भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 272, कुल 866 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 272

वर्ग-संघर्ष २५७ इसलिये वर्गसङ्घर्ष वर्ग-विद्वेष फैलाकर वर्ग-विध्वंसका प्रयत्न कभी भी आदर्श वस्तु नहीं है । आधुनिक यन्त्रीकरण युगमें भी उत्पादनमें पूँजी और श्रम दोनों कारण हैं । पूँजी बिना श्रमजीवी कुछ नहीं कर सकते । श्रमजीवी विना पूँजी भी कुछ नहीं कर सकती । फिर भी श्रमजीवीको जीवनके लिये धन चाहिये । पूँजीपतिको उत्पादनके लिये श्रम चाहिये, अतः पूँजीपति धनसे श्रम खरीदता है । इसीलिये वह मजदूरको निश्चित मजदूरी देकर आयका भागी होता है । कम्यूनिज्ममें भी पूँजीवाद चलता है । भेद इतना ही है कि पूँजीवादमें अनेक पूँजीपति होते हैं, साम्यवादमें सरकारी पदाधि- रूढ लोगोंका एक गिरोह ही पूँजीपति होता है और इसके लिये तोड़-फोड़की परम्परा चलती रहती है । यदि वस्तुतः शासन-परिषद् और मजदूर-अधिनायकोंमें साधारण मजदूरोसे कोई विशेषता न हो तो फिर सङ्घर्ष क्यों ? फिर ट्राटस्की, वेरिया आदिका सफाया क्यो ? विरोधी व्यक्ति या समूहको समाप्त कर कुछ लोगोके ही धाक जमानेका क्या अर्थ है ? भारतीय शास्त्रोंके अनुसार यद्यपि सब वस्तु सबकी नहीं होती, इसीलिये भूपति, भूपाल सब नहीं होते । भूमि, सोना, लोहा, ताँबा, पेट्रोल आदि- की खाने भी सबकी नहीं होतीं, अबतक भी सबकी नहीं मानी जातीं । प्राकृतिक वस्तु सबकी होती है, यह पक्ष मान्य होनेपर पुत्री-पत्नी आदिमें सबका हिस्सा मानना उपस्थित हो जाता है । अतएव प्रसिद्ध पितृ-पितामहादिकी सम्पत्ति- में ही प्राणियोका अधिकार होता है। उसमे भी अधिकारके साथ कर्तव्य लगे हैं, ‘पिण्डं दत्त्वा धनं हरेत्’ पिण्ड दानादिक श्राद्ध करनेका जो अधिकारी है, वही पितृ-पितामहादिके दायका अधिकारी होता है । उनमें भी राजा आदिके प्रथम पुत्र ही मुख्य अधिकारी होते हैं । अन्य पुत्रोंको पोषण-गुजारा मिलता है । पिता पुत्रको ‘त्वं यज्ञस्त्व लोकस्त्व ब्रह्म’ इत्यादि वाक्योंद्वारा अपने अकृत या अर्धकृत वेदाध्ययन, धर्मानुष्ठान, लोक साधनादि- के सम्पादनका उत्तरदायित्व देता है और पुत्र ‘अह यज्ञः, अह लोकः, अहं ब्रह्म’ इत्यादि शब्दोंद्वारा उस उत्तरदायित्वको अङ्गीकार करता है । तभी वह सम्पत्तिका भी उत्तराधिकारी होता है । जो सम्पत्ति तो ले लेता है, परंतु कर्तव्यपालन नहीं करता; स्वाध्यायाध्ययन, धर्मानुष्ठान, लोकार्जनादि कर्तव्योंसे पराङ्मुख होता है, उस असाधुसे धन छीनकर कर्तव्यपालनमें तत्पर किंतु अर्थपीडित साधुपुरुषको प्रदान करनेका राजाको अधिकार है— योऽसाधुभ्योऽर्थमादाय साधुभ्यः सम्प्रयच्छति । स कृत्वा प्लवमात्मानं सन्तारयति तावुभौ ॥ (मनु० ११ । १८) मा० रा० १७