मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७८ मार्क्सवाद और रामराज्य करना पड़ता है, वैसे ही महती स्वतन्त्रता-प्राप्तिके लिये पर्याप्त स्वत- न्त्रताओंका त्याग कर विविध आध्यात्मिक, धार्मिक, सामाजिक नियम स्वीकार करना पड़ता है । इसीलिये कहा गया है कि सनातन परमेश्वर अपने सनातन अंश जीवोंका सनातन कैवल्यपद प्राप्त करानेके लिये ही सनातन निःश्वासभूत वेदादि शास्त्रोंद्वारा आध्यात्मिक, धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक, सनातन नियमरूप साधनोंका उपदेश करते हैं, अतः भौतिक अवस्थाओंके रद्दोबदलसे उनमें रद्दोबदल करनेका कोई प्रश्न ही नहीं खड़ा होता । यह दूसरी बात है कि साधनोंके न होनेपर साधनाधीन कामोंमें बाधा पड़ती है, भौतिक देहादि न रहनेपर तदधीन साधनोंमें बाधा होती है, वैसे ही धनादिके अभावमें तदधीन कार्योंमें बाधा पड़ती है । यह भी ठीक है कि भंग, सुरा आदि मादक पदार्थोंके सेवनका प्रभाव जैसे मन, बुद्धि एवं विचारोंपर पड़ता है, वैसे ही धन, भूषण, वस्त्र, भवन, वाहनादिके अस्तित्वमें मन-बुद्धिपर दूसरे ढंगका प्रभाव पड़ता है, उनके अभावमें दूसरे ढंगका प्रभाव पड़ता है । साधन- सम्पन्न दूसरे ढंगसे सोचते-विचारते हैं और साधनविहीन दूसरे ढंगसे । फिर भी प्रमास्वरूप ज्ञानपर धनादिके भावाभावका असर नहीं पड़ता । एक धन- विहीन भी नेत्रसे रूप देखता है, शब्द नहीं; श्रोत्रसे शब्द ही ग्रहण करता है रूप नहीं; वैसे ही धनी भी । सम्पत्ति-विपत्ति, साधन-सम्पन्नता, साधन-विहीनता, किसी भी दशामें प्रमाणके अधीन नियमित ही प्रमा होती है । नीरोग उपविष्ट हो अथवा रुग्ण होकर भूमिपर विलुण्ठित हो रहा हो, निर्दोष चक्षुसे रज्जुका रज्जु ही ज्ञान होगा । जंगली, मध्यकालीन एव आधुनिक प्रगतिशील, मनुष्य, सभ्य असभ्य, अमीर-गरीब, शोषक-शोषित, सभी एक रूपसे ही श्रोत्रादि प्रमाणोंद्वारा शब्दा