भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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५० मार्क्सवाद और रामराज्य हाब्सने राज्यका जन्म ईश्वरद्वारा न मानकर समझौतेद्वारा बताया। राजा निरपेक्ष अवश्य था; परंतु दैवी सिद्धान्तके अनुसार नहीं। संसदीय सिद्धान्तानुसार उसने राज और राजसत्ताको विभक्त नहीं माना। उसके अनुसार 'नैसर्गिक और लौकिक नियम राज्यकी तलवार बिना शब्दमात्र रह जाते हैं, अतः दीर्घकायकी घोषणाएँ ही नियम हैं। जब जनताने ही अनुबन्धद्वारा अपने अधिकार राज्यको समर्पित कर दिये, तब जनताको विरोध करनेका अधिकार कहाँ रहा ? वह अपने अधिकारोंसे च्युत हो चुकी, धर्मका भी रक्षक वही है।' इस तरह हाब्सने उस समयके गृहयुद्धकी पृष्ठभूमिमें स्थित विविध विचार-धाराओका उत्तर दिया; परंतु धार्मिक, नैसर्गिक, लौकिक, किन्ही नियमोंसे नियन्त्रित न होनेसे वह दीर्घकाय राजा मानवदेव न होकर दानव ही बन जायगा। इसीलिये भारतीय शास्त्रोने उसे धार्मिक नियमोसे नियन्त्रित रहना आवश्यक बताया। जैसे बिना नकेलका ऊँट, बिना लगामका घोड़ा, बिना ब्रेककी साइकिल या मोटर खतरनाक होते हैं, वैसे ही अनियन्त्रित शासक संसारके लिये अभिशाप होता है। जो जनता किसीको अधिकार दे सकती है, वह उद्देश्य पूरा न होनेपर उसे अधि- कारसे पदच्युत भी कर सकती है। इसीलिये वेन-जैसे उद्दण्ड शासकोको जनताने पदच्युत कर दिया था। हाब्सने राज्यको 'निरपेक्ष संस्था' कहा अर्थात् बाह्य नीति या संस्थाका उसपर प्रतिबन्ध नही होता। उसके मतानुसार 'किसी प्राकृतिक स्थितिके व्यक्तियो-जैसा राज्योका असहयोग एव स्पर्धापूर्ण सम्बन्ध रहता है। उसी तरह किसी व्यक्ति, समूह या किसी नियमद्वारा भी राज्यसत्ता सीमित नहीं होती।' सङ्घोंके सम्बन्धमें भी उसका कहना है कि 'सङ्घ प्राकृतिक मनुष्योंकी अँतडियोमें कीड़ोंके समान थे। राज्योत्पत्तिसे प्राकृतिक मनुष्योका अन्त हो गया। नये नागरिकोका जन्म हुआ। स्वभावतः प्राकृतिक मनुष्योके अँतडियोके कीड़ों (सङ्घो) का भी अन्त हो गया अर्थात् राज्यमें कोई स्वतन्त्र सङ्घ सम्भव नहीं रहा। फिर उनके द्वारा सत्ता कैसे सीमित हो सकती है? दैवी नियम, धर्म, नैसर्गिक नियम, नागरिकता, लौकिक नियमपरम्पराका भी कोई नियन्त्रण राज्यपर न रहा। इस तरह हाब्सकी राजसत्ता एक निरङ्कुश शासनसत्ता हो जाती है, जिसका कि भारतीय शास्त्रोने विरोध किया है। हाब्सके मतानुसार 'राजतन्त्रमे ही एकता, मन्त्रणा, गुप्तता, नीतिका स्थायित्व, व्यभिचारोंकी कमी और चापलूसी तथा तानाशाहीकी कमी सम्भव है। ये सब बातें नरेशको छोड़कर समूहों या संघोमे सम्भव नहीं है। यह सत्ता विभाव्य भी नही होती।' हाब्सके राज्यका अधिकार बहुत व्यापक था। वह जीवनके सभी क्षेत्रोंमे तथा विचारोंपर भी राज्यका हस्तक्षेप सह्य मानता था; क्योंकि विचारके नियन्त्रित होनेपर ही व्यक्तियोके कार्य भी नियन्त्रित हो सकते हैं और 'दीर्घकाय सत्ताधारी' ही सर्वोच्च न्यायाधीश एवं सर्वोच्च सेनापति है। विधि-निर्माण,