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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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आधुनिक विचार-धारा राज्यका जन्म और सामाजिक अनुबन्ध कहा जाता है कि 'सर्वप्रथम समझौता-सिद्धान्त' या 'अनुबन्ध-वाद' ही राजनीतिक सिद्धान्त था । इसीको 'सोशल कॉन्ट्राक्ट थ्योरी' कहा जाता है। प्रजाने परस्पर समझौतेसे एक व्यक्तिको अपने सब अधिकारोको शपथपूर्वक अर्पित किया । सामन्तो और किसानोका, सामन्तो तथा राजाओका एव राजाओ और सम्राट्का सम्बन्ध समझौतोपर आश्रित था । राजा अपने सामन्तोएव प्रजाके सम्मुख सच्चरित्रता, न्याय-परायणताकी शपथ लेता था । यह परम्परा अब भी है । १३ वीं शतीके एक्वानसका कहना था कि 'राज्यका जन्म-अधिकार एवं सचालन समझौतो या अनुबन्धोपर आश्रित है । प्रथम अनुबन्धसे ईश्वरने राजसत्ता या राज्यकी स्थापना की । द्वितीय अनुबन्धद्वारा जनताने राज्यका वैधानिकरूप निर्धारित किया । तीसरे अनुबन्धद्वारा राजाकी सत्ताको जन- इच्छापर आश्रित किया गया । यदि राजा इन अनुबन्धोका उल्लङ्घन करे, तो जनता उसे सिहासनच्युत करके दूसरा राजा बना सकती है। सुव्यवस्थाकी स्थापना ही राजाका मुख्य कार्य है । समाज सर्वोपरि है, शासन परिवर्तनीय ।' यह विचारधारा मध्य-युगकी है। कहा जाता है कि सोलहवीं शतीतक धर्मकी प्रधानता थी, अतः राज्यशासन भी धर्ममिश्रित था । राजा देवांश है, यह सिद्धान्त प्रचलित था । १६ वी शतीमें यूरोपमें दो धार्मिक सम्प्रदाय बने—एक परम्परावादी रोमन कैथोलिक और दूसरा प्रोटेस्टेण्ट । प्रोटेस्टेण्टसे प्यूरिटन, प्रेसबिटेरियन, ह्यूगेनोज आदि कई उपसम्प्रदाय बने । फ्रांसके ३६ वर्षव्यापी गृहयुद्धमे एक पक्ष था रोमन कैथोलिक पादरियो एव सामन्तोका और दूसरा ह्यूगेनोज व्यापारियो एवं कुछ सामन्तोका । पहला पक्ष राजभक्तिका उपदेश देता था ओर दूसरा राज्योत्पत्तिका श्रेय अनुबन्धोंको देता था । उसके अनुसार 'राजाकी सत्ता निरपेक्ष नहीं, किंतु अनुबन्धोपर आश्रित है ।' १७ वीं शतीमें ब्रिटेनमें गृहयुद्ध चला । इसमे एक पक्ष था निरपेक्ष राजतन्त्रीय लोगोंका और दूसरा संसद्-वादियोंका । पहला पक्ष राजाको ईश्वरका प्रतिनिधि मानता था । स्टूअर्ट नरेश जेम्स प्रथम इस सिद्धान्तका प्रसिद्ध दार्शनिक था । उसका एव उसके पुत्र चार्ल्स प्रथमका कहना था कि 'देवी प्रतिनिधि होनेके कारण राजाका प्रजाके जान-मालपर पूर्ण अधिकार है ।' संसद्-वादी पक्षमें व्यापारियो एवं मध्यम-वर्गका बहुमत था । यह पक्ष राजाकी सीमित सत्ता मानता था । राजा लौकिक नियमो एव ससदीय नियमोका उल्लङ्घन नहीं कर सकता । जनताकी परोक्ष या प्रत्यक्ष अनुमति बिना राजा व्यक्तिगत सम्पत्तिपर कर नहीं लगा सकता । ये लोग 'ह्यूगेनोज' के अनुबन्धोको

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