भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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भूमिका दान शतपथ, ऐतरेय आदिमें स्पष्ट वर्णित है ! 'श्रीमद्भागवत' में ही आता है कि होता आदि ऋत्विजोंके लिये प्राची आदि सभी दिशाओंका दान श्रीरामचन्द्रने किया था, जिससे समस्त राज्यका दान सुस्पष्ट प्रतीत होता है । सार यही है कि विशिष्ट वस्तुओंमें विशिष्ट लोगोंका अधिकार होनेपर भी सर्व- साधारणको भी उचित विकासका अवकाश मिलना चाहिये । इसीलिये खेती, व्यापार उद्योग या सेवा-सर्विस आदि द्वारा सबके ही निर्वाहका उपाय होना चाहिये । भले ही उसे किसी व्यक्तिकी सेवा न कहकर राष्ट्रकी सेवा कहा जाय । पारिश्रमिकको मजदूरी, या वेतन न कहकर हिस्सा कहा जाय । आजकल नौकरी, मजदूरी, गुलामी आदि शब्दोंसे बड़ी घृणा है, पर चल रहा है नामान्तरसे वही । वैसे सिद्धान्त है 'समानमें अङ्गाङ्गीभाव, शेष-शेषी भाव नहीं होता ।' इसीको सेव्य-सेवकभाव, उपकार्योपकारक तथा भृत्य एवं स्वामीका भाव भी कहा जाता है । चेतन-चेतन समान है । उनमें शेष शेपीभाव न होना जो उचित मानते हैं, उनके यहाँ भी शेष-शेषीभाव अवश्य चलता है । राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री, फील्डमार्शलकी रुचिके अनुसार चलनेवाले, उनकी आज्ञा माननेवाले, सभी उनके शेष या अङ्ग ही हैं, चाहे उनका नाम जो रखा जाय । वस्तुतः प्राणिमात्र अपनी सीमित सत्ताको अपरिमित, अनन्त सत्ता बनाना चाहता है । सीमित ज्ञान आनन्द एवं परिमित स्वतन्त्रता एव सीमित शासन 'हुकूमत' को निःसीम बनाना चाहता है । शब्दोंका भेद अवश्य रहता है-छोटोंसे हुकूमत स्वीकार कराना चाहता है । माता, पिता, गुरुओंसे अपना अनुरोध या प्रार्थना स्वीकार कराना चाहता है । फल दोनोंका एक ही है । उसकी रुचिके अनुसार छोटे-बड़े सभी काम करें । शब्दोंका ही हेरफेर है । पहले बिना पारिश्रमिक दिये काम करानेको बेगार कहा जाता था, आजकल बिना पारिश्रमिक दिये बड़े-बड़े लोगोंसे भी काम कराया जाता है, उसे बेगार न कहकर 'श्रमदान' कहा जाता है । प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष दबावोंसे यह श्रमदान सबको करना पड़ रहा है । रामराज्यके अनुसार यद्यपि पूँजी, भूमि, खान आदि सबका नहीं है, जिन्हें पितृ-पितामहादि परम्परासे प्राप्त है, अथवा जिन्होंने जय, क्रय, पुरस्कार आदिके रूपमें पाया है, उनका है । उनसे होनेवाली आय मालिकको ही मिलनी चाहिये, साथ ही श्रमकी उचित कीमत उन्हें देनी पड़ती है । श्रमके मूल्य-निर्णयमें आवश्यकतानुसार आर्थिक असंतुलन दूर करनेकी नीतिसे एवं उचित रूपसे सबका ही जीवनस्तर उन्नत बनानेकी दृष्टिसे राज्योंका भी हस्तक्षेप हो सकता है । उधर मालिकोंके घरमें भी— धर्माय यशसेऽर्थाय कामाय स्वजनाय च । पञ्चधा विभजन् वित्तं इहामुत्र च मोदते ॥ ( आपस्त० ८ । ०