भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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थामस हाब्स ४९ द्वारा असह्य स्थितिसे मुक्त होनेका प्रयत्न किया। प्रेरणाका परित्यागकर विवेकको मनुष्योंने मार्गदर्शक बनाया। फलतः एकत्रित होकर एक समझौता किया और प्रत्येक व्यक्तिने शपथ दोहरायी कि यदि आपलोग अपने अधिकारोंको इसी भाँति समर्पित करनेके लिये प्रस्तुत हैं तो मैं भी अपने अधिकारोंको इस व्यक्ति या व्यक्ति-समूहको समर्पित करता हूँ।' इस शपथद्वारा प्राकृतिक स्थितिका अन्त हुआ और समाज तथा राज्यका जन्म हुआ। मानव इतिहासका एक नया अध्याय आरम्भ हुआ और एक व्यक्ति राजा हुआ। बहुसंख्यक लोगोंने समझौतेमें भाग लिया। यदि कुछ अल्पसंख्यक लोगोंने प्राकृतिक स्थितिमें ही रहनेका हठ किया तो उन्हें दण्ड मिलना अनुचित नहीं था। हाब्सके मतानुसार 'राजसत्ताधारी राजासे शपथ नहीं लिवायी गयी। व्यक्तियोंने ही शपथपूर्वक अपना अधिकार समर्पण किया। 'मरता क्या न करता' के सिद्धान्तानुसार प्राकृतिक स्थितिके मनुष्योंने भी शर्तहीन अधि- कारोंका त्याग किया। हाब्स इस सत्ताधारी व्यक्तिको 'दीर्घकाय' (मानवदेव) कहता है। दीर्घकाय (लेवियाथन) ही उसकी पुस्तकका नाम है। जैसे पीड़ित लोग देवताके सामने शपथ लेते हैं, वैसे ही प्राकृतिक स्थितिसे पीड़ित व्यक्तियोंने मानवदेवके सामने शपथ ली। जैसे देवता कोई शपथ नहीं लेता वैसे ही मानवदेवने भी शपथ नहीं ली। अतः यह पूर्ण स्वतन्त्र एवं स्वेच्छाचारी बना। हाब्सकी पुस्तकके मुख- पृष्ठपर बने चित्रमें दीर्घकायका शरीर छोटे-छोटे मनुष्योंके शरीरोंसे घिरा है। इससे विदित होता है कि यह सबका प्रतिनिधित्व करता है। उसके एक हाथमें तलवार, दूसरेमें धर्मशास्त्र—राजकीय शक्ति एवं धर्मरक्षाका प्रतीक है। दीर्घकाय मात्स्यन्याय और सभ्यताके मध्यकी दीवार है। वह समाज तथा राज्य दोनोंका ही प्रतीक है।' वस्तुतः भारतीय शास्त्रोंमें वर्णित मात्स्यन्याय एवं तदनन्तर स्थापित राज- तन्त्रका ही यह अनुकरण है। इतना भेद अवश्य है कि भारतीय दृष्टिसे मात्स्यन्यायके पहले सभी व्यक्तियोंमें सत्त्वगुणकी प्रधानता थी। सभी धार्मिक एवं ईश्वरवादी थे। सभी प्राणिमात्रको ईश्वरका पुत्र समझते थे। सभी सबके साथ समानता, स्वतन्त्रता, भ्रातृताका व्यवहार करते थे। कोई अपराधी शोषक था ही नहीं। इसलिये राजा, राज्य एवं दण्ड-विधान आदि अनावश्यक थे। धर्मनियन्त्रित जनता आपसमें ही सब काम चला लेती थी। जब उसमें सत्त्वका ह्रास हुआ, तमोगुण, रजोगुण बढ़ा, धर्म घटा, अधर्मका विस्तार हुआ, तब मात्स्यन्याय फैला। तब प्रजाने पीड़ित होकर ईश्वरसे प्रार्थना कर उसके अनुग्रहसे चन्द्र, सूर्य, इन्द्र, वरुण, कुबेर, यम आदि लोकपालोंके गुणों तथा अंशोंसे युक्त राजाको प्राप्त किया और उसे विविध प्रकारसे सम्मानित किया। महती देवता ह्येषा नररूपेण तिष्ठति। (मनु० ७।८) इत्यादि रूपसे भारतीय शास्त्रोंमें राजाका महत्त्व गाया गया है। मा० रा० ४—

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