भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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वर्ग-संघर्ष २७९

अध्यारोपापवादाभ्यां निष्प्रपञ्चं प्रपद्यते । अध्यारोप एव अपवाद निष्प्रपञ्च ब्रह्मकी प्रतिपत्तिके उपाय हैं । अध्यारोप बिना निष्प्रपञ्च ब्रह्म वा् मन आदिका गोचर ही नहीं होता । महाकाश जिस घटके द्वारा घटाकाश बनकर गोचर होता है, वस्तुतः वह घट एव घटाकाश सब महाकाश ही है । अन्वय-व्यतिरेकसे घटमृत्तिकासे भिन्न वस्तु नहीं ठहरता । वैसे मृत्तिका जलसे, जल तेजसे, तेज वायुसे एव वायु आकाशसे भिन्न नहीं ठहरता । ठीक इसी तरह आकाश अहतत्त्वसे, अहतत्त्व महत्तत्त्वसे, महत्तत्त्व अव्यक्तसे तथा अव्यक्त सत्तत्त्व,से भिन्न नहीं ठहरता । इस प्रकार उपेय ब्रह्मकी प्रतिपत्तिका उपाय स्वरूपभूत सत्से भिन्न कुछ भी नहीं ठहरता । किंच यदि विकासवादके अनुसार अभी विचार चल ही रहा है तो पूँजीवादी वर्ग एव मजदूर-वर्गके इस वर्ग विरोध, वर्ग-संघर्षको विरोधकी अन्तिम कड़ी क्यों माना जाय ? हो सकता है आगे चलकर और प्रगतिशील लोग वर्गवाद सिद्धान्तको अपसिद्धान्त ही समझने लगे । आज अराजकतावाद आदि मत उपस्थित ही हो रहे हैं । बहुत सम्भव है कि वर्ग-संघर्षकी अशान्तिसे ऊबकर लोग साम्यवादकी मरुमरीचिका समझ जायें और अध्यात्मवादी होकर शान्तिमूलक धर्म-नियन्त्रित शासन तन्त्र रामराज्यको ही अपनायें । देखते ही हैं कि लोग कभी सत्त्वगुणसे हटकर रज एव तमको फिर तम एव रजसे हटकर पुनः सत्त्वको अपनाते हैं । जागरणसे स्वप्न एव स्वप्नसे सुषुप्तिमें पहुँचते हैं और सुषुप्तिसे पुनः जागरण अवस्थाको अपनाते हैं । अतः पूँजीवादी युगको प्रागैतिहासिक युगका अन्तिम अध्याय मानना भी निर्मूल है । मार्क्सकी जीवनी पढ़नेसे विदित होता है कि उसने पहले अनेक मार्ग अपनाये और छोड़े और हो सकता है यदि वह कुछ दिन और जीवित रहता तो अपने भौतिक द्वन्द्ववादकी त्रुटियोंको समझकर कोई और ही वाद अपनाता । किंतु सहस्रों, लाखों वर्षोंके अपने जीवनमें अपौरुषेय वेदादि शास्त्रोंद्वारा प्राप्त अनुभवोंमें महर्षियोंने रद्दोबदल करनेकी आवश्यकता नहीं समझी । वास्तविक पूँजीवाद कहा जाता है कि 'पूँजीवादी समाज भी प्राचीन वर्गोंके समान ही उसी वर्ग-कलहपर एक दलके द्वारा दूसरे दलके रक्तशोषणपर ही स्थिर है । साथ ही उसी पूँजीवादके द्वारा ही मनुष्यको वह उत्पादन-शक्ति भी प्राप्त होती है, जिसके द्वारा भौतिक बन्धनों और प्राकृतिक गुलामीसे मनुष्यको छुटकारा मिलता है और वह वर्गकलहको त्यागकर बौद्धिक सभ्यता या ज्ञानयुगका श्रीगणेश कर सकता है । यह 'ऐतिहासिक भौतिकवाद' विज्ञानकी अन्य शाखाओं के समान नीति अथवा आदर्शसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं रखता ।'