने नियम बना सकती है, न नियम बनानेका भार किसी व्यक्ति या संस्थाको दे सकती है । ऐसी स्थितिमें नागरिक-समाजद्वारा उसे पदच्युत करके दूसरी संसद् बनायी जा सकती है।' लाक किसी राजाका जन्मसिद्ध असाधारण अधिकार नहीं मानता था और निरपेक्ष राजाका अपने मुकदमेमें स्वयं न्यायाधीश माननेको सर्वथा न्यायरहित मानता था । राजाको सभी अधिकार जनताद्वारा मिले होते हैं । जनता अन्यायी राजासे अपने दिये हुए अधिकारोंको वापस ले सकती है । उसके मतमें नागरिक समाज ही सर्वोत्कृष्ट संस्था है । नागरिक लोगोंको सदा अधिकार रहता है कि नियमोल्लङ्घन करनेवाले राजा या संसद्को वैधानिक ढंगसे अथवा हिंसाद्वारा अलग कर दे । लॉकके मतानुसार 'सर्वोत्कृष्ट सत्ता जनतामें ही निहित होती है, परंतु स्वतन्त्रताके लिये सतर्कता अत्यावश्यक है।' उसके विचारसे 'सतर्कता स्वतन्त्रताकी भगिनी है । शासनके कार्योंको देखते रहना, उसमें त्रुटि होनेपर विरोध करना आवश्यक है । जनता एक सुप्तसत्ताधारी है । किन्हीं विशेष परिस्थितियोंमें ही वह अपनी सत्ताका प्रयोग करती है। इस मतसे समाज ही सर्वश्रेष्ठ है । शासक उसीके प्रति उत्तरदायी होता है और नैतिक नियमोंके परतन्त्र होता है। सरकार एक संरक्षकमात्र है, भोक्ता नहीं । जैसे किसी अभिभावकको किमी बालकके शिक्षणके लिये कुछ रुपया दिया जाता है, तो वह उसका उसी कार्यमें विनियोग कर सकता है, उसे स्वयं भोग नहीं सकता । इसी प्रकार राजा राज्यका भोक्ता नहीं, किंतु संरक्षक मात्र है। इसमें विभिन्न वर्गोंके समन्वयमें कोई बाधा नहीं पड़ती।' हूकर, वर्क आदि भी इसी विचारधाराके थे ।