भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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५२ मार्क्सवाद और रामराज्य 'जो स्वार्थ त्यागकर भी परोपकार ही करते हैं, वे सत्पुरुष हैं । जो अपने स्वार्थकी रक्षा करते हुए परोपकार करते हैं, वे सामान्यलोग हैं, जो लोग स्वार्थके लिये परहितका विघात करते हैं, वे तो मनुष्य-वेषमें राक्षस ही हैं; परंतु जो लोग निष्कारण ही परहित- विघात करते हैं, वे कौन हैं—उन्हे क्या कहा जाय—यह समझमें ही नही आता ।' सामान्यलोग भले ही स्वार्थी हो, परंतु इस आधारपर कोई व्यवस्था नही की जा सकती । सामान्यरूपसे भले ही प्राणी झूठ बोलता और घाट तौलता हो, तो भी व्यवहार-व्यवस्थापक यदि झूठ बोलने और घाट तोलनेको प्रश्रय देगा तब तो अनर्थ ही होगा । इससे भी आगे सामाजिक सुख अर्थात् मनुष्य जातिके सुखके उद्देश्यसे ही प्राणीको कार्याकार्यका निर्णय करना श्रेष्ठ है। फिर भी कभी उसी कार्यसे बहुतोको सुख होता है, पर तु कुछ लोगोको दुःख भी होता है । उलूकको प्रकाशसे कष्ट होता है, तो भी प्रकाश त्याज्य नही होता । अतः 'बहुजनसुखाय' का विचार आवश्यक है । यद्यपि एक ढंगसे चलनेवाली ठीक टाइम देनेवाली घड़ी ठीक समझी जाती है, परंतु मनुष्य यन्त्र नहीं है । यहाँ तो उसके अन्तःकरणको देखा जाता है । मान लीजिये—कोई घूस देकर या चोरबाजारीसे कोई चीज खरीदकर परोपकार करता है । भले ही उससे बहुजनहित हुआ, पर इतनेसे ही घूस या चोरी न्याय नहीं हो जायगा । अमेरिकाके एक शहरमे ट्राम्बेकी बड़ी आवश्यकता थी; परन्तु जल्दी सरकारी मंजूरी नहीं मिली । व्यवस्थापकने घूस देकर मंजूरी ली और ट्राम्बे चलाया । उससे बहुत लोगोका लाभ हुआ, हित हुआ; परंतु पीछेसे घूसकी बात खुली और व्यवस्थापकको दण्ड दिया गया । एक कार्यमे गरीबका चार पैसा और अमीरका लाखों रुपया भावनाकी दृष्टिसे समान या कभी-कभी चार पैसाका दान ही अधिक महत्त्वका होता है । इसी लिये बाह्य परिणामोंकी अपेक्षा नीतिमत्ता एव बुद्धिका ध्यान होना आवश्यक है । दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय । ( गीता २।४९) छोटे कीड़ोसे लेकर मनुष्यतक प्राणियोमें देखा जाता है कि वे अपने समान ही अपनी संतानो एव जातियोकी भी रक्षा करते हैं । किसीको दुःख न देकर बन्धुओं- की यथानम्भव सहायता ही करते हैं अतः सजीव सृष्टिका यही स्वभाव है । कई कीड़ोमें स्त्री-पुरुष-भेद नही होता । उनके देहमें ही भेद होकर दूसरे कीड़े उत्पन्न होते हैं । वहाँ यही कहना पड़ता है कि संतानके लिये उनमें अपने शरीरके अंशको त्यागनेकी बुद्धि होती है । जगली जानवरो, मनुष्योमें भी ऐसी ही प्रवृत्ति होती है । इसीलिये मनुष्य परार्थमे ही सुख मानता है, जैसा कि स्पेन्सरने भी माना है । भारतीय भावनाके अनुसार परार्थ ही जिसका स्वार्थ है, वही पुरुष सत्पुरुषोंसे श्रेष्ठ है—