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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 57

४४ मार्क्सवाद और रामराज्य राजनीतिक विचारकी स्थापनामें इतिहासको आधार माना । न्याय तथा नैतिक नियम ( मेकियाविलीसे भिन्न ) को राजनीतिका मूलतत्त्व स्वीकार किया । 'प्राकृतिक नियम' प्रत्येक सम्बन्धोंके आधार हैं। इन्हें उसने नैतिक नियमोंसे अभिन्न बताया और सर्वशक्तिमान् 'प्रभु' को भी इन नियमोंके अधीन माना । राज्यके उद्देश्यमें इन्हीं नैतिक नियमोंको स्वीकार किया। इसी नैतिक नियम तथा प्राकृतिक नियमकी प्रधानतामें आधुनिक व्यक्तिवादकी नींव थी। साथ ही उसकी प्रभुता नागरिकोंके ऊपर सर्वसत्तासम्पन्न नहीं थी, अपितु नैतिक, प्राकृतिक तथा कौटुम्बिक नियमोंसे बाध्य थी। उसने राज्य और सरकारका भेद सामने रखा । राज्य-प्रभुता राज्यकी विशेषता थी; किंतु उसका प्रयोग सरकारके द्वारा ही सम्भव माना। उसने सरकारके भेदोंका वर्णन किया। इतना सब होते हुए भी वह 'प्रयोगवादी' था। इसी आधारपर उसने राजनीति और इतिहासका गठबन्धन किया । इस गठबन्धनमें उसने नक्षत्र-विज्ञानका भी माध्यम लिया । फ्रांसकी धार्मिक असहिष्णुतामें उसने धार्मिक सहिष्णुताका बीजारोपण किया। कुटुम्बको राज्यका आधार माना और कुटुम्बका आधार अर्थको । इसीलिये उसने वैयक्तिक सम्पत्तिको मूलाधिकारके रूपमें स्वीकार किया, जो आजके व्यक्तिवादकी रीढ है । उसने 'प्रभुसत्ता' को धर्मसे अलग किया और उस प्रभुसत्ताको राज्यसे ऊपर माना । धर्म, अर्थ, सङ्गठन इत्यादि सबको राज्यके अंदर माना, साथ ही प्रभुसत्ताको कुटुम्बसे बाधित भी । जब उसने यह स्वीकार कर लिया कि नैतिक तथा प्राकृतिक नियमोंका व्याख्याता व्यक्ति है, तब तो उसकी प्रभुता व्यक्तिके नीचे आ गयी । इनमें असंगतियाँ अत्यन्त स्पष्ट हैं । आल्थूसियस—अपने पूर्वविचारकोंसे भी अधिक- सेक्युलर ( लोकायत ) था। वह जनताकी प्रभुसत्ताका दार्शनिक था। वह राज्यको एक क्रममें मानता था—अर्थात् कुटुम्ब, कारपोरेशन, कम्यून प्रान्त और उसके बाद राज्य; यह क्रम था । राज्यके बाद कुटुम्ब अधिक महत्त्व रखता था । पूर्ण ढाँचा लौकिक तथा स्पष्ट था । प्रत्येक क्रमके विकासका मूल (समझौता) था। उसने राज्यको जनताका सेवक माना । उसकी रायमें 'राज्यकी शक्ति सापेक्षमूलक थी । जनताने उसे कुछ कार्य दिये हैं, जिसे करना उसका कर्तव्य था। जनता किसी प्रकारसे बद्ध नहीं थी । शासक केवल मजिस्ट्रेटके रूपमें था। उसका अधिकार यदि कुछ था तो समझौतेसे ट्रस्टीके समान ही।' इसकी राजनीति-विश्लेषणकी सर्वप्रमुख विशेषता 'लौकिक- राजनीतिकी स्पष्ट स्थापना' थी । ग्रोशस—(१५८३—१६४५) अन्तर्राष्ट्रीय नियमका जन्मदाता था। सोलहवीं शताब्दी राजनीतिकी दृष्टिसे यदि फ्रांसकी थी तो सत्रहवीं शताब्दी इंग्लैण्डकी। ग्रोशसकी

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