मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षुद्राः सन्ति सहस्रशो स्वभरणव्यापारमात्रोद्यताः । स्वार्थो यस्य परार्थ एव स पुमानेकः सतामग्रणीः ॥ (सुभाषितावलि २८५) हाब्सके अनुसार हत्याके भयसे मनुष्यका व्यक्तिगत स्वतन्त्रताका परित्याग कर एक अनियन्त्रित शासकके शरण होना वैसा ही लगता है, जैसे एक जंगली बिल्ली- से डरकर खूँखार हिंस्र शेरकी शरण जाना । रूसोका कहना है कि ‘स्वतन्त्रता प्रकृतिकी देन है । स्वतन्त्रताका परित्याग मनुष्यताका ही परित्याग है ।’ हाब्सका सिद्धान्त न तो प्राचीन धार्मिक लोगोंने ही माना और न जडवादियोने ही। उसके मतानुसार ‘राज्यका अधिकार ईश्वरीय, धार्मिक एवं पैतृक भी नहीं और न जनतान्त्रिक ही है ।’ वस्तुतः पाश्चात्य दर्शनकार अपनी परिस्थितियोसे ऊँचे उठकर विचार कर ही नहीं सके । इसीलिये हाब्सने अपनी भीरु प्रकृतिके अनुसार ही भयमूलक ही सिद्धान्त भी स्थापित किया । जान लॉक जान लॉक (१६३२-१७०४) भी समझौतावादी था। उसे सीमित राजतन्त्रमें विश्वास था । उसका पिता ‘प्यूरिटन’ सम्प्रदायका अनुयायी था । ‘लॉक’ १६८८ की रक्तहीन क्रान्तिका दार्शनिक माना जाता है। इंग्लैंडके जेम्स द्वितीयके पदच्युत होनेपर विलियम और मेरीको राज्यपदके लिये निमन्त्रित किया गया । ‘बिल आफ राइटस्’ और ‘ऐक्ट आफ सैट्लमन्ट’ नियमोंद्वारा कार्यपालिका संसद्के अधीन बनी । संसद्का राज्यकोष, राज्यनीति तथा सेनापर पूर्ण नियन्त्रण स्थापित हुआ । इसी रक्तहीन क्रान्तिके द्वारा संसद् सत्ताधारी बनी और राजा केवल वैधानिक रह गया । यह एक प्रकारसे जनवादका आरम्भ हुआ । लॉक भी प्राकृतिक स्थिति और राज्यकी स्थिति मानता है। उसके मतानुसार ‘मनुष्य विवेकशील एवं सामाजिक प्राणी है। सत्य बोलना अच्छा, झूठ बोलना पाप है’—इत्यादि नैसर्गिक नियमोंका पालन वह आवश्यक समझता था । इन्हीं सब हेतुओंसे प्राणी शान्ति, स्वतन्त्रता एवं भ्रातृताकी ओर प्रवृत्त होता है। उसके मतानुसार ‘स्रष्टाने भूमि एव विविध पदार्थ सर्वसामान्यक प्रदान किया है । साथ ही श्रमशक्ति भी प्रदान की है । इसीके द्वारा सामान्य वस्तुओमेसे कुछको अपने उपयोग योग्य बनाता है । वही उसकी निजी सम्पत्ति होती है । उदाहरणार्थ नदीका पानी सर्वसामान्य वस्तु है । पर जब एक मनुष्य श्रमद्वारा उसकी कुछ मात्रा लाकर अपने घरमे रखता है, तो वह उसकी व्यक्तिगत सम्पत्ति होती है। श्रमके मिश्रणसे ही कोई वस्तु व्यक्तिगत सम्पत्ति बनती है । प्राकृतिक मनुष्य एक विवेकशील सामाजिक तथा नैतिक प्राणी था । वह नैतिकतापूर्ण नैसर्गिक नियमोका अनुयायी था । हाब्सके विपरीत लॉकके मतानुसार मनुष्य एक दूसरेके व्यक्तित्व एव व्यक्तिगत सम्पत्ति और अधिकारका आदान-प्रदान करते थे । वह स्थिति सुख, शान्ति, स्वतन्त्रता और भ्रातृत्वकी थी । लॉकका यह मत भारतीय भावनासे मिलता है । भारतीय दृष्टिकोणके अनुसार पहले यद्यपि राज्य, राजा, दण्ड-विधान नहीं था, परंतु कोई दण्डनीय भी नहीं था । सभी परस्पर