मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
भूमिका दान शतपथ, ऐतरेय आदिमें स्पष्ट वर्णित है ! 'श्रीमद्भागवत' में ही आता है कि होता आदि ऋत्विजोंके लिये प्राची आदि सभी दिशाओंका दान श्रीरामचन्द्रने किया था, जिससे समस्त राज्यका दान सुस्पष्ट प्रतीत होता है । सार यही है कि विशिष्ट वस्तुओंमें विशिष्ट लोगोंका अधिकार होनेपर भी सर्व- साधारणको भी उचित विकासका अवकाश मिलना चाहिये । इसीलिये खेती, व्यापार उद्योग या सेवा-सर्विस आदि द्वारा सबके ही निर्वाहका उपाय होना चाहिये । भले ही उसे किसी व्यक्तिकी सेवा न कहकर राष्ट्रकी सेवा कहा जाय । पारिश्रमिकको मजदूरी, या वेतन न कहकर हिस्सा कहा जाय । आजकल नौकरी, मजदूरी, गुलामी आदि शब्दोंसे बड़ी घृणा है, पर चल रहा है नामान्तरसे वही । वैसे सिद्धान्त है 'समानमें अङ्गाङ्गीभाव, शेष-शेषी भाव नहीं होता ।' इसीको सेव्य-सेवकभाव, उपकार्योपकारक तथा भृत्य एवं स्वामीका भाव भी कहा जाता है । चेतन-चेतन समान है । उनमें शेष शेपीभाव न होना जो उचित मानते हैं, उनके यहाँ भी शेष-शेषीभाव अवश्य चलता है । राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री, फील्डमार्शलकी रुचिके अनुसार चलनेवाले, उनकी आज्ञा माननेवाले, सभी उनके शेष या अङ्ग ही हैं, चाहे उनका नाम जो रखा जाय । वस्तुतः प्राणिमात्र अपनी सीमित सत्ताको अपरिमित, अनन्त सत्ता बनाना चाहता है । सीमित ज्ञान आनन्द एवं परिमित स्वतन्त्रता एव सीमित शासन 'हुकूमत' को निःसीम बनाना चाहता है । शब्दोंका भेद अवश्य रहता है-छोटोंसे हुकूमत स्वीकार कराना चाहता है । माता, पिता, गुरुओंसे अपना अनुरोध या प्रार्थना स्वीकार कराना चाहता है । फल दोनोंका एक ही है । उसकी रुचिके अनुसार छोटे-बड़े सभी काम करें । शब्दोंका ही हेरफेर है । पहले बिना पारिश्रमिक दिये काम करानेको बेगार कहा जाता था, आजकल बिना पारिश्रमिक दिये बड़े-बड़े लोगोंसे भी काम कराया जाता है, उसे बेगार न कहकर 'श्रमदान' कहा जाता है । प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष दबावोंसे यह श्रमदान सबको करना पड़ रहा है । रामराज्यके अनुसार यद्यपि पूँजी, भूमि, खान आदि सबका नहीं है, जिन्हें पितृ-पितामहादि परम्परासे प्राप्त है, अथवा जिन्होंने जय, क्रय, पुरस्कार आदिके रूपमें पाया है, उनका है । उनसे होनेवाली आय मालिकको ही मिलनी चाहिये, साथ ही श्रमकी उचित कीमत उन्हें देनी पड़ती है । श्रमके मूल्य-निर्णयमें आवश्यकतानुसार आर्थिक असंतुलन दूर करनेकी नीतिसे एवं उचित रूपसे सबका ही जीवनस्तर उन्नत बनानेकी दृष्टिसे राज्योंका भी हस्तक्षेप हो सकता है । उधर मालिकोंके घरमें भी— धर्माय यशसेऽर्थाय कामाय स्वजनाय च । पञ्चधा विभजन् वित्तं इहामुत्र च मोदते ॥ ( आपस्त० ८ । ०
के अनुसार अतिरिक्त आयका पञ्चधा विभाजन कहकर समन्वयकी व्यवस्था की गयी है । रामराज्यका यह आदर्श था कि कोई किसीका शोषक, भक्षक या अनिष्ट- चिन्तक न बने । एक-दूसरेके पोषक, रक्षक, शुभचिन्तक बने । कारण सब वेदादिशास्त्रोंके अनुसार अपने धर्मपर ही चलते थे, कोई किसीसे वैर नहीं करता था । परस्परकी विषमता दूर हो चुकी थी । जाति, सम्प्रदाय, पार्टी आदि बिना सबके साथ सुन्दर व्यवहार होता था । दैहिक, दैविक, भौतिक किसी प्रकारका ताप किसीको नहीं होने पाता था । निरपराध श्वानको भी मारनेवाला दण्डका भागी होता था, चाहे वह विद्वान्, बलवान् धनवान्, ब्राह्मण हो या और कोई । यों तो योग्यता एव आवश्यकताके अनुसार काम, दाम और आराममें तारतम्य हो सकता था; किंतु काम, दाम और आरामकी कमी किसीको न होती थी । दरिद्र, हीन, दुखी या मूर्ख कोई न था— नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना । नहि कोउ अबुध न लच्छन हीना ॥ रामराज्यके आदर्श चाहनेवालोंके द्वारा आज भी विविध वैषम्य और आर्थिक असंतुलन दूर करनेका प्रयत्न होना ही चाहिये । सदाका नियम है— जब किसी अङ्गमें रक्त, मांस, अस्थिकी कमी होती है तो आवश्यकतानुसार दूसरे अङ्गसे उसकी पूर्ति कर ली जाती है । इसीलिये सब अङ्ग परस्पर पोषक माने जाते हैं, शोषक नहीं । एकको कष्ट होनेसे सभी कष्ट मानते हैं । सब सहायताके लिये तत्पर रहते हैं । चरणमें काँटा लगता है तो नेत्र देखनेमे, हाथ काँटा निकालनेमें, मुख फूत्कारद्वारा दर्द दूर करनेमें लग जाते हैं । इसीलिये किसी अङ्गमें दर्द या दोष आनेपर दर्द और दोष मिटानेका प्रयत्न किया जाता है, अङ्गच्छेदके लिये नहीं, किंतु लाखों खर्च करके भी एक अगुलीके दर्द दूर करनेका यत्न किया जाता है । अङ्ग-भङ्ग करनेसे सर्व शरीरको बचाया जाता है । इसीलिये कहा जाता है, नासिकापर हुई फोड़ाफुसियोको दूर करना उचित है, नाक काटना उचित नहीं । सिर-दर्द दूर करनेके लिये सिर काटना उचित नहीं । सिर बना रहे दर्द दूर हो, यही चिकित्सा है । रोगी मिटाकर रोग मिटाना बुद्धिमानी नहीं । रोगीका रोग मिटाना उचित है । रोगीको मिटाना चिकित्साका उद्देश्य नहीं है । जहाँ अनिवार्य होता है, एक अङ्ग छेद बिना अङ्गीके विकृत होनेका भय रहता है, वही अङ्ग-छेद या आपरेशनकी अनुमति होती है । इसीलिये यहाँ यज्ञ, दान आदिकी पद्धति थी । इसके द्वारा आर्थिक असंतुलन दूर होता रहता था । एक सम्राट् भी सर्वस्वदक्षिण याग करनेके पश्चात् सामान्य मृन्मय पात्रसे ही अपना काम चलाता था ।
साम्राज्ञीके भी अङ्गमें माङ्गल्य सूत्र-मात्र भूषण रह जाता था । यज्ञोंमें सदा सेवा निरत शूद्रसे मेवा लेकर, व्यापारनिरत वैश्यसे वस्तुएँ खरीदकर, क्षत्रियपर रक्षाका भार देकर, ब्राह्मणको याजनका कार्यभार देकर सभीको द्रव्य समर्पण किया जाता था ! याचक अयाचक हो जाते थे । प्रायः सब देनेकी बात सोचते थे, लेनेकी नहीं । देनेवाले हर ढंगसे देनेका रास्ता खोजते थे ! दूसरे लोग न लेनेका मार्ग खोजते रहते थे । गाढ़ी कमाईके स्वल्प धनसे भी गुजारा करना ठीक समझा जाता था । प्रतिग्रहको निन्द्य समझा जाता था । मुफ्तखोरी, हरामखोरीसे सभी भरसक बचनेका प्रयत्न करते थे । लूट, खसोट, चोरीकी तो बात कोई सोचता ही न था । दूसरेकी सम्पत्ति, हीरा, रत्न, मणि, अन्नादि रास्तेमें पड़े हो या अपने घरमें ही कोई क्यों न डाल गया हो, आवश्यकता होनेपर भी विधिपूर्वक विना पाये लेना अनुचित समझा जाता था— परान्नं परद्रव्यं वा पथि वा यदि वा गृहे । अदत्तं नैव गृह्णीयादेतद् ब्राह्मणलक्षणम् ॥ इधर भौतिकवादमें लेनेवाले हर प्रकारसे मरकर, मारकर भी लेना चाहते हैं । देनेवाले मर जाना मंजूर करते हैं, पर देना नहीं चाहते । जिसके घरमें तीन वर्षके लिये कुटुम्ब-पोषणकी सामग्री होती थी, वह शेष धन सोमयज्ञमें अवश्य खर्च कर देता था । साधारण दीन प्राणी भी अतिथि-सत्कारके लिये सदा लालायित रहता था । रन्तिदेव आदि तो ४८ दिनके निर्जल व्रतके बाद भी स्वल्प प्राप्त सामग्रीद्वारा सर्वप्रथम अतिथि-पूजा आवश्यक मानकर प्रवृत्त हुए, ब्राह्मण, अन्त्यज, पुल्कसको सब कुछ देकर सत्कार किया । मरते-दमतक ईश्वरसे यही चाहा कि 'मुझे स्वर्ग, अपवर्ग, राज्य आदि कुछ भी न चाहिये । केवल दुःखी प्राणियोंका दुःख ही मुझे मिले । मेरे शुभकर्मोंसे प्राणियोंको संतोप हो।' धर्मभावनाकी प्रधानताके कारण ही राजा शिविने कपोतकी रक्षाके लिये अपने शरीरका मास और अन्तमें अपने आपको देकर कपोतकी रक्षा करनी चाही थी । राजा दिलीप ने नन्दिनीकी रक्षाके लिये अपनेको सिंहका ग्रास बनानेका निश्चय कर लिया । इस भावनामें शोषण, उत्पीड़न, विताड़नाकी कल्पना भी नहीं हो सकती ।
आर्थिक असंतुलन
आर्थिक असंतुलन मिटानेके लिये ही शास्त्रोंमें दानका महत्त्व कहा गया है । अपनी श्रद्धासे, दूसरोंके उपदेशसे, लज्जासे, भयसे किसी तरह भी देना परम कल्याणकारी है । शास्त्रोंमें यह भी कहा गया है कि जो धनी होकर दानी नहीं और निर्धन होकर तपस्वी नहीं, ऐसे लोग गलेमें पत्थर बाँधकर समुद्रमें डुबा देने योग्य होते हैं—
२६२ मार्क्सवाद और रामराज्य द्वावम्भसि निवेष्टव्यौ गले बद्ध्वा दृढां शिलाम् । धनवन्तमदातारं दरिद्रं चातपस्विनम् ॥ ( महाभा० उद्योग० ३३ । ६० ) रामराज्यकी अर्थनीतिमें उपार्जन और उपयोग दोनों ही धर्मनियन्त्रित होते हैं। पर्वत खनन जैसे अति क्लेशसे होनेवाले स्वल्प लाभको तथा धर्मातिक्रमण- जन्य लाभको एव शत्रुचरणचुम्बनसे होनेवाले लाभको हेय समझना ही उचित है— अतिक्लेशेन येऽर्थाः स्युर्धर्मस्यातिक्रमेण वा । अरेर्वा प्रणिपातेन मा स्म , तेषु मनः कृथाः ॥ ( महा० उद्योग० ३९ । ७७ ) दूसरोको बिना संताप पहुँचाये, सद्धर्मका अतिक्रमण बिना किये, खलोंके द्वारोपर बिना घुटना टेके मिलनेवाले स्वल्प लाभको भी बहुत समझना चाहिये । अकृत्वा परसंतापमगत्वा खलमन्दिरम् । अनुल्लङ्घ्य सतां वर्त्म यत्स्वल्पमपि तद्बहु ॥ ( शार्ङ्ग० पद्ध० स० १ ) ईमानदारीकी कमाईसे सुख-शान्ति एवं समृद्धि होती है । प्रसिद्ध है कि ईमानदारीका धन पानीमें नहीं डूबता, आगमें नहीं जलता और चोरके पेटमें नहीं हजम होता । उसीसे बरकत भी होती है । वंश-वृद्धि भी उसीसे होती है । बेईमानीसे भले ही तत्काल बडा लाभ हो, पर वह टिकाऊ नहीं होता । उलटे सुख समृद्धि लेकर चला जाता है । वशवृद्धिके अनुकूल भी नहीं होता । न्यायार्जित धनमें भी टैक्स आदिका खर्च निकालकर अतिरिक्त आयमें पञ्चधा विभाग करके ही यथोचित उपयोग करना ठीक होता है । प्रथम विभाग धर्मार्थ राष्ट्रके हितमें व्यय किया जाय, द्वितीय भाग यशके लिये राष्ट्रमे व्यय किया जाय, तृतीय भाग अर्थार्जन या मूल सम्पत्ति-रक्षणके काममें लाया जाय और चतुर्थ भाग अपने काममें लगाया जाय । पाँचवाँ भाग कुटुम्बी, नौकर, मजदूर आदि स्वजनोंके काममे लगाया जाय । पाँच हिस्सामें एक हिस्सा अपने काममें लगानेकी अनुमति है, परंतु उसमे भी नियन्त्रण है कि जितनेमें पेट भरे, तन ढके, उतने- हीमें ममत्व उचित है। अधिकमें ममत्व करना चौर्य है, उसे दण्ड मिलना चाहिये । इस तरह पाँच हिस्सेमें चार हिस्सा राष्ट्रहितके काममे आता ही है। एक हिस्सेमे भी यथावश्यक अपने उपयोगमें लगाना उचित है । तथाकथित राष्ट्रीकरणमें राष्ट्रकी भूमि, सम्पत्ति, कल-कारखानो, उद्योग- धंधोका सरकारीकरण हो जाता है । व्यक्ति शासनयन्त्रका नगण्य कलपुर्जे बन जाता है । शासनयन्त्र किसी दल या दलके तानाशाहोके हाथका कठपुतला बन जाता है । ऐसी तथाकथित सरकारें बिना नकेलके ऊँट, बिना लगामके घोडे, बिना ब्रेकके मोटर, अथवा बिना ड्राइवरके स्टार्ट की हुई मोटरके समान खतरनाक हो
वर्ग संघर्ष २६३ जाती हैं। सब वस्तुओंका राष्ट्रीयकरण शास्त्र और धर्मसे विरुद्ध तो है ही, लौकिक दृष्टिसे भी व्यक्तिगत स्वतन्त्रता नष्ट हो जानेसे व्यक्तिगत विकास रुक जाता है। व्यक्तियोंका समुदाय ही कुटुम्ब, नगर, राष्ट्र तथा विश्व होता है। जैसे एक-एक वृक्षों- के कट जानेपर वन कट जाता है, एक-एक सैनिकोंके नष्ट हो जानेपर सेना नष्ट हो जाती है, वैसे ही एक एक व्यक्तियोंके परतन्त्र, अशिक्षित, निर्धन, निर्बल हो जानेपर राष्ट्र एवं विश्व भी वैसा ही हो जाता है। एक-एक व्यक्तियोंके हृष्ट पुष्ट, बलवान् तथा बुद्धिमान् होनेपर राष्ट्र तथा विश्व भी हृष्ट-पुष्ट बलवान् तथा बुद्धिमान् हो जाता है। व्यक्तिगत सम्पत्ति-शक्ति नष्ट हो जानेपर शासन निरङ्कुश हो जाता है, उसे हरा सकनेकी शक्ति जनताके पास नहीं रहती। नोटिस, पोस्टर, अखबार, सभा, आन्दोलन आदि सभी कामोंमें द्रव्यकी अपेक्षा होती है। सब चीज सरकारके हाथमें रहनेसे व्यक्ति एव तत्समुदाय जनता कुछ न कर सकेगी। अतः जनतामें शक्ति भी रहना आवश्यक है। वस्तुतः अतिसमता और अतिविषमता दोनों ही दोष प्रतीत होते हैं। हाथकी अङ्गुलियाँ भी यदि अति विषम हों तो भी, अति सम हों तो भी, बेढङ्गी लगेंगी। पेट, पैर, हाथ सम हों तो भी ठीक नहीं और यदि पेट बहुत मोटा, पैर, हाथ बहुत पतले हों तो भी रोग ही समझा जायगा। इस तरह आवश्यक है कि योग्यता-आवश्यकताके अनुसार सभीके काम, दाम, आरामकी व्यवस्था हो। भले ही चींटीको कनभर, हाथीको मनभरके अनुसार योग्यता और आवश्यकता- का ध्यान रखा जाय, परंतु आरामकी कमी नहीं होनी चाहिये। केन्द्रीकरण या राष्ट्रीयकरणकी अपेक्षा विकेन्द्रीकरण सदा ही सर्वश्रेष्ठ है। इसमें एक तो सम्पत्तिसम्बन्धी परम्परागत ईश्वरीय नियमका रक्षण होता है, 'सप्तवित्तागमा धर्म्याः' के अनुसार दाय, जय, क्रय, पुरस्कारादिमें प्राप्त सम्पत्ति वैध मानी जायगी, पितृ, पितामहकी सम्पत्तिमे पुत्र, पौत्र, प्रपौत्रका जन्मना स्वत्व स्वीकृत होगा तथा जय, क्रयादिद्वारा भी व्यक्तिगत विकासका अवकाश रहेगा। अतिरिक्त आयका पञ्चधा विभागद्वारा धार्मिक दृष्टिसे कर्तव्य-बुद्धिसे राष्ट्रके हितार्थ अधिकांश आयका व्यय होगा। मूल सम्पत्तिका भी अतिवृष्टि, अनावृष्टि, महामारी, सङ्ग्राम आदि असाधारण परिस्थितिमें, जैसे सरकारी खजानेकी सम्पत्तिका राष्ट्रहितार्थ विनियोग होता है, वैसे ही व्यक्तिगत मूल सुरक्षित धन भी काममें आ सकेगा। इस तरह धर्मनियन्त्रित नीतिमें आर्थिक असंतुलन भी नहीं होता। व्यक्तिगत विकासका अवकाश बना रहता है। पितृ-पितामहादि-परम्पराप्राप्त दायाधिकार भी बना रहता है। दाम, आरामकी विशेषताके लिये ही काममें विशेषता सम्पादनकी प्रवृत्ति होती है। तभी विविध प्रतियोगिताएँ भी सार्थक होती हैं। लौकिक कहावत है कि 'हानिका डर एव लाभका लोभ ही प्राणीको प्रगतिशील
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बनाता है। भय और लोभके बिना आमतौरपर प्राणी निरुत्साह रहता है। सब वस्तुओके राष्ट्रियकरणसे मनुष्य भी यन्त्रवत् काम करता है, ममत्व न होनेसे तत्परता और सावधानीसे काम नहीं होता। जिस नौकरशाहीकी पहले निन्दा की जाता थी, वही नौकरशाही सिरपर आ जाती है। यही कारण है कि नौकरोकी देख-रेख रहते हुए भी गोदामोंमें लाखो टन अन्न सड़ जाते हैं। उपार्जन करने- वालोको जितनी ममता अपनी छोटी अन्नराशिमे होती है और जितनी तत्परतासे वह उसकी रक्षा करता है, सरकारी नौकरोंमें न उतनी ममता ही होती है और न तो रक्षणका ही ध्यान रहता है। यही स्थिति बड़े-बड़े कामोंकी है। कागजी घोड़े दौड़ानेमें करोड़ो खर्च हो जाते हैं, काम कुछ नहीं हो पाता। दामोदर- घाटी, हीराकुण्ड आदिके कामोंमे कितना व्यय और कितनी असफलता हुई, यह स्पष्ट ही है पजाबके बाँध और विद्युत्केन्द्र निर्माणमें भी यही हालत है। अस्तु ! अभिप्राय यह है कि जब विकेन्द्रीकरणके पक्षमें अनेक अच्छाइयाँ है तो आस्तिकोको उसे व्यवहारमें लानेका प्रयत्न करना चाहिये। सबसे पहले तो प्रत्येक नागरिक यह नियम बनाये कि उसके ग्राम, नगर, पड़ोसमें कोई व्यक्ति भूखा, नगा नहीं रहने पायेगा। बिना भूखेको खिलाये न खायेंगे। रोगीका इलाज-प्रबन्ध बिना किये विश्राम न करेंगे। विशेषतः शासक तो कुटुम्बपतिके तुल्य होता है। जैसे कुटुम्बके भोजन, वस्त्रका प्रबन्ध कर लेनेके बाद ही कुटुम्बपति भोजन, वस्त्र ग्रहण करता है, उसी तरह राष्ट्रके भोजन, वस्त्रादिका प्रबन्ध करा लेनेके बाद ही शासकोंको भोजन, वस्त्रादि ग्रहण करना चाहिये। इतना ही क्यों, भगवान् शिवके समान कुटुम्ब- पति अमृत कुटुम्बके अन्य सदस्योको बाँट देता है और स्वयं विषको ही ग्रहण कर लेता है। कौस्तुभ, लक्ष्मी, ऐरावत, उच्चैःश्रवा, अमृत आदि अन्य सभी रत्न देवताओके हिस्सेमे पडे, विष शङ्करके हिस्सेमें। विषको भी शिवजीने पेटमें रखकर न तो पेटको ही विषैला बनाया और न मुखमे रखकर मुखको ही जहरीला बनाया, बल्कि उसे कण्ठमें ही रख लिया। ठीक ऐसे ही कुटुम्ब या राष्ट्रके मालिक पुरुखाको कठिनाइयोको विषके घूँटके तुल्य स्वयं सहना पडता है। वह उसकी कटुतासे न पेटको, न मुखको ही कड़वा बनने देता है। पेटका विषैलापन या मुखका विषैलापन दोनों ही सघटनको छिन्न-भिन्न कर देते है। परन्तु जब कोई अच्छी वस्तु, अच्छे वस्त्र, भूषण, भोजनादि मिलें तो घरका कोई मालिक अपने बच्चोंकी और अपनी परवा न कर कुटुम्बके अन्य सदस्योको ही बाँट देता है। तभी उसके नियन्त्रणमें कुटुम्बका संचालन ठीक चलता है। उत्पादन और नियम उत्पत्तिके पुराने साधनो एवं पद्धतियोंमें रद्दोबदल होनेसे उत्पादनमें
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वर्ग-संघर्ष २६५ विस्तार अवश्य हो जाता है, उत्पन्न वस्तुओंमें सस्तापन भी आता है तथा आमदनीमें भी वृद्धि हो जाती है । पर माल खपतके लिये बाजारोंकी आवश्यकता, माल भेजने तथा कारखानोंके लिये कोयले, पेट्रोलके खानोंकी आवश्यकता, बाजारों एवं कोयले- पेट्रोल आदिके लिये सङ्घर्ष एवं बेकारीकी समस्या अवश्य खड़ी होती है । इसीलिये रामराज्यमें उद्योगोंका विकेन्द्रीकरण अभीष्ट है । छोटे व्यवसायों- द्वारा स्वावलम्बी ढङ्गसे बेकारी दूर कर व्यापकरूपसे रोजगारोंकी व्यवस्था की जाती है । कम्यूनिष्ट यद्यपि बड़ी-बड़ी पुस्तकोंमें कलकारखानोंके द्वारा गरीबोंके रोजगार छिन जानेकी चीख-पुकार मचाते हैं, परंतु उन्हीं कलकारखानोंका ही वे समर्थन भी करते हैं । इतना ही क्यों, वे कलकारखानोंके विस्तारसे ही मजदूरोंका लाखोंकी संख्यामें एकत्रित एवं सङ्गठित हो सकना तथा मजदूर-आन्दोलनोंके द्वारा कम्यूनिष्ट राज्य-स्थापनाका भी स्वप्न देखते हैं । अस्तु, ईश्वर एवं धर्मकी भावना दृढ होनेसे वैभव एवं सम्पत्तिवाले सम्पत्तिका सदुपयोग राष्ट्रके पोषणमें तथा जीवन-स्तर उन्नत करनेमें करेंगे । बेकारी दूर करनेके काममें सम्पत्ति उपयुक्त होगी । इसीलिये प्राचीनकालमें आजकी अपेक्षा कहीं अधिक सम्पत्ति, शक्तिबल, विद्या, दक्षताके रहनेपर भी असंतुलित विषमता, बेकारी, कलह आदि नहीं था । ईश्वर-धर्मकी भावना घटनेसे ही मात्स्यन्याय परस्पर भक्ष्य-भक्षकभाव, शोषक-शोषित भाव बढ़ता है । पर उसे ही मार्क्सवादी गुण मानते हैं । वर्ग- कलह, वर्ग-विद्वेष, वर्ग-विध्वंस ही जिसके सिद्धान्त एवं सत्ताका आधार हो, वही जिसके जीवन एवं उन्नतिका एकमात्र साधन हो, उससे विश्वशान्ति एवं विश्वमें समानता, स्वतन्त्रता, भ्रातृत्वकी आशा करना व्यर्थ है । अस्तु । उत्पादन-विस्तारसे कुछ भौतिक परिवर्तन होनेपर भी धर्मदर्शन एवं राजनीतिक नियमोंमें स्वत्वोंके रद्दोबदलका कोई प्रसङ्ग नहीं होता । अमेरिका आदिकोंमें बिना मौलिक रद्दोबदलके भी काम चलता ही है। आर्थिक दशा, सामाजिक, धार्मिक नियमोंकी नींव ही नहीं, जिससे आर्थिक-दशामें परिवर्तन होने- से धार्मिक नियमरूप भवन ढह पड़ें और उनमें रद्दोबदल आवश्यक हो । जो कहते हैं कि 'जिन लोगोंने उत्पादन साधनोंमें रद्दोबदल कर लिया उन्हें उत्पन्न हुई वस्तुओंके वितरणसम्बन्धी नियमोंमें भी रद्दोबदल कर लेनेका अधिकार मानना न्यायसङ्गत है । अतः पुत्र-पौत्रादिका पिता-पितामहादिकी सम्पत्तिमें दायपसे बपोती सम्पत्तिके रूपमें अधिकार माननेके नियम भी रद्दोबदल करके तथा सभी स्वत्व-सम्बन्धी पुराने नियमोंमें भी रद्दोबदल करके समाजीकरण या राष्ट्रीयकरणका सिद्धान्त मानना ठीक ही है। पर यह पक्ष विचारणीय है कि उत्पादन साधनोंमें रद्दोबदल करनेका मुख्य श्रेय किसे है । क्या साधारण मजदूर- समुदायको ? कहना पड़ेगा कि बड़े-बड़े वैज्ञानिको, अन्वेषकोंको ही इसका श्रेय होना
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चाहिये । दूसरा श्रेय वैज्ञानिकोंको सहायता, प्रोत्साहन एव सामग्री देनेवाले धनवानोंको होना चाहिये । जबतक वे पुराने स्वत्वके नियमोमे रद्दोबदल नहीं चाहते, केवल मजदूरोकी इच्छामात्रसे रद्दोबदल कैसे हो सकता है ? बड़े-बड़े वैज्ञानिक, आविष्कारक, अन्वेषक एव धनवान् आदि तो कम्युनिष्टोके मतानुसार शोषित वर्गमें नहीं आ सकते, वे तो शोषक वर्गमें ही चले जायेंगे । फिर वे पुरानी व्यवस्थामें रद्दोबदल क्यों चाहेंगे ? केवल आविष्कारकोंके आविष्कारो, यन्त्रो एव मजदूरोके प्रयत्नसे ही नहीं उत्पादन होता, किंतु उसमें पूँजी भी अपेक्षित होती है । यदि पूँजी न हो तो यन्त्र ही कहाँसे खरीदे जायें ? मजदूरोके लिये मजदूरी कहाँसे आये ? वैज्ञानिकों, अन्वेषकोको सुविधा भी कहाँसे मिले ? अतः उत्पादन-साधनमे रद्दोबदलका मुख्य श्रेय पूँजीपतिको ही क्यो न दिया जाय ? इसके अतिरिक्त कोयला, पेट्रोल, लोहा, ताँबा, गन्धक आदिकी खाने तथा अन्य कच्चे माल न हों तो वैज्ञानिक, पूँजीपति, मजदूर कोई भी उसका उत्पादन नहीं कर सकेगा, न यन्त्र बना सकते हैं, न उत्पादन-साधनोमे ही रद्दोबदल कर सकते हैं । वस्तुतः ईश्वर ही वह वस्तु है जिसके अखण्ड भण्डार प्रकृतिमें ही विभिन्न खाने हैं । जिसकी पृथ्वीसे ही लोहा, सोना, हीरा, गन्धक, पारा, कपास, अन्न, फल आदि कच्चे माल पैदा होते हैं । इनके बिना पूँजीपति, वैज्ञानिक, मजदूर सब बेकार हैं । इतना ही क्यो, वैज्ञानिकोंके बल, दिमाग, बुद्धि भी ( जिसके द्वारा वे भिन्न-भिन्न आविष्कार करते हैं ) किसी लौकिक अन्वेषकका आविष्कार नहीं है; किंतु ईश्वरका ही आविष्कार है । मजदूरोके देह-मन-बुद्धिमें कार्यक्षमता भी ईश्वरदत्त ही है । अतः ईश्वरीय शक्तियो एव वस्तुओके सहारे कुछ अन्वेषण या उत्पादन बढाने मात्रके कारण कुछ व्यक्तियो या व्यक्तिसमूहोको ईश्वरीय धार्मिक सामाजिक नियमोमें रद्दोबदल करनेका अधिकार हर्रिगज नहीं है । रहा यह कि 'बहुमतके आधारपर उनका रद्दोबदल किया जाय ।' तो यह भी ठीक नहीं । कारण, मार्क्सवादी बहुमतका कोई महत्त्व नही मानते । जिसमें शोषक पूँजी- पतिके मतका भी उपयोग किया जा सके, ऐसा बहुमत कम्युनिष्टको सर्वथा अमान्य है । शोषको एव शोषितोके वोटोका समानरूपसे महत्त्व देनेका कम्युनिष्ट मखौल उड़ाते हैं । दूसरोके यहाँ भी बहुमत उसी हदतक आदरणीय हो सकता है, जहाँतक बहुमत विशेषज्ञोके मतसे न टकराये । जैसे रोगीकी चिकित्साके सम्बन्धमें चिकित्साविशेषज्ञ वैद्य-डाक्टरके मुकाबले सामान्य जनोके बहुमतका कोई मूल्य नहीं है । घडी आदि यन्त्रोंके सुधार या निर्माण आदिके सम्बन्धमे यन्त्रविशेषज्ञ एवं शिल्पीके मुकाबले सामान्य जन-बहुमतकी कोई कीमत नहीं है । एक नेत्रवान्के कथनानुसार शङ्खकी शुक्लताका निर्णय होगा । दम या दस लाख अथवा दस करोड़ अन्धोंकी सम्मतिसे शङ्खकी कृष्णता अमान्य होती है । ठीक
इसी तरह अपौरुषेय शास्त्र आर्ष-विज्ञानके आधारपर धर्मका स्वरूप निर्णय किया जाता है, उसमें रद्दोबदलकी बात सोची नहीं जा सकती है । सामान्यजनोंके बहुमतके आधारपर वैज्ञानिको या मजदूरोँकी सम्मतिसे धर्ममेँ रद्दोबदल करनेकी बात वैसी ही मूर्खताकी होगी, जैसे गँवारोँकी सम्मतिसे हवाई जहाजका पुर्जा सुधारना और वकीलोँसे हृदयका आपरेशन कराना । वैद्यों-डाक्टरोँसे वायुयानके कल-पुर्जे सुधारना शुद्ध मूर्खता है । जो वस्तु उपयोगार्ह नहीं रह जाती वह अवश्य छूट जाती है, परन्तु चन्द्र, सूर्य, पृथ्वी, जल आदिके समान शास्त्रोक्त धर्म नियम कभी अनुपयोगी नहीं होते । ईश्वर, उसकी उपासना एव तदुपयोगी धर्म और नीति भी कभी अनुपयोगी नहीं होते । प्राचीनता-नवीनताका सघर्ष, प्राचीनताका विनाश एव तदनुकूल तर्क, दर्शन, विवेक, वस्तुतः अविवेक ही है । पुराण पुरुष, आत्मा, परमात्मा, आकाश, वायु, चन्द्र, सूर्य, पृथ्वी आदिके समान, धार्मिक दार्शनिक राजनीतिक सत्य सिद्धान्त, न्याय, उपासना आदि प्राचीन होनेपर भी त्याज्य नहीं हैं । कालरा, प्लेग आदिके तुल्य वर्ग-कलह, वर्ग-द्वेष, अधर्मका प्रचार आदि नवीन होनेपर भी त्याज्य ही हैं । कभी चकमक पत्थर, कभी अरणीमन्थन, कभी दियासलाई तथा आधुनिक अन्य वैज्ञानिक साधनोँमे अग्नि प्रकट किया जाता है, परन्तु एतावता अग्निके दाहकत्व, प्रकाश- कत्व आदि धर्मोँमें परिवर्तन नहीं कहा जा सकता । इसीलिये बुद्धिमानोँने कहा है— पुराणमित्येव न साधु सर्वं न चापि सर्वं नवमित्यवद्यम् । सन्तः परीक्ष्यान्यतरद् भजन्ते मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः ॥ ( मालविकाग्निमित्रम् १।२ ) अर्थात्—सब वस्तु पुरानी होनेसे ही अच्छी नहीं एव नयी होनेसे ही खराब नहीं । सत्पुरुष परीक्षा करके पुरानी या नयी वस्तुओँमें जो भी उचित या श्रेष्ठ हो उसे ग्रहण करते हैं । मूढ लोग ही परप्रत्ययनेय बुद्धि होते हैं । यही न्याय आज नवीनतावादियोँपर भी लागू है । वे भी नवीन होनेसे ही किसीको ठीक समझते हैं तथा प्राचीन होनेसे ही धर्म, दर्शन, नीति, सबका परित्याग करनेके लिये प्रस्तुत होते हैं । उन्हें भी निष्पक्ष दृष्टिसे प्राचीन, नवीनकी परीक्षा करनी चाहिये । उचित होनेसे प्राचीन या नवीन किसी भी पक्षका ग्रहण किया जा सकता है । उपर्युक्त युक्तियोँमे दिखलाया जा चुका कि ईश्वरीय शास्त्र, धार्मिक, राजनीतिक, आध्यात्मिक नियमोँमें परिवर्तन नहीं हो सकता । वर्ण-विद्वेष कहा जाता है कि “जिन प्राचीन हब्शी-भिल्ल आदि जगली जातियोँमें प्राचीन कालके अनुसार जीवन व्यतीत होता है, उनमें व्यक्तिगत सम्पत्तिका अभाव है अथवा उन्नति नहीं हुई । उनमें न वर्ग-भेद है, न किसी वर्ग विशेषका
अधिकार है—न वर्ग-विरोध है । गाँवके मुखिया, पण्डित, पञ्च, प्रचलित रीतियों, धार्मिक अनुष्ठानोंका पालन कराते हैं, परंतु व्यापारकी वृद्धि और युद्धोंके फल- स्वरूप जब प्राचीन व्यवस्थाका लोप हो जाता है, व्यक्तिगत सम्पत्ति बढने लगती है, तभी उन लोगोंमें वर्गभेद उत्पन्न होता है । कुछके पास सम्पत्ति होती है, कुछके पास नहीं होती । सम्पत्तिवाला वर्ग शासन चलाता है, कानून बनाता है, नवीन प्रथाओ और संस्थाओकी सृष्टि करता है । इन सब कामोका उद्देश्य होता है, उस अधिकारी वर्गके हितो और स्वार्थोकी रक्षा करना । उस वर्गके समाजकी विचारधारा उसके ही हितों एव स्वार्थोंके अनुकूल बहने लगती है । जबतक ये स्वार्थ कुछ अगोंमें सर्वसाधारणकी भलाईके अनुकूल होते हैं, जबतक उत्पादक शक्तियो एवं उत्पादन प्रणालीमें बहुत अधिक विरोध पैदा नहीं हो जाता, तबतक विभिन्न वर्गों एव समूहोमे समझौता या सुलह बनी रहती है । जब उत्पादक शक्तियो एव उत्पादन-प्रणालीमें भेद या विरोध बढ जाता है, उस प्रणालीसे अधीन वर्गकी आवश्यकताएँ पूरी नहीं हो सकतीं, तब वर्गकलह आरम्भ हो जाता है। फिर या तो उस समय कानूनी समझौता, शासनसुधार होता है अथवा उस समाजका विनाश होता है और नवीन सामाजिक प्रणालीका आविर्भाव होता है । यहूदी, यूनानी, रोमन आदि लोगोका इतिहास ही इसका उदाहरण है। इस तरह अमीरो, गरीबो, कुलीनों, अकुलीनो, छोटों,बड़ों,गुलामो, नागरिकोका सघर्ष जारी रहता है। अन्तमें इन समाजोका उच्छेद होता है । साथ ही इन वर्ग-कलहोंसे ज्ञान भण्डारकी वृद्धि होती है । मालिको, गुलामो, जमीनदारो, किसानोंके समान ही पूँजीपतियों, श्रमजीवियोंका भी वर्गकलह अनिवार्य होता है और इससे क्रान्तिका जन्म तथा नवीन सिद्धान्तोका प्रचार होता है । इस ऐतिहासिक विरोध और कलहके अनुसार ही बौद्धिक और राजनीतिक विरोधकी उत्पत्ति होती है । यह बौद्ध विरोध जननेताओं या पैगम्बरोद्वारा विभिन्न मत-मतान्तरोंके रूपमे प्रकट होता है । उदाहरणार्थ, वैदिक, बौद्ध, ईश्वरवादी या अनीश्वरवादी, कैथलिक, प्रोटेस्टेण्ट, भौतिकवादी, अध्यात्मवादीका नाम लिया जा सकता है । ये सभी मत-मतान्तर चाहे जितने भी सूक्ष्म और आध्यात्मिक प्रतीत होते हो, सासारिक जीवन और भौतिक प्रपञ्चसे कितने भी पृथक् क्यों न प्रतीत होते हों, परंतु उनके मूलका पता लगानेसे विदित होगा कि उनका भी आधार भौतिक ही है । समाजके आर्थिक आधार और उत्पत्तिकी प्रणालीमे विरोध उत्पन्न हो जाने और इसी कारण भिन्न-भिन्न वर्गों—दलोंमें कलह आरम्भ होनेसे ही सभी मत-मतान्तरोंकी उत्पत्ति हुई है । ''इसी तरह समस्त नैतिक, राजनीतिक, अर्थशास्त्र-सम्बन्धी प्रणालियो ( जो कि प्रधानता पानेके लिये परस्पर प्रतियोगिता कर रही हैं ) और समस्त प्रादेशिक या व्यापक युद्धोंके तात्कालिक कारण चाहे कुछ भी हों, पर मूलकारण सामाजिक
आर्थिक दशा ही है । इसी तरह आदर्शवाद, उपयोगितावाद, एकतन्त्र, प्रजा- तन्त्र, रक्षित व्यापार, मुक्त व्यापार, राज्यनियन्त्रित अर्थव्यवस्था, स्वतन्त्र आर्थिक व्यवस्था, समाजवाद, व्यक्तिवाद आदि जितने भी सिद्धान्त घोषित किये जाते हैं, उनके समर्थनमें चाहे जितने भी उच्च भावनायुक्त तर्क उपस्थित किये जायें और उच्च उद्देश्य बतलाये जायें, पर उन सबकी उत्पत्ति समाजके भौतिक आधार और उत्पादन-प्रणालीद्वारा ही होती है ।” कम्युनिष्ट मैनिफेस्टोमें ऐतिहासिक भौतिकवादका सारांश इस प्रकार कहा गया है—“इसे समझनेके लिये किसी गम्भीर अन्तर्ज्ञानकी आवश्यकता नहीं है कि मनुष्यकी भौतिक अवस्था और सामाजिक जीवनकी दशामें परिवर्तन होनेसे ही उसके मानसिक भावों, विचारों और धारणाओंमें भी परिवर्तन होता है । ससारके विचारोंका इतिहास यही बताता है । भौतिक उत्पत्ति, पैदावारमें परिवर्तन होनेसे बौद्धिक उत्पत्तिमें भी परिवर्तन होता है । जब जिस वर्गका शासन होता है तब उसके ही विचारोंकी प्रधानता होती है । जीवन-निर्वाहकी प्राचीन प्रणालीका नाश होते ही, प्राचीन विचारोंका ही लोप हो जाता है । यूरोपमे ईसाई धर्म तथा भारतमें बौद्धधर्मका आविर्भाव एव पुराने धर्मका लोप भी आर्थिक दशाके बदलनेसे ही हुआ था । उत्पत्तिकी प्रणाली, सामाजिक वर्गविभाग और सम्पत्ति-सम्बन्धी नियम जब उत्पादक शक्तियोंके लिये बन्धनरूप बन जाते हैं और विभिन्न वर्गोंका स्वार्थ, विरोध वर्गकलहका रूप धारण कर लेता है, तब सामाजिक क्रान्तिका युग आता है । इससे प्राचीन समाज नष्ट होकर विस्मृतिके गर्भमें चला जाता है । परतु वह नष्ट होनेसे पहले जीवनके नवीन मार्गका निर्माण कर देता है, जो उत्पादक-शक्तियोंके अनुरूप होता है । इस नवीन समाजकी वृद्धि चाहनेवाले लोग क्रान्तिकारी भावना- ओसे उत्पन्न होनेवाली समस्याओको हल करनेमें संलग्न हो जाते हैं । इस तरह उत्पादक शक्तियोकी उन्नति और पूर्णता ही मनुष्यजातिके विकासका सार है । “आदिकालीन, मध्यकालीन, वर्तमानकालीन उत्पादन-प्रणालियोको मनुष्य- समाजकी प्रगतिके विभिन्न युग कहते हैं । वर्तमान पूँजीवादी समाजकी उत्पादन- प्रणाली इस विरोधयुक्त शृङ्खलाकी अन्तिम कडी है । यह विरोध व्यक्तिगत नहीं, किंतु समाजकी परिस्थितिद्वारा उत्पन्न होता है । साथ ही पूँजीवादके भीतर जो उत्पादक शक्तियाँ उत्पन्न हो रही हैं, वे इस विरोधको मिटानेका मार्ग भी प्रशस्त कर रही हैं । इस प्रकार पूँजीवादी समाज मनुष्य-जातिके प्रागैतिहासिक युगका अन्तिम अध्याय है ।” उपर्युक्त बातोका खण्डन पूर्वोक्त युक्तियोसे ही हो जाता है । कम्युनिष्ट वर्ग- कलह, वर्गविद्वेष या वर्गसंघर्षको ही वर्गविकास एव ज्ञान भण्डार वृद्धिका कारण कहते हैं । साथ ही वर्गभेदको ही विकास या उन्नतिका लिङ्ग मानते हैं । अतएव
हबशी या भिल्ल आदि जंगली अविकसित जातियोंमें वर्गभेदका अभाव बतलाते हैं। परंतु यह सुविचारित सिद्धान्त है कि सुमति, दक्षता, सदाचार, सद्धर्म, नियन्त्रण, सहिष्णुतासे वैमत्य मतभेद मिटता है और सघटन, समन्वय, सामञ्जस्य एव सौमनस्य होता है। इसका महत्त्व ऋग्वेद तथा अथर्ववेदमे भी सौमस्य सूत्रोंके द्वारा कहा है— 'संगच्छध्वं संवदध्वं स वो मनांसि जायताम्' आदि मन्त्रोंके द्वारा सगमन, सवदन तथा सौमनस्य-सघटन आदिको अभ्युदय- का कारण कहा गया है। 'मा विद्विषावहै' आदि मन्त्रोद्वारा ईश्वरसे भी परस्पर द्वेष मिटानेकी प्रार्थना की गयी है। जहाँ दुर्बुद्धि, दुर्भावना, असहिष्णुता, उच्छृङ्खलता बढ़ती है, वही विद्वेष, वैमनस्य, विवाद तथा विनाश आदि होता है। यदि कलह, संघर्ष, विद्वेष, विनाश आदि ही सभ्यता या प्रगतिशीलता है और सघर्ष, विनाश, वर्गविद्वेष आदि न होना पिछड़ना या असभ्यता है तो कोई भी बुद्धिमान् कहेगा कि ऐसी सभ्यतासे असभ्यता ही ठीक है, ऐसी प्रगतिसे अप्रगति ही ठीक है। तभी तो आजके बर्बरतापूर्ण नरसहार, अशिष्टता, असभ्यता, दुर्दान्तताका नग्न अकाण्ड ताण्डव एव मानवताको त्रस्त करनेवाली, पशुताको मात करनेवाली स्वेच्छाचारिता, विलासिताको प्रगति एवं सभ्यता माना जा रहा है। वस्तुतः यह विपरीत बुद्धि है। वैभव, सम्पत्ति, उन्नति, प्रगति, विघटन, वैमनस्य कभी भी वर्गविनाशका कारण नहीं होता। गरीबी भी विघटनकी कारण नहीं होती। प्रमाद, मूर्खता, विलासिता, स्वेच्छाचारिता, स्वार्थपरायणता ही विघटन, वैमनस्यका कारण होती है। इन दोषोसे युक्त होनेसे गरीबो-अमीरो सबमें विघटन होता है। चाहे अमीर हो या गरीब, जंगली हो या नागरिक, प्रगतिशील हों या अप्रगतिशील, मनुष्य हो या देवता अथवा पशु ही क्यो न हों, जहाँ दुर्बुद्धि, अविवेक और स्वार्थपरायणता बढ़ती है, वहीं विद्वेष, वैमनस्य, विघटन और विनाश बढ़ता है। जहाँ सद्बुद्धि, सदाचार, नियन्त्रण, सहिष्णुता है, वहाँ प्रेम सघटन उन्नति ही होती है। इसीलिये जगली पशुओ, मनुष्यो, देवताओमें भी इन गुणोके आधारपर सघटन रहता है। गुणोके अभाव एव दोषोंके बढ़ जानेपर विघटन आदि बढ़ता है। मधुमक्खियोका संघटन प्रसिद्ध है। कपोतों एवं अन्यान्य पशु-पक्षियोमें भी संघटन होता है। कहते हैं, कुछ कपोत जालमें फँस गये, एकमत होकर एककी रायसे वे सब जाल लेकर उड़ गये एवं अपने मित्र हिरण्यक-मूषककी सहा- यतासे मुक्त हो गये। जंगली गाये एकत्र होकर सिंहका भी मुकाबला करती हैं। वे निर्बल, बाल-वृद्ध पशुओको मध्यमें रखकर प्रबल साँड़ोको आगे करके सिंह-व्याघ्रका मुकाबला करती हैं और अपने आपको बचा लेती हैं। कम्युनिष्टोको भी मजदूर- सघटनसे अथ च दृढ प्रयत्नसे ही सफलता मिल सकती है। संघटनमें केवल एक
वर्ग-संघर्ष २७१ स्वार्थ ही नहीं, किंतु सहिष्णु मनकी एकता ही मूल कारण है। एक उद्देश्यकी सिद्धिके लिये एक सूत्रमें समन्वित व्यक्तियोंका ग्रथित होना ही सङ्घटन है। महान् प्रयोजन होनेपर भी असहिष्णु, स्वेच्छाचारी सङ्घटित नहीं हो सकते। कदाचित् किसी स्वार्थके लिये कुछ क्षणके लिये सङ्घटित हो भी जाते हैं तो भी पद प्राप्त हो जानेपर स्वार्थके टकराते ही संघटन छिन्न-भिन्न हो जाता है। यही बात जड़वादियोंके सङ्घटनोंमें देखी जाती है। अधिकार-प्राप्तिके लिये 'सफाया, या 'कण्टक-शोधन' के नामपर अधिकारारूढ लोग अपने पुराने साथियोंको ही मौतके घाट उतारने लगते हैं। अमृत-प्राप्तिके लिये देवताओं एवं दानवोंमें भी संघटन हुआ था, पर स्वार्थमें आघात आते ही भीषण देवासुर-संग्राम हुआ। जालमें फँसे हुए लोमश बिल्लने, दो शत्रुओंसे घिरे हुए पलित मूषकका सन्धि प्रस्ताव भी स्वीकार किया था। बिडालसे मित्रता करके मूषक अपने शत्रु सर्प एव श्येनसे मुक्त हुआ। आत्म
२७२ मार्क्सवाद और रामराज्य मनु, इक्ष्वाकु, दुष्यन्त, भरत, हरिश्चन्द्र, रामचन्द्र, शिबि, रन्तिदेव आदि ऐश्वर्यपूर्ण होनेपर भी प्रमत्त न होकर निरन्तर धर्मनिष्ठ ईश्वरपरायण रहकर विश्वहितमें लीन रहे, अतः उनकी उत्तरोत्तर उन्नति हुई है । यह बात— विद्या विवादाय धनं मदाय शक्तिः परेषां परिपीडनाय । खलस्य साधोः विपरीतमेतद् ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय ॥ ( गुणरत्नम् ७ ) —से स्पष्ट कर दी गयी है । विद्या, बुद्धि, शिक्षा आदिके सम्बन्धमें अपनेसे अधिक वृद्ध, बुद्धिमान् एवं विद्वान्से लोग तत्तद् वस्तुओको प्राप्त करते हैं । यहाँ गुरु-शिष्यभाव रहता है— द्वेष नहीं । पूर्वजोमें पूज्य-बुद्धि होती है, विरोध-बुद्धि नहीं । इसी तरह जिन प्राचीन नियमोसे प्राणीकी उन्नति होती है, उनके प्रति भी विरोध-बुद्धि नही होती । पूर्व-पूर्व अवस्थासे उत्तरोत्तर उन्नति होती है तो पूर्व-पूर्व अवस्थासे उत्तरोत्तर अवस्थाके संघर्षका अवकाश नहीं रहता । पूर्व-पूर्वकी पुञ्जी एव साधनो- के सहयोगसे उत्तरोत्तर पुंजी एवं साधनोंकी वृद्धि अवश्य होती है । कोई व्यापारी सहस्त्रसे लक्ष, लक्षसे कोटि कमाता है अतः परस्पर साध्य-साधन भाव या उपकारी- उपकारक भाव होना ही अधिक न्यायसङ्गत है । इसीलिये पूर्वकालमें ईश्वर, धर्म, धार्मिक राजा, धनवान्, पूँजीपति एवं सुखी किसान, सेवक, शूरवीर सभी साथ रह सकते थे । बैलगाड़ी, पुष्पकयान, पादचारी भी साथ रह सकते थे । लाठीसे लेकर ब्रह्मास्त्र, पाशुपतास्त्रतक शस्त्रास्त्र थे । हाथके करघेसे लेकर महायन्त्र- तक थे । विश्वकर्मा, मयके आविष्कारके साथ हाथसे पर्णशाला बनाकर रहनेवाले भी थे । सब एक दूमरेके पोषक थे शोषक नहीं । साराश यह है कि शास्त्र, धर्म एव ईश्वरभावके नियन्त्रणके अभावमें ही वर्ग-सघर्ष, वर्ग विद्वेष, वर्ग-विध्वस एवं क्रान्ति आदिकी बात चलती है । जो दोष है, गुण नही हो सकता । इतिहास- में भली, बुरी सभी बाते होती हैं । सब न तो सिद्धान्त ही होती हैं, न ग्राह्य ही । भारतीय सभ्यतामें जो 'मात्स्य न्याय' कहा गया है, वही कम्युनिष्टोंका परम पुरुषार्थ एवं अभीष्ट वर्ग-सघर्ष है । यह पहले बतलाया जा चुका है कि कृतयुगमें जब कि सत्त्वगुणका पूर्णरूपसे विकास था, सभी धार्मिक, सात्त्विक थे । साथ ही विद्या, बल, शक्ति, वैभवका भी अभाव न था । ईश्वर, ब्रह्मा आदिमें सत्त्वकी प्रधानतासे ही विद्या, वैभव, विविध ऐश्वर्य होते हैं । इन्द्रादि देवताओंका ही नहीं, पर हिरण्यकशिपु, मय आदि दानवोका ऐश्वर्य भी जो वेदों-पुराणोंमें वर्णित है, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि उसके मुकाबले आजका वैभव कुछ नहीं है । पूर्ण उत्कर्ष कालमे भी सत्त्व एवं धर्मकी जब प्रधानता हुई, तब धर्मनियन्त्रित
वर्ग-संघर्ष २७३ जनता किसी राजा, राज्य, दण्डविधानके बिना भी आपसमें ही सब काम चला लेती थी— न राज्यं न च राजासीन्न दण्डो न च दाण्डिकः । धर्मेणैव प्रजाः सर्वा रक्षन्ति स्म परस्परम् ॥ ( महा० शा० प० ५९ ) यह भी एक महान् आश्चर्य है कि जो सर्वत्र समानता, स्वतन्त्रता, भ्रातृताका आदर्श रखते हैं, वे ही वर्ग-विद्वेषका मार्ग भी प्रशस्त करते हैं । यह वैसी ही विरुद्ध बात है—जैसे कोई जाना चाहता है पूर्व, पर चल रहा है पश्चिमकी ओर । जहाँ समानता, स्वतन्त्रता, भ्रातृताके लिये विद्वेष, वैमनस्य मिटाकर सदाचार, परस्पर पोषण, उपकार, सहिष्णुता एव सहानुभूतिका भाव बढ़ाना अपेक्षित है, वहाँ मार्क्सवादी सङ्घर्ष, विद्वेष बढ़ानेका मार्ग ग्रहण करते हैं । मार्क्सवादी समझते हैं कि शोषक-शोषितोंका विरोध मूषक-मार्जारके वैरके समान अमिट है; इनमें विरोध मिटाकर समानता, भ्रातृता आदि स्थापित नहीं हो सकती, अतः विद्वेष उत्तेजित कर वर्ग-
२७४ मार्क्सवाद और रामराज्य शोषकोंको न मिटाकर शोषण-वृत्ति मिटाना शासनका उद्देश्य है । दण्ड-विधानका भी उद्देश्य बदला चुकाना आदि न होकर अपराधीकी अन्तरात्मशुद्धि ही मुख्य उद्देश्य रक्खा गया था। शोषणवृत्ति बिना मिटाये शोषितोंमें ही शोषक उत्पन्न होते रहेगे। अत्यन्त गरीब, मजदूर या कँगले भी अधिकार पाकर शोषक हुए हैं एवं हो सकते हैं। धार्मिक भावनावाले दिलीप-जैसे महासम्राट् भी एक गाय- की रक्षाके लिये अपने प्राण दे सकते हैं, शिबि-जैसे सम्राट् भी एक कबूतरके प्राण बचानेके लिये अपने देहका सम्पूर्ण मास दे सकते हैं। साथ ही यह भी विचारणीय है कि क्या कोई मनुष्य स्वभावसे ही शोषक होता है या उसमें शोषणकी बुराई आगन्तुक है ? यदि बुराई या शोषण कोयले मे कालापनके समान स्वाभाविक है तब तो अवश्य जैसे कितना ही साबुनसे धोनेपर बिना कोयलाके मिटे उसका कालापन नही मिट सकता, वैसे ही शोषक मनुष्यके मिटे बिना उससे शोषण या बुराई नहीं मिट सकती । परंतु वस्तुस्थिति ऐसी नहीं। स्वभावसे प्राणी बुरा या शोषक नहीं होता । यह कह चुके हैं कि कभीका शोषक ही पोषक बन जाता है तथा कभीका पोषक ही शोषक बन जाता है। शास्त्रीय सस्कार, सत्समागम एव धर्मनिष्ठाके विस्तारसे प्राणी पोषक बनता है । अधर्म, प्रमाद, स्वार्थपरता बढनेपर पोषक भी शोषक बन जाता है । वाल्मीकि पहले शोषक थे, पर वे ही सत्समागमसे महर्षि एव विश्वपोषक बन गये । अजामिल जो पहले साधु पुरुष थे, दुस्सगसे शोषक हो गये, फिर कालान्तरमे वे ठीक हो गये। रामराज्यके सिद्धान्तानुसार प्राणिमात्र ईश्वरके अश, अविनाशी, चेतन, अमल, सहज सुखराशि है—ईस्वर अस जीव अविनासी । चेतन अमल सहज सुखरासी॥ वेद भी कहते हैं—'अमृतस्य पुत्राः' प्राणिमात्र अमृत—परमेश्वरके पुत्र हैं। जैसे गङ्गाका तरङ्ग गङ्गाजलके तुल्य ही शीतल, मधुर और पवित्र होता है, वैसे ही चेतन, अमल, सहज, सुखराशि परमेश्वरकी सतान भी चेतन, अमल, सहज- सुखराशि ही हैं। उनमें बुराई, अविद्या, काम कर्मके सम्पर्कसे आयी— भूमि परत भा ढावर पानी । जिमि जीवहि माया लपटानी ॥ जैसे निर्मल जलमें भूमिके सम्पर्कसे मलिनता आ जाती है, वैसे ही माया आदिके सम्पर्कसे जीवमें मलिनता आ जाती है। जैसे मलिन जलमें निर्मली बूटी या फिटकिरी डालनेसे जलमें निर्मलता आ जाती है, वैसे ही स्वधर्मानुष्ठान एवं ईश्वरभक्तिसे जीवकी मलिनता, बुराइयाँ दूर हो जाती हैं, फिर वह शोषक नहीं रह जाता, शुद्ध पोषक हो जाता है। असलमें मात्स्यन्याय दूर होनेके लिये ही शासनकी स्थापना हुई है। धर्म, सदाचारका विस्तार, सत्य, अहिंसाकी प्रतिष्ठा तथा दण्डके द्वारा शोषण मिटाकर समन्वय, सामञ्जस्य स्थापित करना ही शासनका मुख्य लक्ष्य है । वस्तुतः मार्क्स- . वादी स्वतन्त्रता, समानता, भ्रातृताकी बात तो करते हैं, परंतु उन्हें समानता,
वर्ग-संघर्ष २७५ स्वतन्त्रता और भ्रातृताकी वास्तविक आधार-भित्ति विदित नहीं है। जड देह, मन, बुद्धि, इन्द्रिय आदि समानता आदिके आधार नहीं हो सकते। कारण, उनकी विषमता स्पष्ट है। देह किसी टोके भी एक समान नहीं। किसीका देह मोटा, किसीका पतला, किसीका लंबा, किसीका नाटा होता है। सगे भाइयोके भी प्रत्येक अवयवमें भेद रहता है। शक्तिमें भी भेद है। कोई दो-दो मोटरोंको रोक सकते हैं, कोई बकरीको भी नहीं रोक सकता। इसी तरह बुद्धिमें भी समता नहीं कही जा सकती। कोई कई शास्त्रोंके विद्वान् एव दार्शनिक होते हैं और कोई अत्यन्त निर्बुद्धि भी होते हैं। कोई पर्याप्त अन्न, दुग्धादि पचा सकते हैं, कोई किंचिन्मात्र भी घृत- दुग्धादि नहीं पचा सकते, वे थालीमें रखे हुए मोदकको छूनेसे परमाणुबम- जैसा डरते हैं। कार्यकरणक्षमता भी सबकी एक सी नहीं। अतः भौतिकवादमें समानता, स्वतन्त्रता, भ्रातृताकी कोई वास्तविक आधारभित्ति ही नहीं है। इसीलिये वहाँ समानता, भ्रातृता, स्वतन्त्रतादिकी केवल बात ही होती है, कार्य-वर्ग-विद्वेष वर्गविध्वंसका होता है। उनकी समानता उनके दलके साथियोंतक ही सीमित है। उनमें भी विरोध उत्पन्न होते रहते हैं और 'सफाया' कण्टकशोधनके नामपर कलके साथीको भी मौतके घाट उतारा ही जाता है। परंतु रामराज्यके सिद्धान्तमें समानता, भ्रातृता आदिका वास्तविक आधार अध्यात्मवाद है। जहाँ किसी सीमित दायरेके भीतर ही नहीं, किंतु किसी देश, जाति, सम्प्रदाय या पार्टीका अमीर, गरीब, पुण्यात्मा, पापात्मा, कोई स्त्री-पुरुष, बालक-वृद्ध हो अथवा देवता, दानव, मानव, पशु-पक्षी, कीट-पतंग हों, सभी ईश्वरके पुत्र हैं। उनके देहोंमें भेद हो सकता है, किंतु देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धिका द्रष्टा, क्षेत्रज्ञ आत्मामें कोई भेद नहीं होता। सोने, लोहे, मिट्टीके घड़ेमें भेद है, पर उनमें स्थित आकाशमें कोई भेद नहीं। वैसे ही विभिन्न देह, इन्द्रिय, मन-बुद्धिमें भेद हो सकते हैं, उनके कार्योंमें भी विषमता होती है; परंतु सबमें रहनेवाले द्रष्टा, चेतन, अमल, सहज सुखराशिमें कोई भी भेद नहीं है। उसी बोधरूप आत्मामें वास्तविक समानता, स्वतन्त्रता, भ्रातृता हो सकती है। जडमें न स्वतन्त्रता ही सम्भव है, न समानता। आधि, व्याधि, मृत्युके परतन्त्र, किसी भी जड वस्तुमें स्वतन्त्रताका राग अलापना केवल विडम्बना ही है। सर्वोपाधिकृत भेदविवर्जित आत्माको ही लेकर समानता सम्भव है। जो सब प्राणियोंमें एक आत्मा या भगवान्को देखता है, वह किसका विरोध करेगा, किसका शोषक होगा ? उमा जे राम चरन रत विगत काम मद क्रोध। निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं विरोध॥ जो प्राणिमात्रमें भगवत्सत्ताका अनुभव करता है अथवा सभी प्राणियोंको भगवान्की पवित्र संतान समझता है, वह कैसे किसीका शोषक होगा ? शास्त्रोंमें
२७६ मार्क्सवाद और रामराज्य भगवान्ने कहा है—नाना प्रकारके भूषणो, अलंकारों, नैवेद्योद्वारा मेरा सम्मान करना और मेरे अंशभूत प्राणियोको सताकर शोषण करना वैसी ही मूर्खता है, जैसे किसीको संतुष्ट करनेके लिये किसीके गलेमें माला पहनाना और उसीकी आँखमें काँटा चुभाना । प्राणियोंका अपमान करनेवाले पुरुषकी ईश्वरार्चा भस्ममें डाली हुई आहुतिके तुल्य व्यर्थ है । इसीलिये शास्त्र कहते हैं कि ईश्वर ही जीवरूपसे श्वान, चाण्डाल, उष्ट्र, गर्दभादि सभी प्राणियोंमें प्रविष्ट है, अतः दान-मानादिद्वारा सबका ही सम्मान करना चाहिये, किसीका भी अपमान नहीं करना चाहिये— 'ईश्वरो जीवकलया प्रविष्टो भगवान् स्वयम् ।' (भाग० ३ । २९ । ३४) 'प्रणमेद्दण्डवद् भूमावाश्वचाण्डालगोखरम् ॥' (भाग० ११ । २९ । १६) यो मां सर्वेषु भूतेषु सन्तमात्मानमीश्वरम् । हित्वाऽर्चा भजते मौढ्याद् भस्मन्येव जुहोति सः ॥ (भाग० ३ । २९ । २२) भक्तराज प्रह्लादने यही प्रार्थना की थी— स्वस्त्यस्तु विश्वस्य खलः प्रसीदतां ध्यायन्तु भूतानि शिवं मिथो धिया । मनश्च भद्रं भजतादधोक्षजे आवेश्यतां नो मतिरप्यहैतुकी ॥ (भाग० ५ । १८ । ९) अर्थात् विश्वका कल्याण हो, खल प्राणी सज्जन बने । खलको मिटाना अभीष्ट नहीं; किंतु उसकी खलताका ही मिटाना अभीष्ट है । दुर्जन सज्जन बने, सज्जन शान्ति प्राप्त करे एवं शान्त प्राणी संसारबन्धनोसे मुक्त हो तथा वे मुक्त होकर औरोको भी बन्धनसे छुड़ानेका प्रयत्न करें— दुर्जनः सज्जनो भूयात् सज्जनः शान्तिमाप्नुयात् । शान्तो मुच्येत बन्धेभ्यो मुक्तश्चान्यान् विमोचयेत् ॥ सब प्राणी एक दूसरेका परस्पर शुभानुसंधान करें, शुभचिन्तक बने, सबका मन भद्रदर्शी हो, सबकी बुद्धि परमेश्वरनिष्ठ हो । इसीलिये महर्षिगण अपनी नाक कटाकर भी दूसरोके शकुन बिगाड़ने-जैसा किसीका अनिष्ट-चिन्तन नहीं करते थे । धनवान् बलवान्को देखकर उन्हें ईर्ष्या नहीं होती थी । उन्हींका अनुसरण करते हुए आस्तिक प्रतिदिन ईश्वरसे प्रार्थना करते हैं कि हे प्रभो ! सब सुखी हों, सब नीरोग हों, सब भद्रदर्शी हों और कोई भी दुःखभागी न हो । जिसे पुत्र न हो उसे पुत्र मिले, पुत्रवान्को पौत्र मिले, निर्धन धनवान् हो तथा धनवान् दीर्घजीवी हो— सर्वेऽपि सुखिनः सन्तु सर्वे सन्तु निरामयाः । सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभागभवेत् ॥ अपुत्राः पुत्रिणः सन्तु पुत्रिणः सन्तु पौत्रिणः । अधनाः सधनाः सन्तु जीवन्तु शरदां शतम् ॥ शास्त्रोंने भी अपनेसे निम्नस्तरवाले दुखी लोगोंपर करुणा, समान लोगोंसे
मैत्री तथा अपनेसे अधिक ऐश्वर्यवालोंसे मुदिता करनेके लिये कहा है। सब कुछ परमेश्वर- से उत्पन्न, परमेश्वरस्वरूप है । अतः परमेश्वर-स्वरूपसे ही सबका सम्मान उचित है । फिर शोषणकी कथा ही क्या है ? लोकव्यवहारार्थ दण्ड-विधान आदि भी प्रजाहितार्थ ही होता है, ठीक वैसे ही, जैसे अध्यापक छात्रोंके हितके लिये ही शासन करता है । जैसे कामीको सम्पूर्ण जगत् कान्तामय दिखायी देता है, वैसे ही भौतिकवादियोंको सब कुछ भूतमय ही प्रतीत होता है । इसीलिये वे सभी धर्मों, दर्शनों, आदर्शों आदिका मूल भौतिक अवस्था ही मानते हैं । प्रायः पाश्चात्त्य विचारोंके मतानुसार भिन्न-भिन्न दर्शन, निर्माताकी परिस्थिति, वातावरण एवं भौतिक अवस्थाके अनुकूल ही आविर्भूत होते हैं । इससे स्पष्ट है कि उन दर्शनोंमें भावनाओंकी ही प्रधानता है । सत्यका दर्शन वहाँसे बहुत दूर है । वस्तुतः बाह्य भावोंसे अप्रभावित समाधिसम्पन्न ऋषियोंके दर्शन ही सत्यसे समन्वित हो सकते हैं । पाश्चात्त्य दर्शन-विवेचनके प्रारम्भमे ही यह बात कही जा चुकी है । वस्तुतस्तु स्वतन्त्ररूपसे जड किसी एक भी कार्यके सम्पादनमें असमर्थ होता है । परंतु भौतिकवादी सभी वस्तुओंका एकमात्र कारण भौतिक अवस्था ही मानते हैं । आस्तिक मूलवस्तु स्वप्रकाश सत्-चेतनको ही मानते हैं । यद्यपि श्रोत्र, त्वक्, चक्षु आदि पञ्च ज्ञानेन्द्रिय एवं मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, अन्तःकरणचतुष्टय और इनके द्वारा उपलब्ध होनेवाले शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध एवं तदात्मक पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश सब-के-सब भौतिक ही हैं, फिर भी इन सबसे सूक्ष्म चैतन्य आत्मज्योतिद्वारा ही इन भूतों एव भौतिकोंकी सत्ता, स्फूर्ति एव गति निष्पन्न होती है । उसके बिना सर्वत्र जगदन्धतापत्ति अनिवार्य है । जैसे बाह्य जड- प्रपञ्च चेतन प्राणीके उपकरण एवं भोग्य होते हैं, उसी तरह अहंकार, बुद्धि, मन, इन्द्रिय, देह भी स्वविलक्षण, असंगत चेतन आत्माके ही उपकरण एव भोग्य हैं । जैसे झरने, स्रोत, सरिता आदि जलांश अपने अंशी समुद्रकी ओर स्वभावसे ही प्रवाहित होते हैं, उसी तरह व्यष्टिचेतन आत्मा समष्टिचेतन ब्रह्मकी ओर स्वभावतः प्रवाहित होता है । सम्पूर्ण भौतिक ऐश्वर्यको छोड़कर जीवमात्रकी प्रवृत्ति निद्रा या सुषुप्तिकी ओर होती है । अविद्यारूपी कारण बीज विशिष्ट चेतन अर्थात् अज्ञात सत्-रूप चेतनमें ही सुषुप्त जीव लीन होता है । सुषुप्तिमें यद्यपि विशिष्ट विज्ञानका अभाव रहता है, तथापि विशेष विज्ञानाभावका द्रष्टा कारण साक्षी विद्यमान रहता है । तभी 'जो मै सुखसे सो रहा था वही मैं जग रहा हूँ', यह अनुभूति होती है । यह कहा जा चुका है कि स्वभावसे सीमित सत्ता, ज्ञान, आनन्द, स्वतन्त्रता एवं सीमित शासन शक्तिवाला प्रत्येक जीव निःसीम अनन्त सत्ता, निःसीम अनन्त ज्ञान, आनन्द, स्वातन्त्र्य, शासनशक्तिसम्पन्न बनना चाहता है । तदनुगुण ही सबके प्रयत्न होते हैं । जैसे महाधन प्राप्त करनेके लिये व्यापारादि कार्योंमें पर्याप्त धन व्यय
२७८ मार्क्सवाद और रामराज्य करना पड़ता है, वैसे ही महती स्वतन्त्रता-प्राप्तिके लिये पर्याप्त स्वत- न्त्रताओंका त्याग कर विविध आध्यात्मिक, धार्मिक, सामाजिक नियम स्वीकार करना पड़ता है । इसीलिये कहा गया है कि सनातन परमेश्वर अपने सनातन अंश जीवोंका सनातन कैवल्यपद प्राप्त करानेके लिये ही सनातन निःश्वासभूत वेदादि शास्त्रोंद्वारा आध्यात्मिक, धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक, सनातन नियमरूप साधनोंका उपदेश करते हैं, अतः भौतिक अवस्थाओंके रद्दोबदलसे उनमें रद्दोबदल करनेका कोई प्रश्न ही नहीं खड़ा होता । यह दूसरी बात है कि साधनोंके न होनेपर साधनाधीन कामोंमें बाधा पड़ती है, भौतिक देहादि न रहनेपर तदधीन साधनोंमें बाधा होती है, वैसे ही धनादिके अभावमें तदधीन कार्योंमें बाधा पड़ती है । यह भी ठीक है कि भंग, सुरा आदि मादक पदार्थोंके सेवनका प्रभाव जैसे मन, बुद्धि एवं विचारोंपर पड़ता है, वैसे ही धन, भूषण, वस्त्र, भवन, वाहनादिके अस्तित्वमें मन-बुद्धिपर दूसरे ढंगका प्रभाव पड़ता है, उनके अभावमें दूसरे ढंगका प्रभाव पड़ता है । साधन- सम्पन्न दूसरे ढंगसे सोचते-विचारते हैं और साधनविहीन दूसरे ढंगसे । फिर भी प्रमास्वरूप ज्ञानपर धनादिके भावाभावका असर नहीं पड़ता । एक धन- विहीन भी नेत्रसे रूप देखता है, शब्द नहीं; श्रोत्रसे शब्द ही ग्रहण करता है रूप नहीं; वैसे ही धनी भी । सम्पत्ति-विपत्ति, साधन-सम्पन्नता, साधन-विहीनता, किसी भी दशामें प्रमाणके अधीन नियमित ही प्रमा होती है । नीरोग उपविष्ट हो अथवा रुग्ण होकर भूमिपर विलुण्ठित हो रहा हो, निर्दोष चक्षुसे रज्जुका रज्जु ही ज्ञान होगा । जंगली, मध्यकालीन एव आधुनिक प्रगतिशील, मनुष्य, सभ्य असभ्य, अमीर-गरीब, शोषक-शोषित, सभी एक रूपसे ही श्रोत्रादि प्रमाणोंद्वारा शब्दा