भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 270, कुल 866 में से

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भावना फैलानेका महापुरुष लोग प्रयत्न करते आ रहे हैं । अमीर-गरीब सभी दुष्ट एव शोषक हो सकते हैं । वे ही पोषक एवं सज्जन भी हो सकते हैं । अधिकांशरूपमें अभावसे पीड़ित होकर गरीब ही चोरी, डाका, व्यभिचार आदिमें पकड़े जाते हैं । अमीरोंके पास वस्तुओंकी कमी न होनेसे उन्हे डाका, चोरी आदि- की आवश्यकता बहुत कम पड़ती है । बहुत-से गरीब भी सदाचारी, सत होते हैं । वैसे ही धनवान् भी सदाचारी होते हैं । वस्तुतस्तु विद्वान्, बलवान्, धनवान्, शक्तिमान्‌की विद्या, बल, धन, शक्ति- स्वतः न अच्छे ही होते हैं और न बुरे । दुष्ट पुरुषोंकी विद्या विवादके लिये, धन घमंडके लिये, शक्ति दूसरोंको उत्पीड़ित करनेके लिये होती है, परंतु सत्पुरुषोंकी विद्या ज्ञान फैलाने, उनका धन दान देने तथा दूसरोंकी सहायता पहुँचानेके काममें आता है और उनकी शक्ति दीनों, दुखियों और आर्तोंके रक्षणके काममें आती है । इसलिये 'धनवान्, बलवान्, शक्तिमान् सब शोषक होते हैं,' यह सिद्धान्त ही गलत है । मजदूर भी अधिनायकतन्त्र स्थापित कर अपने विरोधियोंका शोषण ही नहीं खात्मातक कर देते हैं । साधारण लोग अपने खाने-कमानेके काममें लगे रहते हैं । न उनमें शोषक होनेकी ही भावना है और न शोषित ही होनेकी । अतः यह विभाजन ही गलत है । हाँ, धर्म- भावना कम होने, सत्त्वगुण घटने, आध्यात्मिकता मिटने और भौतिकता बढनेसे 'मात्स्यन्याय' अवश्य फैल जाता है; जिसका अभिप्राय होता है कि जैसे जलमें बड़ी मछलियाँ छोटी मछलियोंको खा लेती हैं, अरण्यनिवासी प्रबल जानवर दूसरे छोटे जन्तुओंको भक्षण कर लेते हैं, उसी प्रकार समाजके बलवान् मनुष्य भी दुर्बलोंके भक्षक बन जाते हैं । मूषकका मार्जार, मार्जारका श्वान, श्वानका व्याघ्र भक्षक बनता है । व्याघ्रका सिंह और सिंहका भी शार्दूल भक्षक होता है । सर्पके मुखमें पड़ा हुआ मेढक भी आसपासके उड़ते हुए मच्छरोंको खानेके लिये मुख फैलाता है । यहाँ सर्प, मेढक, मच्छर सभी अपेक्षाकृत शोषक भी हैं और शोषित भी । मत्स्योंमें भी सहस्रों मनकी मछली ( तिमि आदि ) सैकड़ों मनकी मछलीका भक्षण कर लेती हैं । मनोंकी मछली सेरोंकी मछलीको, सेरोंकी मछली छटांककी मछलीको और वह भी तोलोंकी मछलीका भक्षण करती है । यहाँ सभीमें शोषक-शोषित भाव है । इसी तरह धनमें भी तारतम्य है । कोटिपतिकी अपेक्षा अर्बुदपति प्रबल है, तब अर्बुदपतिको शोषक और कोटिपतिको शोषित कहना पड़ेगा । इसी तरह कोटिपतिको शोषक एव लक्षपतिको शोषित कहना पड़ेगा । लक्षपतिकी अपेक्षा सहस्रपति, उसकी अपेक्षा शतपति आदिकोंको शोषित कहा जायगा । फिर तो

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