मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५६ मार्क्सवाद और रामराज्य रूप्यकपति और वराटिका ( कौड़ी ) पतिमें भी शोषक-शोषितकी कल्पना करनी पड़ेगी। यदि वर्ग-विध्वंसके सिद्धान्तानुसार शोषककी समाप्ति अभीष्ट है, तब तो आरण्यक व्याघ्र, सिंह, शार्दूल आदिको समाप्त करके केवल मच्छरोंका ही साम्राज्य स्थापित करना पड़ेगा। इसी प्रकार बड़ी मछलियोको समाप्त करके केवल रत्ती-रत्तीकी मछलियोको ही रखना पड़ेगा। इसी तरह समाजके बलवान्, धनवान्, विद्वानोको समाप्त करके केवल अति निर्बल, निर्बुद्धि, निर्धनोंका ही राज्य बनाना होगा। परन्तु यह क्या है ? राष्ट्रका उत्थान है या पतन ? आदर्श शासनोंका कभी भी ऐसा लक्ष्य न था। राष्ट्रके सिंह, शार्दूल समाप्त हो जायें, केवल शृगाल, मच्छर आदि रह जायें—यह आदर्श नहीं। सिंह-व्याघ्र भी रहे, श्वान-शृगाल भी रहे, अपने-अपने कर्मोंके अनुसार प्रबल-निर्बल, बुद्धिमान् निर्बुद्धि-सभी रहें; पर एक-दूसरेके पोषक हो, शोषक नहीं। इसीलिये रामराज्यमें बाघ-बकरे एक घाटपर पानी पीते थे; गज-पंचानन साथ-साथ रहते थे। सर्प-नकुल, चूहा-बिल्ली सब एक दूसरेके रक्षक थे, भक्षक नहीं, यही आदर्श शासन है। वस्तुतः मात्स्य-न्याय मिटानेके लिये ही राजा एवं राज्यकी व्यवस्था हुई थी। धर्मस्थापनके द्वारा सत्त्व विस्तार करके अहिंसाकी भावना दृढ करके ही राजा मात्स्यन्याय मिटाता था। वह सबको एक दूसरेका पूरक बनाता था, बैर मिटाकर, सौहार्द उत्पन्न कर शासन, शोषण एवं उत्पीड़नका अन्त करता था— सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती ॥ बयरु न कर काहू सन कोई। राम प्रताप विषमता खोई ॥ फूलहिं फलहिं सदा तरु कानन। रहहिं एक सँग गज पंचानन ॥ चूहे-बिल्ली भी एक एक दूसरेके हित-चिन्तक, उपकारक तथा पोषक बने हुए थे। अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्संनिधौ वैरत्यागः।' (योगदर्श० २।३५) मनसा, वाचा, कर्मणा अहिंसाकी प्रतिष्ठा होनेपर अहिंसकके समीपमें परस्पर विरोधी हिंस्र प्राणियोके भी वैर छूट जाते हैं। रामायणके निशाकर या चन्द्रमा मुनिके आश्रममें यह आदर्श प्रत्यक्ष उपलब्ध होता था। रामराज्यमें तो यह आदर्श था ही। हाँ, जिनमें रज, तमकी मात्रा अधिक होती थी, धार्मिकताका सस्कार आनेमें विलम्ब होता था, उन्हे उग्र दण्ड देकर शोषणसे विरत किया जाता था। इसीलिये नीति शास्त्रोंमें दण्ड-विधान भी है। सरकस आदिमें देखा ही जाता है कि एक बकरी शेरके सिरपर चढकर हरी पत्ती खाती है, विद्युत्- सृणि (बिजलीके हंटर) के डरसे शेर चुप रहता है, बकरीको नहीं मारता।