भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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दण्डविधान, सन्धि, विग्रह तथा नियुक्ति आदि उसीके अधिकारमे होते हैं। प्राकृतिक स्थितिमें हर समय जीवन एव सम्पत्ति खतरेमें रहती है। अतः वह राज्यकी ही शरण लेना व्यक्तियोके लिये एकमात्र परमावश्यक समझता था। इसे वह नैतिक भी मानता था। जब व्यक्तियोंने अपने अधिकार राज्यको दे दिये, तब उनका पुनः अपहरण अनैतिकता है। राज्यप्रदत्त नागरिक स्वतन्त्रतासे अधिक स्वतन्त्रता सम्भव नहीं। मनुष्योंने जीवन-रक्षाके लिये राज्यकी स्थापना की, राज्यका नियन्त्रण स्वीकार किया। अतः मृत्युभय, स्वार्थ, उपयोगिता ये ही उसके आधार हैं, इसी उपयोगिताके आधारपर वह राज्य-विरोधको न्यायसङ्गत मानता है। 'यदि राज्यका नियम नागरिक- की जीवन-रक्षापर आघात करता है तो नागरिकोको ऐसे नियमके विरोध करनेका अधिकार है।' ईश्वर एव धर्मका नियन्त्रण अस्वीकारकर अनियन्त्रित धर्महीन शासकको सुख- शान्ति एवं राज्यस्थापनाका उद्देश्य भी पूरा नहीं हो सकता। कहा जाता है कि धर्म और ईश्वर माननेसे प्राणीका विचार करनेका अवकाश नहीं रहता; परंतु धर्म एव ईश्वरका अस्तित्व स्वीकार करते हुए भी हिताहित सुव्यवस्थाका पूर्ण विचार करनेका सदा ही अवकाश रहता है। विचारपूर्वक ही प्रत्येक कार्यमें प्रवृत्त होना आवश्यक है। फिर भी अनियन्त्रण, उच्छृङ्खलतासे हटकर किसी ढंगके भी नियन्त्रण- का अङ्गीकार करना श्रेष्ठ है। इसके अतिरिक्त हॉब्सका व्यक्तियोके सम्बन्धका वर्णन एकाङ्गी भी है। अपने बन्धुओंकी बरबादीसे सुख पानेवाले लोगोंकी संख्या वस्तुतः सदा ही कम थी। बच्चों एव बन्धुओकी मृत्युपर प्रसन्न होनेवाले सोते हुए असहाय प्राणीको पाकर सर्वप्रथम मारनेकी भावना रखनेवाले मनुष्य कभी भी कम ही थे। फिर ऐसे मनुष्योंद्वारा राज्य-जैसी पवित्र संस्थाका निर्माण भी कैसे हो सकता है? रूसोका कहना है कि 'यह कैसे सम्भव है कि मनुष्य जो एक क्षण दूसरेके गलेपर छुरी मारनेके लिये तत्पर थे, वे ही दूसरे क्षण एक दूसरेके गले मिलने लगे?' मानव- इतिहासमें कायाकल्पका कोई दृष्टान्त नहीं, वस्तुतः प्रेरणा और विवेक सभी कार्योंमें प्राणियोंके साथ रहते हैं। हॉब्स एव हल्वैशियसके मतानुसार 'प्राणी परोपकार भी आत्महितके लिये ही करता है।' परंतु जब देखा जाता है कि व्याघ्र-सरीखे क्रूर प्राणी भी अपने बच्चोंकी रक्षाके लिये प्राण देनेको तैयार होते हैं तो कहना पड़ता है कि प्रेम-परोपकार प्राणियोंमें स्वाभाविक धर्म भी होते हैं। नीतिकारोंने इन्हें इस प्रकार श्रेणीबद्ध किया है- एके सत्पुरुषाः परार्थघटकाः स्वार्थं परित्यज्य ये सामान्यास्तु परार्थमुद्यमभृतः स्वार्थाविरोधेन ये। तेऽमी मानुषराक्षसाः परहितं स्वार्थाय निघ्नन्ति ये ये निघ्नन्ति निरर्थकं परहितं ते के न जानीमहे॥ (नीतिशतक ७४)