भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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२७६ मार्क्सवाद और रामराज्य भगवान्‌ने कहा है—नाना प्रकारके भूषणो, अलंकारों, नैवेद्योद्वारा मेरा सम्मान करना और मेरे अंशभूत प्राणियोको सताकर शोषण करना वैसी ही मूर्खता है, जैसे किसीको संतुष्ट करनेके लिये किसीके गलेमें माला पहनाना और उसीकी आँखमें काँटा चुभाना । प्राणियोंका अपमान करनेवाले पुरुषकी ईश्वरार्चा भस्ममें डाली हुई आहुतिके तुल्य व्यर्थ है । इसीलिये शास्त्र कहते हैं कि ईश्वर ही जीवरूपसे श्वान, चाण्डाल, उष्ट्र, गर्दभादि सभी प्राणियोंमें प्रविष्ट है, अतः दान-मानादिद्वारा सबका ही सम्मान करना चाहिये, किसीका भी अपमान नहीं करना चाहिये— 'ईश्वरो जीवकलया प्रविष्टो भगवान् स्वयम् ।' (भाग० ३ । २९ । ३४) 'प्रणमेद्दण्डवद् भूमावाश्वचाण्डालगोखरम् ॥' (भाग० ११ । २९ । १६) यो मां सर्वेषु भूतेषु सन्तमात्मानमीश्वरम् । हित्वाऽर्चा भजते मौढ्याद् भस्मन्येव जुहोति सः ॥ (भाग० ३ । २९ । २२) भक्तराज प्रह्लादने यही प्रार्थना की थी— स्वस्त्यस्तु विश्वस्य खलः प्रसीदतां ध्यायन्तु भूतानि शिवं मिथो धिया । मनश्च भद्रं भजतादधोक्षजे आवेश्यतां नो मतिरप्यहैतुकी ॥ (भाग० ५ । १८ । ९) अर्थात् विश्वका कल्याण हो, खल प्राणी सज्जन बने । खलको मिटाना अभीष्ट नहीं; किंतु उसकी खलताका ही मिटाना अभीष्ट है । दुर्जन सज्जन बने, सज्जन शान्ति प्राप्त करे एवं शान्त प्राणी संसारबन्धनोसे मुक्त हो तथा वे मुक्त होकर औरोको भी बन्धनसे छुड़ानेका प्रयत्न करें— दुर्जनः सज्जनो भूयात् सज्जनः शान्तिमाप्नुयात् । शान्तो मुच्येत बन्धेभ्यो मुक्तश्चान्यान् विमोचयेत् ॥ सब प्राणी एक दूसरेका परस्पर शुभानुसंधान करें, शुभचिन्तक बने, सबका मन भद्रदर्शी हो, सबकी बुद्धि परमेश्वरनिष्ठ हो । इसीलिये महर्षिगण अपनी नाक कटाकर भी दूसरोके शकुन बिगाड़ने-जैसा किसीका अनिष्ट-चिन्तन नहीं करते थे । धनवान् बलवान्‌को देखकर उन्हें ईर्ष्या नहीं होती थी । उन्हींका अनुसरण करते हुए आस्तिक प्रतिदिन ईश्वरसे प्रार्थना करते हैं कि हे प्रभो ! सब सुखी हों, सब नीरोग हों, सब भद्रदर्शी हों और कोई भी दुःखभागी न हो । जिसे पुत्र न हो उसे पुत्र मिले, पुत्रवान्‌को पौत्र मिले, निर्धन धनवान् हो तथा धनवान् दीर्घजीवी हो— सर्वेऽपि सुखिनः सन्तु सर्वे सन्तु निरामयाः । सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभागभवेत् ॥ अपुत्राः पुत्रिणः सन्तु पुत्रिणः सन्तु पौत्रिणः । अधनाः सधनाः सन्तु जीवन्तु शरदां शतम् ॥ शास्त्रोंने भी अपनेसे निम्नस्तरवाले दुखी लोगोंपर करुणा, समान लोगोंसे