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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 54, कुल 866 में से

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अफलातून और अरस्तू दोनोंने इस बातपर जोर दिया था कि राज्य और व्यक्तिमे किसी प्रकारकी विभिन्नता न थी, दोनों एक ही थे । कुछ तार्किकोंने इसपर जोर दिया था कि 'राज्य और व्यष्टिके स्वार्थमे विभिन्नता थी' और कुछने इस बातपर कि 'राज्यकी उत्पत्ति समझौताद्वारा हुई थी।' अफलातूनने प्रथम पक्षके तार्किकोंको यह उत्तर दिया था कि राज्य व्यक्तिका बृहत्तम रूप था और व्यक्ति राज्यका सूक्ष्मरूप । इस प्रकार दोनोंके स्वार्थोंमें किसीका विरोध न था । अरस्तूने दूसरे वर्गके तार्किकोंको यह उत्तर दिया कि 'राज्य एक प्राकृतिक संस्था है, जिसका सावयवीकी भाँति क्रमशः विकास हुआ है।' दोनों विचारक राज्यकी आवश्यकताको स्वीकार करते थे । अरस्तूके मतानुक्ल यदि कोई व्यक्ति राज्यके बिना रह सकता था, तो वह या तो देवता था या दानव । अफलातूनके विचारोंमें नीतिशास्त्रोंकी प्रधानता थी । अरस्तू अफलातूनकी भाँति क्रान्तिकारी नहीं था । उसके राज्यमें राजनीति, नीतिशास्त्र और अर्थशास्त्र--तीनोंका समन्वय इस प्रकार किया गया था कि मनुष्य सुखमय जीवनको प्राप्त कर सके । यूनानी विचारकोंने मध्यवर्ती मार्गका प्रतिपादन बड़े प्रभावशाली ढंगसे किया था। इसका आरम्भ डेल्फीकी देववाणियोंसे हुआ और सोलनके सुधारोंमे यह कार्यरूपमें परिणत किया गया । अरस्तू और अफलातूनने भी इस सिद्धान्तका अनुसरण किया । अफलातून और अरस्तू दोनों अपने समयके राज्योंसे सन्तुष्ट न थे । अतः उन्होंने ऐसे राज्योंका चित्रण किया, जिनके अनुरूप वे वास्तविक राज्योको परिवर्तित करना चाहते थे । संरक्षकोंको निःस्वार्थसेवामें रत रखनेके लिये अफलातूनने आर्थिक और सामाजिक साम्यवादके सिद्धान्तका प्रतिपादन किया था । अरस्तू इसका विरोधी था । उसके मतसे 'मानसिक विकार, मानसिक ओषधियों- द्वारा ही दूर किये जा सकते हैं।' दोनो ही शिक्षाको राज्यके अधीन मानते थे। इस्टोइक दार्शनिकोंने समस्त मनुष्योंकी समानताके सिद्धान्तका प्रतिपादन किया था। यूनानी विचारक मनुष्यकी स्वतन्त्रताके समर्थक थे । राजनीतिक विचारोंमे रोमकी प्रमुख देन कानून है । उसका प्रभाव आज भी समस्त यूरोपपर छाया हुआ है । यूनानियोंका राजनीतिक आदर्श व्यक्ति और राष्ट्रकी स्वतन्त्रताका आदर्श था। रोमन लोगोने स्वतन्त्रताके स्थानपर व्यवस्थाके आदर्शको अपनाया । यूनानी लोग नगर-राज्योंकी ही सरकारोसे परिचित थे । उनमें शासको और शासितोका सम्पर्क था। इसके विपरीत रोमने एक विशाल साम्राज्यका निर्माण करके वहींसे उसका शासन-संचालन किया । यूनानियोंका दृष्टिकोण नगर-राज्योंकी सीमासे परिमित होनेके कारण संकुचित था । रोमन लोगोंने संसारके एक बडे भागकी राजनीतिक एकता स्थापित करके लोगोंके हृदयमें यह धारणा उत्पन्न कर दी थी कि समस्त संसारको एक ही सूत्रमें बाँधा जा सकता है ।

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