भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 275, कुल 866 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 275

के अनुसार अतिरिक्त आयका पञ्चधा विभाजन कहकर समन्वयकी व्यवस्था की गयी है । रामराज्यका यह आदर्श था कि कोई किसीका शोषक, भक्षक या अनिष्ट- चिन्तक न बने । एक-दूसरेके पोषक, रक्षक, शुभचिन्तक बने । कारण सब वेदादिशास्त्रोंके अनुसार अपने धर्मपर ही चलते थे, कोई किसीसे वैर नहीं करता था । परस्परकी विषमता दूर हो चुकी थी । जाति, सम्प्रदाय, पार्टी आदि बिना सबके साथ सुन्दर व्यवहार होता था । दैहिक, दैविक, भौतिक किसी प्रकारका ताप किसीको नहीं होने पाता था । निरपराध श्वानको भी मारनेवाला दण्डका भागी होता था, चाहे वह विद्वान्, बलवान् धनवान्, ब्राह्मण हो या और कोई । यों तो योग्यता एव आवश्यकताके अनुसार काम, दाम और आराममें तारतम्य हो सकता था; किंतु काम, दाम और आरामकी कमी किसीको न होती थी । दरिद्र, हीन, दुखी या मूर्ख कोई न था— नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना । नहि कोउ अबुध न लच्छन हीना ॥ रामराज्यके आदर्श चाहनेवालोंके द्वारा आज भी विविध वैषम्य और आर्थिक असंतुलन दूर करनेका प्रयत्न होना ही चाहिये । सदाका नियम है— जब किसी अङ्गमें रक्त, मांस, अस्थिकी कमी होती है तो आवश्यकतानुसार दूसरे अङ्गसे उसकी पूर्ति कर ली जाती है । इसीलिये सब अङ्ग परस्पर पोषक माने जाते हैं, शोषक नहीं । एकको कष्ट होनेसे सभी कष्ट मानते हैं । सब सहायताके लिये तत्पर रहते हैं । चरणमें काँटा लगता है तो नेत्र देखनेमे, हाथ काँटा निकालनेमें, मुख फूत्कारद्वारा दर्द दूर करनेमें लग जाते हैं । इसीलिये किसी अङ्गमें दर्द या दोष आनेपर दर्द और दोष मिटानेका प्रयत्न किया जाता है, अङ्गच्छेदके लिये नहीं, किंतु लाखों खर्च करके भी एक अगुलीके दर्द दूर करनेका यत्न किया जाता है । अङ्ग-भङ्ग करनेसे सर्व शरीरको बचाया जाता है । इसीलिये कहा जाता है, नासिकापर हुई फोड़ाफुसियोको दूर करना उचित है, नाक काटना उचित नहीं । सिर-दर्द दूर करनेके लिये सिर काटना उचित नहीं । सिर बना रहे दर्द दूर हो, यही चिकित्सा है । रोगी मिटाकर रोग मिटाना बुद्धिमानी नहीं । रोगीका रोग मिटाना उचित है । रोगीको मिटाना चिकित्साका उद्देश्य नहीं है । जहाँ अनिवार्य होता है, एक अङ्ग छेद बिना अङ्गीके विकृत होनेका भय रहता है, वही अङ्ग-छेद या आपरेशनकी अनुमति होती है । इसीलिये यहाँ यज्ञ, दान आदिकी पद्धति थी । इसके द्वारा आर्थिक असंतुलन दूर होता रहता था । एक सम्राट् भी सर्वस्वदक्षिण याग करनेके पश्चात् सामान्य मृन्मय पात्रसे ही अपना काम चलाता था ।