मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४ मार्क्सवाद और रामराज्य एक दूसरेके पोषक थे, कोई किसीका शोषक नहीं था । सभी धर्मनियन्त्रित थे । धर्मयुक्त होकर सब आपसमे ही काम चला लेते थे । न वै राज्यं न राजासीन्न च दण्ड्यो न दाण्डिकः । धर्मेणैव प्रजाः सर्वा रक्षन्ति स्म परस्परम् ॥ ( महा० शा० प० ५९ । १४ ) ‘जो जैसा करेगा वैसा पायेगा’—यह नैसर्गिक नियम प्रचलित था । लॉकके मतानुसार ‘कुछ दिनो बाद सुखमय न्यायपूर्ण जीवनमें बाधाएँ उत्पन्न हो गयीं । व्यक्ति अज्ञानी और पक्षपाती हो गये । अध्ययनशून्य हो जानेसे उन्हे नियमोंका ज्ञान नहीं रहा । सभी मनमाना नियम लागू करने लगे । अतः लिखित नियमकी आवश्यकता पडी । एक निष्पक्ष न्यायाधीश अपेक्षित होने लगा । निर्णयको कार्यान्वित करनेके लिये पुलिसकी भी आवश्यकता हुई । तब समझौता— ‘अनुबन्धद्वारा’ सभ्य समाजका निर्माण कराया ।’ लॉकके मतानुसार व्यक्तियोंने अपने कुछ ही अधिकार सभ्य समाजको समर्पित किये । नैसर्गिक नियमोंके अनुसार सभ्य समाजको नियम निर्माण करके निश्चित निष्पक्ष न्यायाधीश नियुक्त करने एवं निर्णयको कार्यान्वित करनेका अधिकार दिया गया । परतु नैसर्गिक नियमोंके लङ्घन तथा व्यक्तिगत सम्पत्तिपर आघात करनेका अधिकार उस समाजको नहीं दिया गया ।’ लॉकने नैसर्गिक नियमोंको सर्वव्यापक एवं सर्वोपरि बतलाया । व्यक्तिगत सम्पत्तिकी सुरक्षाके लिये ही व्यक्तिने सभ्य समाजकी स्थापना की और असुविधासम्बन्धी उक्त तीनो अधिकारोका परित्याग किया तथा बहुमतका निर्णय स्वीकार करनेका भी नियम स्वीकार किया । यह सभ्य समाज कुछ व्यक्तियोका समूह था; परन्तु इस समूहको यह अनुभव हुआ कि वह असुविधाओ- को दूर करनेमें असमर्थ है । कारण कि न तो सैकड़ो मनुष्य नियम ही निर्माण कर सकते हैं और न न्यायालय और कार्यपालिकाका ही काम कर सकते हैं । इसीलिये सभ्य समाजने व्यवस्थापिका सभा और संसद्की स्थापना की । इसी सभाको नियम-निर्माणका अधिकार दिया गया । सभ्य समाजके समान ही यह सभा भी नैसर्गिक नियमों एवं व्यक्तिगत सम्पत्तिके अधिकारोका लङ्घन नहीं कर सकती थी। नैसर्गिक नियमोंके अनुसार कानून बनाना ही उसका काम था । व्यवस्थापिका सभाकी बैठकें स्थायी नहीं होती थीं; किंतु आवश्यकताओंके अनुसार होती थीं । इसीलिये संसद्ने एक स्थायी कार्यपालिकाकी स्थापना की । इसका कार्य नियमोंको कार्यान्वित करना था । कुछ परिस्थितियोंमें वह नियम- निर्माणमें भी भाग लेती थी । संसद्द्वारा नियुक्त न्यायाधीश नैसर्गिक नियमोपर आश्रित लिखित नियमोंके अनुसार निर्णय करते थे । इस प्रकार संसद्, कार्य- पालिका, न्यायपालिका—राज्यके इन तीनो अङ्गोंकी स्थापना हुई ।