भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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मैत्री तथा अपनेसे अधिक ऐश्वर्यवालोंसे मुदिता करनेके लिये कहा है। सब कुछ परमेश्वर- से उत्पन्न, परमेश्वरस्वरूप है । अतः परमेश्वर-स्वरूपसे ही सबका सम्मान उचित है । फिर शोषणकी कथा ही क्या है ? लोकव्यवहारार्थ दण्ड-विधान आदि भी प्रजाहितार्थ ही होता है, ठीक वैसे ही, जैसे अध्यापक छात्रोंके हितके लिये ही शासन करता है । जैसे कामीको सम्पूर्ण जगत् कान्तामय दिखायी देता है, वैसे ही भौतिकवादियोंको सब कुछ भूतमय ही प्रतीत होता है । इसीलिये वे सभी धर्मों, दर्शनों, आदर्शों आदिका मूल भौतिक अवस्था ही मानते हैं । प्रायः पाश्चात्त्य विचारोंके मतानुसार भिन्न-भिन्न दर्शन, निर्माताकी परिस्थिति, वातावरण एवं भौतिक अवस्थाके अनुकूल ही आविर्भूत होते हैं । इससे स्पष्ट है कि उन दर्शनोंमें भावनाओंकी ही प्रधानता है । सत्यका दर्शन वहाँसे बहुत दूर है । वस्तुतः बाह्य भावोंसे अप्रभावित समाधिसम्पन्न ऋषियोंके दर्शन ही सत्यसे समन्वित हो सकते हैं । पाश्चात्त्य दर्शन-विवेचनके प्रारम्भमे ही यह बात कही जा चुकी है । वस्तुतस्तु स्वतन्त्ररूपसे जड किसी एक भी कार्यके सम्पादनमें असमर्थ होता है । परंतु भौतिकवादी सभी वस्तुओंका एकमात्र कारण भौतिक अवस्था ही मानते हैं । आस्तिक मूलवस्तु स्वप्रकाश सत्-चेतनको ही मानते हैं । यद्यपि श्रोत्र, त्वक्, चक्षु आदि पञ्च ज्ञानेन्द्रिय एवं मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, अन्तःकरणचतुष्टय और इनके द्वारा उपलब्ध होनेवाले शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध एवं तदात्मक पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश सब-के-सब भौतिक ही हैं, फिर भी इन सबसे सूक्ष्म चैतन्य आत्मज्योतिद्वारा ही इन भूतों एव भौतिकोंकी सत्ता, स्फूर्ति एव गति निष्पन्न होती है । उसके बिना सर्वत्र जगदन्धतापत्ति अनिवार्य है । जैसे बाह्य जड- प्रपञ्च चेतन प्राणीके उपकरण एवं भोग्य होते हैं, उसी तरह अहंकार, बुद्धि, मन, इन्द्रिय, देह भी स्वविलक्षण, असंगत चेतन आत्माके ही उपकरण एव भोग्य हैं । जैसे झरने, स्रोत, सरिता आदि जलांश अपने अंशी समुद्रकी ओर स्वभावसे ही प्रवाहित होते हैं, उसी तरह व्यष्टिचेतन आत्मा समष्टिचेतन ब्रह्मकी ओर स्वभावतः प्रवाहित होता है । सम्पूर्ण भौतिक ऐश्वर्यको छोड़कर जीवमात्रकी प्रवृत्ति निद्रा या सुषुप्तिकी ओर होती है । अविद्यारूपी कारण बीज विशिष्ट चेतन अर्थात् अज्ञात सत्-रूप चेतनमें ही सुषुप्त जीव लीन होता है । सुषुप्तिमें यद्यपि विशिष्ट विज्ञानका अभाव रहता है, तथापि विशेष विज्ञानाभावका द्रष्टा कारण साक्षी विद्यमान रहता है । तभी 'जो मै सुखसे सो रहा था वही मैं जग रहा हूँ', यह अनुभूति होती है । यह कहा जा चुका है कि स्वभावसे सीमित सत्ता, ज्ञान, आनन्द, स्वतन्त्रता एवं सीमित शासन शक्तिवाला प्रत्येक जीव निःसीम अनन्त सत्ता, निःसीम अनन्त ज्ञान, आनन्द, स्वातन्त्र्य, शासनशक्तिसम्पन्न बनना चाहता है । तदनुगुण ही सबके प्रयत्न होते हैं । जैसे महाधन प्राप्त करनेके लिये व्यापारादि कार्योंमें पर्याप्त धन व्यय