मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसद्गुणी जीवनकी स्थापनाके लिये वह साम्यवादकी स्थापना करना चाहता था। साम्यवादी राज्यमें वह सामान्य सम्पत्तिका पक्षपाती था। 'प्लेटो जब वास्तविक स्वरूपपर आता है, तब वैयक्तिक सम्पत्ति, परिवार-नियम-प्राधान्य कुछ अंशमें मानने लगता है। उसके अनुसार स्त्री-पुरुषके स्थायी (जीवनपर्यन्त) समागममे लोलुपता बढ़ती है। बालकोंकी देख-रेखका उत्तरदायित्व राज्यपर माना गया, क्योंकि आदर्श राज्यमें ही आदर्श नागरिककी स्थापना हो सकेगी। वह स्त्रियोंको घरकी सीमासे बाहर नागरिक जीवनतक ले आया। उसने उनके समानाधिकारकी स्थापना की।
उसने आदर्श स्थितिके लिये आदर्श शिक्षाकी आवश्यकता बतलायी। उसके मतानुसार '१८ वर्षतक शिक्षा, व्यायाम आवश्यक है, क्योकि इससे धैर्य, सहनशीलता तथा मनपर प्रभाव पड़ता है। इसी बीच संगीतका भी अध्ययन होना चाहिये, क्योंकि इनके द्वारा मनपर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता तथा आत्मसयम बढ़ता है। १८ से २० वर्षतक सैनिकशिक्षा, २० से ३० वर्षतक बुद्धिगम्य विषय (गणित, तर्क, ज्योतिष), ३०-३५ वर्षतक दर्शन, ३५-५० वर्षतक समाज-सेवा तथा ५० वर्षके बाद सत्यप्राप्तिके लिये संन्यास, यही उसकी शिक्षाका क्रम था। ऐसी शिक्षासे ही व्यक्ति सद्गुणी बन सकता है।
उसकी राजनीतिका सार तत्त्व है—१-आदर्श राज्य, २-ज्ञानका प्राधान्य, ३-सद्गुणी राज्य, ४-सद्गुणी नागरिक, ५-शिक्षा और ६-साम्यवाद। वह 'सामाजिक तथा आर्थिक' न्याय मानता था। उसके अनुसार 'व्यक्ति योग्यतानुसार कार्य करे और वह वस्तु ले जिसे वह लेनेके योग्य हो। उसे अन्य कामोंमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये। न्याय जीवनका क्रम है। न्यायकी विशाल धारामें समस्त जीवन ही आ जाता है।'
अरस्तू
यह यथार्थवादी दार्शनिक था। अपने युगके लगभग १५० संविधानोंका अध्ययन करके इसने 'पालिटिक्स' नामक ग्रन्थ लिखा था। इसने प्लेटोकी आगमन- पद्धतिके स्थानपर निगमन-पद्धतिको स्वीकार किया। इसके अनुसार अध्ययनके बाद आदर्शकी स्थापना करनी चाहिये। उसने राजनीतिक तथा आर्थिक दो पक्षोंसे अध्ययन कर राज्योको छः भागोंमें बाँटा। राजतन्त्र, उच्चजनतन्त्र, लोकहिताय जनवादको वह प्राकृतरूपमे मानता था। अत्याचार, सामन्ततन्त्र तथा जनवाद (डेमोक्रेसी) को उनका विकृतरूप मानता था। इस प्रकार नियमनिर्धारण तथा संविधानोंका वर्गीकरण -- ये दो देने उसकी हुईं। तीसरी देन उसकी 'शक्ति-