भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पाश्चात्य राजनीति ४३ मध्ययुगमें राजनीति और धर्ममें एकता थी । मेकियाविलीने उन दोनोंको अलग किया । धर्मके विषयमें उसका कहना था-'हमारे धर्मके अनुसार परमानन्द विनम्रता, तुच्छता और सांसारिक विरक्ततामें मिलती है। उनके स्थानपर रोमनचर्चने आत्माकी शान-शौकत, शरीरकी शक्ति और उन बातोंपर अधिक जोर दिया है, जो कि मनुष्यको दुर्बल बना देती हैं।' उसके अनुसार 'राज्यको धर्मकी आवश्यकता थी, किंतु इसी रूपमें कि वह राज्यके उद्देश्यकी पूर्ति करता रहे ।' उसका कहना था कि 'राजनीति और धर्मका पृथक्करण मनुष्यके स्वाभाविक जीवनके अनुकूल है।' उसके अनुसार 'समाज और तन्निर्भर राजाकी उत्पत्ति स्वार्थके साधनार्थ हुई है ।' उसका कहना था- 'वह राज्य जो स्थायित्वके आधारपर संगठित होता है, पतनोन्मुख हुए बिना नहीं रह सकता ।' राजाको उसने सलाह दी कि 'वह पुरुषार्थमें शेर और चालाकीमें लोमड़ीकी तरह व्यवहार करे ।' यद्यपि मेकियाविलीकी निन्दा उस समय लोगोंने की, किंतु समस्त यूरोपकी राजनीति उसके परामर्शानुसार ही संचालित होती रही । इसके बाद धार्मिक सुधारका युग आता है । मार्टिन लूथर तथा काल्विन इसके प्रमुख विचारक थे । इन्होंने नैतिकताकी स्थापना की, चेष्टा की, किंतु सुधार- का जो सबसे प्रमुख दोष होता है वह इनमें भी आया । सुधारवाद परिस्थिति सापेक्ष हुआ करता है, परिस्थितियोंके अनुसार उनमें परिवर्तन होते हैं; अतएव उसमें एकात्मकता कभी नहीं आती । लूथर और काल्विन दोनों ही लौकिक राजनीतिको नहीं चाहते थे, किंतु उनके अनुयायी आगे चलकर लौकिक नीतिके प्रतिष्ठापक बने । कारण यह था कि 'विचार-विशेषके विपरीत आचरण करनेवाले राज्य' का इन्होंने खण्डन किया था । फल यह हुआ कि इनका राजशक्तिसे संघर्ष हो गया । तब इन्होंने राजशक्तिको दैवीसिद्धान्तसे नीचे ले आनेवाले सिद्धान्तका प्रतिपादन किया । इसमें स्वभावतः लौकिक राजनीतिका प्रतिपादन हो गया । जानबोदाने राज्यकी आन्तरिक प्रभुताकी स्थापना की । बाह्य प्रभुताका स्पष्टीकरण ग्रोससके द्वारा हुआ । राजनीतिशास्त्रकी गतिमें इसने मध्ययुगीन तथा आगामी प्रवृत्तियोंका समन्वय करना चाहा । परिणाम यह हुआ कि इसमें स्वभावतः विरोध हो गया, फिर भी उसने राजनीतिशास्त्रके विकासमें बड़ा योग दिया । उसने जो कुछ कहा स्पष्ट तथा तर्कपूर्ण ढंगसे कहा । इससे वह एक शुद्ध राजनीतिक विचारक कहा जा सका । किंतु अन्तिम समयमें 'पालिटिक्स' में काम करनेके कारण दलीय राजनीतिको भी उसने दार्शनिक रूप देना चाहा । फलतः इनमें 'वदतोव्याघात' उत्पन्न हो गया । उसने इतिहासका विकासवादी सिद्धान्त सामने रक्खा । इसके पूर्व यह विश्वास था कि मनुष्य स्वर्णयुगसे पतनकी ओर अग्रसर हो रहा है । उसने