मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआधुनिक विचार-धारा ८७ अंशतः आधार मानते थे । उपर्युक्त पक्षामें अनुबन्धको धर्मसे स्वतन्त्र नहीं माना गया, परन्तु हॉब्स ने अनुबन्धवादको धर्मसे विमुक्त कर उसे राज्यशास्त्रीय रूप दिया । 'लॉक' एव 'रूसो' ने भी इसी सिद्धान्तको विभिन्न दृष्टिकोणोंमें अपनाया । हॉब्सने निरपेक्ष राजतन्त्र, लॉकने सीमित राजतन्त्र और रूसोने प्रत्यक्ष जनवादको न्यायसंगत बताया । थामस हॉब्स (१५८८-१६७९) ब्रिटेनके गृहयुद्धकाल (१६४२-४९) का दार्शनिक था । कहा जाता है कि उसकी माताने भयभीत होकर समयसे पहले उसे जन्म दिया था, इसलिये वह भयसे अत्यधिक प्रभावित रहता था । १६४० में इंग्लैण्डकी दीर्घ संसद्की बैठकके समय ब्रिटेनसे भागनेवालोंमें वह सर्वप्रथम व्यक्ति था । उस समय वहाँ राजनियम, राजसत्ता, नागरिकता सम्बन्धी विभिन्न विचार- धाराएँ प्रचलित थीं। राजसत्ताका प्रश्न मुख्य था। स्टुअर्ट आदिके मतानुसार 'राजा ईश्वरके प्रति उत्तरदायी है, नागरिकोंके प्रति नहीं' यह विचार राजाको निरपेक्ष सत्ताधारी बनाता है। संसद्वादियोंके मतानुसार 'राजसत्ता और राजा संसद्मे निहित है । राजाकी सत्ता सीमित है।' दार्शनिकोंके अनुसार 'नैसर्गिक नियम सर्वोपरि है । कोई भी संस्था उसका लङ्घन नहीं कर सकती।' जनतन्त्रवादियोंका कहना था कि 'आज्ञापालन अनुबन्धके पालनपर आश्रित है । राज्यका जन्म अनुबन्धके द्वारा हुआ है । यदि राजा अनुबन्धका लङ्घन करे तो नागरिक राज्यका विरोध कर सकते हैं।' कैथोलिकों और काल्विनिस्टोंके अनुसार 'धर्म सर्वश्रेष्ठ है, राज्य उसके अधीन है।' ये ही मतभेद गृहयुद्धकी पृष्ठभूमिमें थे । हॉब्सने अपने कालके सर्वश्रेष्ठ प्रश्न 'राजसत्ता कहाँ निहित है' का उत्तर दिया था। हॉब्स सुव्यवस्थाको परमावश्यक समझता था । चाहे वह नरेशद्वारा स्थापित हो, चाहे क्रामवेल (१५९९-१६५८)-जैसे शासकद्वारा। राज्यके पूर्वकी स्थितिको 'प्राकृतिक स्थिति' (दि स्टेट आफ नेचर) कहते हैं । जब कोई इंजन खराब हो जाता है तो मिस्त्री उसके कलपुर्जोंको पृथक् करता है । इस क्रमसे उसे इंजिनकी खराबी मालूम पड जाती है। खराबी दूर कर फिर वह कलपुर्जोको जोडता है । हॉब्सका कहना था कि 'मनुष्य समाज और मकानमें रहते हुए भी सन्दूकमें ताला क्यों लगाता है ? सोते समय दरवाजा क्यों बन्द करता है ? इसका स्पष्ट अर्थ है कि मनुष्य एक दूसरेके प्रति विश्वास नहीं रखता । फिर जब राज्यव्यवस्थामें यह हालत है तब प्राकृतिक स्थितिमें तो कहना ही क्या ?' वह मनुष्यको स्वभावसे स्वार्थी मानता था । मनुष्य सत्ताधारी शक्तिके द्वारा ही सहयोगी बनकर रह सकता है । इसलिये प्राकृतिक स्थितिमे मनुष्य अलग-अलग ही रहते थे । उस समय न कोई व्यवस्था थी, न कोई सत्ताधारी था ।