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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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दृष्टिसे कमजोर रहता था तो वह शारीरिक कमजोरीको मस्तिष्कशक्तिसे पूरा कर लेता था । अतः प्राकृतिक स्थितिमे व्यक्तियोकी समानता थी । स्वार्थपूर्ति ही उनका लक्ष्य था । सहयोगका उनमें कोई स्थान नहीं था । स्पर्धा ही स्वार्थपूर्तिका साधन था । संघर्षद्वारा ही आधिपत्य जमाया जाता था । दूसरोद्वारा अपनी कीर्ति स्वीकृत करायी जाती थी । यदि प्राकृतिक स्थितिमें समानता न होती तो अवश्य ही एक दूसरेपर आधिपत्य जमा सकते । कोई अपनी कीर्ति दूसरोसे स्वीकृत नहीं करा सकता था । सभी स्वार्थपूर्तिके संघर्षमें लगे रहते थे । भौतिकशास्त्र एवं जीवशास्त्रकी खोजोको भी समाजशास्त्रपर लागू किया जाता था । गैलिलियो और केपलरने नक्षत्रोकी गतिविधि सम्बन्धी खोज की थी । हर्वेने रक्तसंचरणके विषयमें खोज किया था । हॉब्सने समाजशास्त्रीय गतिविधि- की खोज की । उसने मानवजीवनकी गतिविधिका वैसा व्यापक बताया जैसे नक्षत्रों तथा प्राणियोके रक्तकी । हाब्सके अनुसार 'संघर्षगति ही मानव-जीवनका सार है । जैसे नक्षत्र-गतिविधिकी अनुपस्थितिमे विश्वका संहार होता है और रक्तगति बिना मनुष्यकी मृत्यु हो जाती है, वैसे ही संघर्षके बिना भी मृत्यु हो जाती है ।' उसने इस गतिका लक्ष्य स्वास्थ्यपूर्ति एवं कीर्तिवृद्धि ही बताया । ‘इस तरह प्रकृतिकी स्थितिमें सब युद्धरत ही थे । यह एक युद्धकी स्थिति थी । उस समय व्यक्तिगत सम्पत्ति, संस्कृति, विद्या, कला, विज्ञान, आयात- निर्यात, विश्व-ज्ञान, समय ज्ञान, कुछ भी सम्भव नहीं थे । नैतिकता-अनैतिकता, भलाई-बुराई, वैध-अवैधका कुछ भी ज्ञान नही था । लोगोको हत्याका भय सदा बना रहता था । जीवन एकाकी, निर्धन, जंगली, घृणित एवं क्षणिक था, अर्थात् यह प्राकृतिक स्थिति मात्स्यन्यायकी थी । 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' का सिद्धान्त लागू था ।' हॉब्सके विश्वासानुसार 'मनुष्य एक प्रेरणाप्रभावित प्राणी है । प्रेरणा ही प्राकृतिक स्थितिकी कारण थी ।' साथ ही वह यह भी कहता है कि 'मनुष्य एक विवेकशील प्राणी है' केवल प्रेरणाकी कठपुतली नही है । इस भीषण दशामें पहुँचकर मनुष्यने विवेकका उपयोग किया और उसे नैसर्गिक नियमोंका भान हुआ । ये नियम ईश्वराज्ञा-तुल्य होते हैं । उनका पालन व्यक्तियों- के लिये अनिवार्य है ।' वैसे तो १९ नैसर्गिक नियमोको उसने गिनाया, फिर भी तीनको मुख्य मानता था । प्रथम—मनुष्यको शान्तिस्थापनाका प्रयत्न करना चाहिये । दूसरा यह कि जब अन्य व्यक्ति भी राजी हो तो प्रत्येक व्यक्तिकी शान्ति- स्थापना और व्यक्तिगत सुरक्षाके लिये अपने सब अधिकारोके त्यागके लिये प्रस्तुत रहना चाहिये । और तीसरा यह कि प्रत्येक व्यक्तिको समझौता ( इकरार- नामा ) मानना चाहिये । प्राकृतिक स्थितिसे ऊबकर मनुष्योने विवेकसे इन तीन नैसर्गिक नियमो-

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