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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

वर्ग-संघर्ष २७९

अध्यारोपापवादाभ्यां निष्प्रपञ्चं प्रपद्यते । अध्यारोप एव अपवाद निष्प्रपञ्च ब्रह्मकी प्रतिपत्तिके उपाय हैं । अध्यारोप बिना निष्प्रपञ्च ब्रह्म वा् मन आदिका गोचर ही नहीं होता । महाकाश जिस घटके द्वारा घटाकाश बनकर गोचर होता है, वस्तुतः वह घट एव घटाकाश सब महाकाश ही है । अन्वय-व्यतिरेकसे घटमृत्तिकासे भिन्न वस्तु नहीं ठहरता । वैसे मृत्तिका जलसे, जल तेजसे, तेज वायुसे एव वायु आकाशसे भिन्न नहीं ठहरता । ठीक इसी तरह आकाश अहतत्त्वसे, अहतत्त्व महत्तत्त्वसे, महत्तत्त्व अव्यक्तसे तथा अव्यक्त सत्तत्त्व,से भिन्न नहीं ठहरता । इस प्रकार उपेय ब्रह्मकी प्रतिपत्तिका उपाय स्वरूपभूत सत्से भिन्न कुछ भी नहीं ठहरता । किंच यदि विकासवादके अनुसार अभी विचार चल ही रहा है तो पूँजीवादी वर्ग एव मजदूर-वर्गके इस वर्ग विरोध, वर्ग-संघर्षको विरोधकी अन्तिम कड़ी क्यों माना जाय ? हो सकता है आगे चलकर और प्रगतिशील लोग वर्गवाद सिद्धान्तको अपसिद्धान्त ही समझने लगे । आज अराजकतावाद आदि मत उपस्थित ही हो रहे हैं । बहुत सम्भव है कि वर्ग-संघर्षकी अशान्तिसे ऊबकर लोग साम्यवादकी मरुमरीचिका समझ जायें और अध्यात्मवादी होकर शान्तिमूलक धर्म-नियन्त्रित शासन तन्त्र रामराज्यको ही अपनायें । देखते ही हैं कि लोग कभी सत्त्वगुणसे हटकर रज एव तमको फिर तम एव रजसे हटकर पुनः सत्त्वको अपनाते हैं । जागरणसे स्वप्न एव स्वप्नसे सुषुप्तिमें पहुँचते हैं और सुषुप्तिसे पुनः जागरण अवस्थाको अपनाते हैं । अतः पूँजीवादी युगको प्रागैतिहासिक युगका अन्तिम अध्याय मानना भी निर्मूल है । मार्क्सकी जीवनी पढ़नेसे विदित होता है कि उसने पहले अनेक मार्ग अपनाये और छोड़े और हो सकता है यदि वह कुछ दिन और जीवित रहता तो अपने भौतिक द्वन्द्ववादकी त्रुटियोंको समझकर कोई और ही वाद अपनाता । किंतु सहस्रों, लाखों वर्षोंके अपने जीवनमें अपौरुषेय वेदादि शास्त्रोंद्वारा प्राप्त अनुभवोंमें महर्षियोंने रद्दोबदल करनेकी आवश्यकता नहीं समझी । वास्तविक पूँजीवाद कहा जाता है कि 'पूँजीवादी समाज भी प्राचीन वर्गोंके समान ही उसी वर्ग-कलहपर एक दलके द्वारा दूसरे दलके रक्तशोषणपर ही स्थिर है । साथ ही उसी पूँजीवादके द्वारा ही मनुष्यको वह उत्पादन-शक्ति भी प्राप्त होती है, जिसके द्वारा भौतिक बन्धनों और प्राकृतिक गुलामीसे मनुष्यको छुटकारा मिलता है और वह वर्गकलहको त्यागकर बौद्धिक सभ्यता या ज्ञानयुगका श्रीगणेश कर सकता है । यह 'ऐतिहासिक भौतिकवाद' विज्ञानकी अन्य शाखाओं के समान नीति अथवा आदर्शसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं रखता ।'

२८० मार्क्सवाद और रामराज्य यह भी कहा जाता है कि ‘मनुष्यने हजारों वर्षतक प्रकृतिकी निष्ठुर पराधीनतामें रहकर कष्ट भोगा । पाशविक दशासे छुटकारा पानेके लिये संग्राम किया । हजारो वर्षोंतक समाजकी स्थापनाके लिये उद्योग किया और बहुत विकास भी प्राप्त किया, फिर भी उसे न्याय तथा मानवीय अधिकारोंकी प्राप्ति न हुई ।’ कहते हैं—‘सामाजिक वर्गों और वर्गकलहका सिद्धान्त मार्क्सने आविष्कृत किया है । यद्यपि उससे पहले भी वर्ग-कलहका अस्तित्व देखा और समझा जा रहा था, तथापि श्रमजीवी दल पहले नगण्य था, अतः ऐतिहासिक महत्त्व प्राप्त न था ।’ पर वस्तुस्थिति यह है कि धर्मनियन्त्रित पूँजीपति एवं समाज राष्ट्रके विकास एवं कल्याणके कारण हैं । शास्त्र तथा धर्म-निरपेक्ष उच्छृङ्खल पूँजीवाद शोषणका कारण होता है । पूँजी स्वतः निन्द्य नहीं है, मालिकोंकी अच्छाई- बुराईसे पूँजीमें अच्छाई-बुराईका व्यवहार होता है । साम्यवादमे भी जनता नहीं तो सरकारको पूँजीपति बनना ही पड़ता है । उसके बिना कोई भी विकास- योजना, संग्राम, शस्त्रास्त्र सफल नहीं हो सकता । सामान्यरूपसे सरकारी भूमि, सम्पत्ति, उद्योग-धंधे या पूँजीका कोई मनमानी उद्योग नहीं कर सकता । परंतु बाढ़, भूकम्प, दुष्काल आदि विपत्तियोंके समय सरकारी पूँजी आदिका उद्योग जनहितके काममें हो सकता है । उसी तरह व्यक्तिगत भूमि, सम्पत्ति, पूँजी भी रहनेमें कोई अहित नहीं । जैसे सरकारी खजानेकी पूँजी राष्ट्रकी है, वैसे ही व्यक्तिगत खजानेकी पूँजी भी राष्ट्रकी समझी जा सकती है; क्योंकि अवसरपर राष्ट्रके काममें उसका उपयोग किया जा सकता है । आज भी युद्धकाल अथवा असाधारण राष्ट्र-विप्लवमें सरकारोंका अधिकार होता है कि वे व्यक्तिगत सम्पत्ति, मोटर, मकान आदिको राष्ट्रहितकी दृष्टिसे अपने कब्जेमें ले ले । पूँजीके दुरुपयोग या अपव्ययपर सरकार कभी भी प्रतिबन्ध लगा सकती है । भेद यही रहता है कि जहाँ सरकारी वस्तुओंमें साधारण ममत्व होता है और सेवक नामधारी नौकरोंद्वारा लापरवाही, दुरुपयोग, लोहाकाण्ड, जीपकाण्डके समान भ्रष्टाचार होता है । व्यक्तिगत वस्तुओंमें व्यक्तिको प्राणतुल्य ममता होती है, लापरवाही दुरुपयोगकी भावना नगण्य होती है । हाँ, मूलधन आदिसे होनेवाली आमदनी विशेषतया अतिरिक्त आयपर शुक्रके अनुसार पूर्वोक्त पञ्चधा विभागका नियम होना अनिवार्य है । वस्तुतः शास्त्रीय उचित व्यवस्था-पालनमें प्रमाद होनेसे ही अनेक अनर्थ बढ़ते हैं । प्रायः शास्त्र, सज्जन, समाजकी उपेक्षासे सदाचार, संयम, नीति-नैपुण्य आदि सद्गुणोंका विनाश होता है । ऐसी हालतमें धन केवल

वर्ग-संघर्ष २८१ विलासिताका ही कारण बनता है । विलासितासे क्षीणता, क्लीवताकी वृद्धि होती है । इससे सततियोंकी कमी होती है और दूसरे कुलोंसे दत्तक लाये जाते हैं । यदि दत्तक हीन कुलसे आये तो उनमें विलासिता, अनाचार एव अनुदारताका और भी विस्तार होता है, और भी भीषण क्षीणता, क्लीवता घटती है, पुनश्च सततिकी हीनता बढती है । फलतः अधिकाधिक सम्पत्ति थोड़े से लोगोंके हाथमें रह जाती है । गरीबोंमें सम्पत्तिहीनता होते हुए भी संतानोंकी अधिकता होती है । इस तरह धनवान् निःसंतान और धनहीन बहुसंतान होने लगते हैं । दोनों जगह सदाचारकी कमी होनेसे धनवान्‌में अनाचार बढ़ते हैं, शोषण उत्पीड़नका विस्तार बढता है, धनहीनोंमें ईर्ष्या बढ़ती है, फलतः सघर्ष होता है । धनहीनोंका बहुमत शासन एव शासकोंका खात्मा कर देता है । बहुमतमे भी मुण्डगणनाकी ही प्रधानता रहती है । बहुमत शासनमें भी अल्पधन बहुधनवाले लोगोंका अस्तित्व रहता है । धनके आधारपर भी बहुमत बनाया जाता है । कभी-कभी बहुमतका अल्प मतपर अत्याचार होने लगता है । उसी समय धनवान् निर्धनका विरोध बढ़ जाता है । धनवानोंको शुद्ध शोषक मानकर उनके वोटोंका महत्त्व हटा दिया जाता है, फिर आर्थिक समानताके नामपर साम्यवाद स्थापित होता है । थोड़े दिनोंतक उसमें रुचि बढ़ती है, पर आगे चलकर व्यवस्थाकी दृष्टिसे वहाँ भी कुछ लोगोंका ही शासन-तन्त्रपर नियन्त्रण हो जाता है । व्यक्ति शासन-यन्त्रके नगण्य कल पुर्जे बन जाते हैं, शासन-यन्त्र मुट्ठीभर तानाशाहोंके हाथका खिलौना बन जाता है, साम्यवादी साथियोंमें ही फूट और शासक-शोषणकी भावना जग उठती है, इस तरह साम्यवाद अधिनायकवाद ही बन जाता है । शास्त्र, धर्म आदिका नियन्त्रण न होनेसे उच्छृङ्खलता बढ़ती है और फिर लोगोंकी धर्मनियन्त्रित शासन- तन्त्रकी पूरी प्रवृत्ति हो जाती है । इस तरह शासन-तन्त्रोंमें भी चक्रवत् परिवर्तन चलता रहता है । सुतरा धर्मनियन्त्रित होनेसे ही वर्ग कलहका अन्त होता है। वास्तविक सभ्यताके विकासकी बात भी तभी चल सकती है । इस प्रकार तथाकथित भौतिकवाद न सही, किंतु मूल भौतिक समस्त वस्तु अभौतिक चेतन वस्तुरूप प्रतिपत्तिका उपाय है। अतः भूतोंका पर्यवसान भी अभौतिक तन्त्रमें ही है । मनुष्य 'स्वय चेतन नहीं है, भूतोंका परिणाम है । यदि अचेतनमे भिन्न कोई स्वतन्त्र चेतन है तो उसकी 'प्रकृति पराधीनता, कष्ट भोगना या पाशविकतासे छुटकारा पानेके सग्राम' आदिका कुछ अर्थ ही नहीं है । जल- कणों या जलप्रपातो एव पाषाणोंके सघर्ष-जैसे ही मनुष्यके प्राकृतिक सघर्ष हैं । उससे किसी अभीप्सित पदार्थकी सिद्धि आदिकी बात नहीं उठती । अतएव वर्ग-कलह, वर्ग-सघर्ष, सामूहिक दलबंदी, दलविशेषके विजय आदिकी कहानी

३८२ मार्क्सवाद और रामराज्य सृष्टि-प्रलयकी परम्परा जबसे चली और जबतक रहेगी तबतक किसी-न-किसी रूपमें रहेगी ही । धर्म-नियन्त्रण घटनेपर संघर्ष बढ़ता है और धर्म-नियन्त्रण बढ़नेपर संघर्ष समाप्त हो जाता है । श्रेणीभेदका आधार मार्क्स कहता है—‘जैसे पशुओं, वनस्पतियों, धातुओंमें श्रेणीभेद है, वैसे मनुष्योंमें भी श्रेणीभेद है और वह आर्थिक आधारपर ही उचित है । जिस उपायसे मनुष्यसमुदाय अपनी रोजी कमाता है, वही उसका प्रधान लक्षण है । वेतन, मजदूरी आदिसे निर्वाह करनेवाले लोग श्रमजीवी वर्गमें आते हैं, पूँजी (जमीन, मकान, कारखाने, खाने) द्वारा कमानेवाले लोग पूँजीपति वर्गमें समझे जाते हैं । यद्यपि मजदूर भी कहीं बैंकमें रुपया रखता है, उससे ब्याज भी पाता है। कोई पूँजीपति भी अपने व्यापारकी देख-भाल करता है और मैनेजरकी हैसियतसे उसे कुछ तनख्वाह भी मिलती है, तथापि श्रमजीवीका खास आधार मजदूरी होता है। पूँजीपतिका खास आधार पूँजी होती है । इन वर्गोंमे भी अवान्तर भेद हो सकते हैं । कुछ बुद्धिजीवियोंको अधिक वेतन मिलता है, कुछको जानवरोंकी तरह मेहनत करके भी पेट भरनेतकको पूरा नहीं पड़ता । पर श्रमके आधारपर ही इन सबकी जीविका चलती है, अतः सभी श्रमजीवी हैं । पैदावारके साधनोंपर अधिकारवाले पूँजीपति हैं।' मार्क्सका कहना है कि 'इन दो वर्गोंके बीच गहरा और अमिट विरोध रहता है, जिसके फलस्वरूप वर्ग-कलह उत्पन्न होता है। श्रमजीवी अपने श्रमको ज्यादा से-ज्यादा कीमतपर बेचना चाहता है, अधिक से- अधिक मजदूरी प्राप्त करना चाहता है। पूँजीपति इस श्रमको कम-से-कम दाममें खरीदना चाहता है, कम से-कम मजदूरी देना चाहता है । यह विरोध दूकानदार और ग्राहको-जैसा नहीं, किंतु सिद्धान्तपर आधारित होता है । कारण, इसमें और खरीदने एवं बेचनेमें बड़ा अन्तर है । श्रमजीवी यदि अपने श्रमको जल्दी न बेचे तो भूखो मरने लगे । इसलिये उसे पूँजीपतिके इच्छानुसार मजदूरी करनेके लिये लाचार होना पड़ता है । इस तरह पूँजीपति श्रमजीवीपर अत्याचार करता है। यह विरोध ही श्रमजीवीको सगठनकी ओर प्रवृत्त करता है और श्रमजीवी संघ मजदूर-सभाओका जन्म होने लगता है । यही वर्ग- कलहकी पहली सीढ़ी है । निजी सम्पत्तिका सिद्धान्त जबतक रहेगा, तबतक पराधीनता बनी रहेगी। अतः निजी जायदादकी प्रणालीको मिटाकर उत्पत्तिके साधनोंपर समस्त जनताका अधिकार उचित है । इस भावनासे मजदूर सगठन और उग्र बन जाता है । वर्ग-भेद समझकर वर्ग-विद्वेष, वर्ग-संघर्षके अनन्तर ही वर्ग-विध्वंस क्रान्ति सम्भव है । अतः वर्तमान कष्टोंको दूर करना, मजदूरी बढ़ाना, बोनस-भत्ता बढ़ाना, कामके घंटोंमें कमी करना आदि सब गौण चीजें

हैं । मुख्य बात यही है कि निजी सम्पत्तिकी प्रणालीको समूल नष्ट कर दिया जाय । पैदावारके सब साधनोंपर सार्वजनिक अधिकार मान लिया जाय । परन्तु जबतक मजदूरोंका दृढ़ संघटन नहीं होता और उन्हें अपने भीतर अपने कष्ट दूर करनेकी शक्तिका विश्वास नहीं होता, तबतक साधारण सुधारोंपर ही संतोष कर लेते हैं। कभी उदारहृदय परोपकारी पुरुषोंपर विश्वास करके भी मजदूर-वर्ग शान्त हो जाता है । यह सब श्रमजीवी आन्दोलनमें विघ्न ही हैं। श्रमजीवियोंकी शक्तिहीन दशामें उन्नत- चरित्र पुरुष दयालु शासकोंको समझा-बुझाकर न्याय और जनताके हितकी दृष्टिसे साम्यवादी सिद्धान्तानुसार काम करनेके लिये प्रेरित करते हैं और कुछ अंशोंमें दरिद्रता और दुर्गति मिटानेका प्रयत्न करते हैं। किंतु जब उद्योग-धंधोंकी विशेष वृद्धि होती है और उत्तमोत्तम यन्त्रों, उत्पत्ति के साधन तथा विनिमयकी बहुतायत होती है, एक स्थानमें सैकड़ों मिलों, कारखानों, जहाजों रेलोंके जंकशनो, खानोंमें काम करनेवाले मजदूरोंका बड़ा जमघट होने लगता है, तब श्रमजीवियोंकी संख्या, शक्ति, संघटन और वर्गके ज्ञानकी बहुत बड़ी वृद्धि हो जाती है। तब काल्पनिक साम्यवाद या सुधारवादका सर्वथा अन्त हो जाता है । "उत्पत्ति और विनिमय साधनोंके एक स्थानमें एकत्रित होनेसे ही यह सब हो सकता है । हो सकता है कि मजदूरवर्ग एक साथ उद्योग-धंधों और जीवन-निर्वाहके सब कामोंको एक साथ बंद करके समस्त समाजको विश्वास दिला सकें कि श्रमजीवी समुदाय ही समस्त समाजके आर्थिक जीवनका प्राण है ।" उपर्युक्त कथन युक्तिहीन एवं अवैज्ञानिक है । वस्तुतः रोजी, रोजगार या जीविकाके आधारपर होनेवाले मनुष्योंका श्रेणीभेद कृत्रिम एवं गौण है । अतएव जीविका या रोजगारके बदल जानेसे मनुष्योंकी ऐसी श्रेणियाँ मिट जाती हैं । जैसे पशुओ, वनस्पतियोंके श्रेणीभेद अकृत्रिम होते हैं, उनके या दूसरोंके इच्छानुसार उनका श्रेणी-परिवर्तन सरल नहीं है । श्वान, शृगाल, गौ, हस्ति, गर्दभ आदि पशुओं, आम्र, निम्ब आदि वृक्षोंमें श्रेणी-परिवर्तन ऐच्छिक नहीं है । अवश्य ही उनपर देशकाल-भेदके अनुसार भिन्न-भिन्न भौतिक वातावरणके अनुसार भेद उपलब्ध होते हैं, तथापि उनकी विलक्षणता स्वरूपप्रविष्ट असाधारण धर्म-स्वरूप है । वैसे ही मनुष्योंका भी श्रेणीभेद अन्तरङ्ग है । जैसा कि भारतीय धर्ममें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, स्त्री-पुत्रादि भेद हैं । यहाँ अकृत्रिम श्रेणी-भेदके अनुसार जीविका या रोजी ग्रहण करनेका नियम है । इसीलिये वरणाद् वर्णः- जीविकाके कारण ब्राह्मणादि वर्ण नाम चलता है । श्रेणीगत असाधारणताके आधारपर ही जीविकाका वरण होता है । जीविकावरणके आधारपर श्रेणी-भेद नहीं होता । यद्यपि अश्व, वृषभ और आम्र निम्बके तुल्य ब्राह्मण क्षत्रियादि मनुष्योंमें विलक्षणता या श्रेणी-भेद प्रत्यक्ष उपलब्ध नहीं होता, तथापि यह भेद शास्त्रगम्य एवं फलबलकल्प्य है । जैसे

२८४ मार्क्सवाद और रामराज्य नेत्रसे विभिन्न जातीय आम्रोंमें भेद नहीं प्रतीत होते, वृक्ष, शाखा, पत्रादि सबके समान ही होते हैं तो भी फल एवं रस-गन्धादिकी विलक्षणता प्रमाणसिद्ध है। अश्वकी विभिन्न जातियोंमे नेत्रसे भेद परिलक्षित न होनेपर भी गुण-धर्म-भेदसे उनका भेद मान्य होता है। उसी तरह ब्राह्मणादिमें उपरिगत भेद भासित न होने- पर भी शास्त्रप्रमाणगम्य विभिन्न गुण-धर्मों, रक्तोके भेदसे उनमें भेद मानना अनिवार्य है। जैसे वैध और जारजात अवैध संतानोंमें उपरी कुछ भी भेद प्रतीत नहीं होता, तथापि शुद्धि-अशुद्धिका भेद समाजमें मान्य होता है। अनुलोम-प्रतिलोम- भेदसे साकर्यमें ही पर्याप्त भेद है। जारजातके ललाटमें शृङ्ग नहीं होता, कुलप्रसूतके हाथमें कमल खिला नहीं होता; किंतु शास्त्रो और उनके गुणोंके आधारपर उनका परिज्ञान होता है— न जारजातस्य ललाटशृङ्गं कुलप्रसूतस्य न पाणिपद्मम् । यथा यथा मुञ्चति वाक्यजालं तथा तथा तस्य कुलं प्रमाणम् ॥ सामान्यरूपसे नित्य अनेक समवेत धर्म ही जातिपदसे व्यपदिष्ट होता है। अनेक गोव्यक्तियोंमें समवेत नित्य गोत्व धर्मही जाति है। यह धर्म ही अपने धर्मीको स्वजातीय-विजातीयसे व्यावर्तन भी कर देता है। गोत्व-धर्म विजातीय घटादि और सजातीय अश्व-महिषादिसे गोका व्यावर्तन करता है। बहुधा आकृतिभेदसे जाति- भेदकी मान्यता चलती है। परंतु शास्त्रीय दृष्टिसे आकृतिभेद न रहनेपर भी ब्राह्मण- क्षत्रियादि वर्णोंमें जातिभेद मान्य होता है। पाणिनिव्याकरणकी दृष्टिसे जाति-अर्थमें ब्राह्मण और तद्भिन्न अर्थमें ब्राह्म बनता है। 'ब्राह्मोऽजातौ' (६।४।१७३) ब्राह्मणी आदिमे ङीष् प्रत्यय भी जाति अर्थमें ही होता है— आकृतिग्रहणा जातिर्लिङ्गानां च न सर्वभाक् । सकृदाख्यातनिर्ग्राह्या गोत्रं च चरणैः सह ॥ (महाभाष्य ४।१।६३) अनुगत संस्थानविशेषसे जातिकी व्यञ्जना होती है। यहाँ आकृतिको उपदेशका उपलक्षण माना गया है। तथा च ईदृश आकारवाली वस्तु गौ है, इस प्रकारके उपदेशसे गोत्व जातिका परिज्ञान होता है। कारिकामें कहा गया है कि जो असर्व- लिङ्गभागी हो और एक वारके उपदेशसे अनुगतरूपेण ग्राह्य हो, वही जाति है। 'ब्राह्मण:' 'वृषलः' आदि शब्द पुल्लिंग, स्त्रीलिङ्ग होनेपर भी नपुंसकलिंग नहीं हैं, इसलिये इनके अनुगत-संस्थान आकृति अनुपलब्ध होनेपर भी जातिका व्यवहार होता है। संस्थान व्यंग्य गोत्वादि जाति या उपदेशगम्य ब्राह्मणादि जाति जन्मसे ही होती है। साथ ही जाति यावद्द्रव्यभावी असर्वलिङ्गभागिनी तथा अनेकानुगत होती है— आविर्भावविनाशाभ्यां सत्त्वस्य युगपद्गुणैः । असर्वलिङ्गां बह्वर्थां तां जातिं कवयो विदुः ॥ (व्या० महाभाष्य ४।१।६३)

वर्ग-संघर्ष २८५ जैसे गुणके बिना द्रव्य नहीं रहता, वैसे ही जातिके बिना भी द्रव्य नहीं रहता और द्रव्यके रहते जैसे गुणका नाश नहीं होता, वैसे ही जातिका भी नाश नहीं होता । इसीलिये मृतहरिणके शरीरको भी हरिण ही कहा जाता है । क्षत्रिय-गुणकर्मवाले परशुराम, द्रोण, कृप, अश्वत्थामा आदिको ब्राह्मण ही कहा गया है तथा ब्राह्मण-गुणकर्मवाले युधिष्ठिरादिको भी क्षत्रिय ही कहा गया है । शुभाशुभ कर्मोंके अनुसार जैसे शूकर, कूकुर, देव, मनुष्यादि जातियाँ प्राप्त होती हैं, वैसे ही शुभाशुभ कर्मोंके अनुसार ब्राह्मण, क्षत्रियादि जातियाँ प्राप्त होती हैं— तद्य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत्ते रमणीयां योनिमापद्येरन् ब्राह्मणयोनिं वा क्षत्रिययोनिं वा वैश्ययोनिं वा ॥ (छान्दो० उप० ५ । १० । ७) कर्मोंके अनुसार जैसे हरिणीसे हरिण उत्पन्न होते हैं, वैसे ही ब्राह्मण-ब्राह्मणी- से ब्राह्मण उत्पन्न होता है। जन्ममूलक वर्ण-व्यवस्था और तन्मूलक कर्म धर्म-व्यवस्था होती है । जन्मना वर्ण और कर्मणा उत्कर्ष यही व्यावहारिक स्थिति है । योनि-विद्या और तप ब्राह्मण्यका कारण होता है । विद्या-तपके बिना भी जाति ब्राह्मण्य होता है । योनि बिना विद्या और तपसे 'सिंहो माणवकः' के समान गौण ब्राह्मण्य आता है। सिंह- सिंहीसे जन्म होने और शौर्य न होनेसे जाति सिंहत्वका व्यवहार होता है। पर सिंह- सिंहीसे जन्म न होने तथा शौर्य आदि गुणयोग होनेपर गौण सिंहत्वका व्यवहार होता है। 'जन्मना प्राप्यते सा जातिः ।' जाति मुख्यरूपसे जन्मना ही होती है, फिर भी कहीं-कहीं देशके नामसे भी जातिका व्यवहार होता है । इसका कारण यह है कि देशके सम्बन्धमे जाति-व्यञ्जक स्थितिमें विशेषता आती है । विभिन्न देशके जलवायु आदिके प्रभावसे रंग-रूप- बनावटमें भेद पड़ता है । व्रीहि आदि अन्नों, आम्रादि फलोंपर भी देशका प्रभाव पड़ता है । इन सब बातोंका प्रभाव मनुष्योंपर भी पड़ता है । इसलिये चीनी, जापानी, बर्मी, इंगलिश, अफ्रीकी मनुष्योंके भी रूप रंग-बनावटका भेद उपलब्ध होता है । तत्तत्स्थान भेदसे व्यंग्य होनेके कारण उनमें जाति भेदकी कल्पना होती है । अधिक क्या, भारतमें भी नेपाली, मैथिल, पजाबी, द्रविण, बंगाली, उत्कल, मद्रासी मनुष्योंमें बनावटका भेद उपलब्ध होता है । यावद्द्रव्यभावी होनेके कारण देशादि-जन्य विशेषताओंके कारण जातिभेदकी कल्पना चल सकती है । परंतु ब्राह्मणत्वादि जाति-संस्थान व्यंग्य नहीं है, वह साक्षात् उपदेशगम्य होती है। यही कारण है कि मिथिला, उत्कल, महाराष्ट्र, तैलंगादि भारतके विभिन्न भागोंके मनुष्योंमें बनावटका भेद होनेपर भी ब्राह्मणत्व-क्षत्रियत्वादि सर्वत्र समान माना जाता है । यदि दैवात् परम्परासे ब्राह्मणत्वादि जातियाँ और वेदशास्त्रानुकूल आचरण अंग्रेजों, जर्मनों और यहूदियोंके भी बने होते तो उनके रूप-रंगके भेद रहनेपर भी

मार्क्सवाद और रामराज्य ब्राह्मणादि माननेमें कोई आपत्ति न होती । बल्कि अपने मनु आदि स्मृति- कारोंने माना ही यह है कि बहुत से-क्षत्रिय दिग्विजयके लिये बाहर जाकर ब्राह्मणोंके साथ सम्बन्ध और वैदिक आचार-विचार छूट जानेसे म्लेच्छजातिके हो गये— शनकैस्तु क्रियालोपादिमाः क्षत्रियजातयः । वृषलत्वं गता लोके ब्राह्मणादर्शनेन च ॥ पौण्ड्रकाश्चौण्ड्रद्रविडाः काम्बोजा यवनाः शकाः । पारदाः पह्लवाश्चीनाः किराता दरदाः खशाः ॥ मुखबाहूरुपज्जानां या लोके जातयो बहिः । म्लेच्छवाचश्चार्यवाचः सर्वे ते दस्यवः स्मृताः ॥ ( मनु० १० । ४३–४५ ) इस तरह वैदिकोंमें किसी तरह द्वेष या रागसे उत्कर्षापकर्षकी कल्पना नही है । तात्त्विक जाति-भेद होनेपर भी किसीका उत्थान ज्ञान उन्हे नहीं खलता । इसलिये धर्मव्याध आदि अन्त्यज, विदुरादि शूद्र, तुलाधार आदि वैश्यो-जैसे यहाँ कितने

वर्ग-संघर्ष २८७ अनुगत प्रतीतिका विषय ही ब्राह्मणत्वादि जाति है। फिर भी यहाँ जो शङ्का की जाती है कि वृक्षत्वजातिका ज्ञान यदि प्रत्यक्ष माना जाय तब तो उसमें शब्दरूपी सहकारीकी कोई आवश्यकता ही नहीं रहती, वह तो इन्द्रियसे ही हो सकता है, पर ब्राह्मणत्वके कोई भी संस्थान व्यञ्जक नहीं है। तब वृक्षत्वके समान ब्राह्मणत्वको प्रत्यक्षसिद्ध कैसे माना जाय ? पर इसका समाधान स्पष्ट है—'सब जातियोंके समान व्यञ्जककी आवश्यकता नहीं होती। वृक्षत्वमें शाखापत्रादि संस्थान व्यञ्जक हैं। सुवर्णत्व जातिके प्रत्यक्षमें रूप व्यञ्जक है। इसी प्रकार ब्राह्मणत्व जातिके प्रत्यक्षमें माता-पिताकी जातिका ज्ञान व्यञ्जक है। जिस प्रकार गान्धर्ववेदके ज्ञाता स्वरोंकी जातियाँ, जौहरी रत्नोंकी जातियाँ पहचान लेते हैं, दूसरे लोग कुछ नहीं जान पाते, इसी प्रकार निपुण लोग ब्राह्मणत्वादिको जान लेते हैं। नारदादिकोंने वाल्मीकिको मिनटोंमें ब्राह्मण जान लिया था। सत्यकाम जाबालके ब्राह्मणत्वको उसके आचार्यने जान लिया था। कहा जाता है कि 'आजकल विशुद्ध रक्तका अभिमान केवल दम्भहै, क्योंकि कोई भी जाति अछूती नहीं बची है। सबका किसी-न-किसी रूपमें मिश्रण हुआ है। रंग-रूपमें भेद ही मिश्रणका प्रमाण है। जैसे काली मुर्ग़ी और श्वेत मुर्गेसे उत्पन्न चार बच्चोंमें एक काला और एक श्वेत है, बाकी दो मिश्रित हैं। दूसरी पीढ़ीमें सोलह बच्चोंमें एक श्वेत, एक काला और चौदह मिश्र रंगके तथा तीसरी पीढ़ीमें चौंसठमें एक काला और एक श्वेत, बाकी सब मिश्र रंगके होते हैं, वैसे ही मनुष्योंमें भी पश्चिमी श्वेत और पीत मंगोलका मिश्रण होनेसे कुछ पश्चिमीय रंगके कुछ मंगोल रंगके होते हैं; पर अधिकांश पारसी, ईरानी ढंगके होते हैं। अतः पारसी जाति इन्हीं दोनोंका मिश्रण है। यही स्थिति उत्तर भारतकी उच्च जातियोंमें है। वहाँ मिश्रण स्पष्ट है।' पर यह कहना भूल है। कलमी आमोंमें कभी भी मूल आमके समान फल नहीं होते, तो क्या इतनेसे ही वह आम किसी दूसरे आमका बीज मान लिया जाय ? जैसे काली, श्वेत मुर्गीमें भी जाति वही रहती है, नील, श्वेत, लाल, सब रंगोंकी गायोंमें गोत्व और पुच्छत्व रहता है, वैसे ही पञ्जाबी, मैथिल, बंगाली, द्रविड़, उत्कल, तेलंग ब्राह्मणोंके रूप-रंगमें भेद होनेपर भी ब्राह्मणत्व समान रहता है। कभी काले माता-पितासे भी गोरे बच्चे पैदा हो जाते हैं। कभी तो किसी पशुकी आकृतिका बच्चा पैदा हो जाता है। तब क्या उसका पशुके साथ सम्बन्ध माना जाय ? आर्योंमें स्त्रियाँ अत्यन्त सुरक्षित रहती हैं। यहाँ अनादिकालसे वेदादिशास्त्रोंके अनुसार स्त्रियाँ परतन्त्र रहती हैं, पातिव्रत्य पालन करती हैं। अतः यहाँ माता-पिताका सम्बन्ध ज्ञान और तदधीन ब्राह्मणत्वादिका प्रत्यक्ष ज्ञान सुलभ है। यही आर्योंकी विशेषता है, जो अन्यत्र बहुत कम मिलेगी। आज मोहवश उसे ही खो देनेके लिये कुशिक्षाके प्रभावसे प्रभावित भारतीय भी व्यग्र हो रहे हैं।

२८८ मार्क्सवाद और रामराज्य अस्तु, वैज्ञानिक ढंगसे मनुष्योंमें बाह्य एवं आन्तरिक भेदसे जातिभेद ठीक उसी प्रकार स्वीकार्य है, जैसे मनुष्यमें धन एवं बल-बुद्धि आदिमें अनेक प्रकारका तारतम्य होता है। अतः जो किसीकी अपेक्षा शोषित है, वही किसीकी अपेक्षा शोषक सिद्ध होगा। अर्बुदपति, कोटिपति, लक्षपति, सहस्रपति, शतपति आदिमें सबमें परस्पर सापेक्ष शोषक-शोषित-भाव है। व्यापार आदिके द्वारा निर्वाह करनेवाला शोषक, मजदूरी-नौकरीके आधारपर जीवन चलानेवाला शोषित—यह व्यवस्था भी नहीं चल सकती। कारण, कितने ही ऐसे लोग हैं जो व्यापारादि भी करते हैं, नौकरी भी। केवल नौकरी करनेवालोंमें भी कुछ लोगोंको हजारो, लाखों रुपये मासिक वेतन मिलता है और हजारों, लाखों वैतनिक उनके नियन्त्रणमें पीसते हैं। क्या मार्क्सवादी उन्हे भी शोषित कहेंगे ? बड़े-बड़े इन्जीनियर, बड़े-बड़े एडवोकेट १०-१० मिनटका पारिश्रमिक हजारों रुपये ले लेते हैं। चिकित्सक, डाक्टरोंकी भी यही हालत है, एक-एक आपरेशनमें लाख-लाख रुपये ले लेते हैं। यही स्थिति बड़े फील्डमार्शलो, चीफजस्टिसो, राष्ट्र- पतियों एव मन्त्रियोंकी भी है। पूँजीपतियोंके परम प्रिय कई ऐसे नौकर हजारोंका वेतन लेते हैं और गरीबो मजदूरोका पूर्ण शोषण करनेवाले ये ही हैं। क्या वे भी शोषित समझे जा सकते हैं ? इस तरह मार्क्सवादी किसी तरह भी वास्तविक वर्ग- भेदका निर्धारण नहीं कर सकता । अतः इन वर्गभेदोमें अमिट विरोधकी कल्पना करना व्यर्थ है। अनेक नौकर मालिकोके अत्यन्त हितैषी होते हैं। उनके नामपर प्राण देना उनके लिये साधारण-सी बात है। आज भी वैतनिक सैनिक अपने सेनापतियोके आज्ञानुसार प्राण देते ही हैं। हाँ, विद्वेष फैलानेवाले साहित्यिको तथा प्रचारकोकी महिमासे मालिक-मजदूरोंमें ही क्यो, पिता-पुत्र, पति-पत्नियो, गुरु- शिष्योंमें भी आज अमिट वैर-विग्रह बढ़ रहा है, छात्रोका प्रोफेसरों, प्रिन्सिपलों, कुलपतियोके साथ भी अमिट विरोध बन गया है। प्राचीनकालमें बुद्धिजीवी, श्रमजीवी आदि नौकरों तथा साधनसम्पन्न भूमि-सम्पत्तिवाले मालिकोमें पिता-पुत्र जैसा प्रेम होता था। अनेको उदाहरण पुराणोंमे मिलते हैं, जिनमें मालिकोंके लिये सेवावृत्तिवाले नौकरोंने अपनी जान लडा दी थी, जिसका नमक खाते थे, उसके प्रति कृतज्ञ रहते थे। नमकहरामीको पाप समझते थे। अतः पूँजीपतियों, मालिकों, मजदूरोंमें सघर्ष उत्पन्न की हुई चीज है, न वह स्वाभाविक है और न उनका विरोध ही अमिट है। जहाँ राष्ट्रसेवाकी दृष्टिसे दोनो मिलकर काम करेंगे, वहाँ मालिक स्वयं मजदूरको पुत्रके तुल्य समझकर उसकी प्रत्येक सुविधाका ध्यान रखते हुए उसकी जीविकाका ध्यान रखेगा। वैज्ञानिको, इन्जीनियरो, डाक्टरों, वकीलोंको— पर्याप्त वेतन दिया ही जाता है। सामान्य मजदूरोंको भी उनकी योग्यता एवं आवश्यकताका ध्यान रखते हुए उचित वेतनकी व्यवस्था की जाती रही है। आज भी

अनेक स्थानोंमें मालिकों-मजदूरोंमें परस्पर प्रेम है, संघर्ष नहीं। अवश्य ही अनेक प्रकृतिके लोग होते हैं अतः बहुत-से मालिकों एवं मजदूरोंमें संघर्ष भी होता ही है। मजदूर भी इस प्रकृतिके होते हैं कि कम-स कम परिश्रम और ज्यादा से-ज्यादा मजदूरी लेना चाहते हैं। मालिक भी कम-से-कम दाममें ज्यादा-से-ज्यादा काम लेना चाहते हैं। कहीं-कहीं मजदूरोंमें अधिक भलमनसाहत होती है। कहीं पूँजीपतियोंमें भी भलमनसाहत होती है। पूँजीपतियोंके पास ऐश्वर्यमद होनेसे प्रमाद, विलासिता, निर्दयता, अत्याचार अधिक सम्भव होता है अवश्य; परन्तु यह सब दोष किसीमें भी स्वाभाविक एवं अनिवार्यरूपसे नहीं होते। इसीलिये सभी सेठोंमें भी भले-बुरे होते ही हैं। सर्वत्र परिस्थितियों एवं वातावरण-निर्माण और शिक्षादिद्वारा दोष मिटाये भी जा सकते हैं और बढ़ाये भी जा सकते हैं। वर्गवादी खूनी क्रान्ति शीघ्र लानेके लिये संघर्ष बढ़ानेका ही प्रयत्न करते हैं। इसीलिये वे दोनों वर्गमें सद्भावना बढ़ने, यहाँतक कि मजदूरोंके वेतन, भत्ता, मजदूरी आदि बढ़ने एवं कामके घंटोंमें कमी होनेको भी संघर्ष और कम्युनिष्ट राज्य बननेमें बाधक समझते हैं। फिर भी बोनस, भत्ता, वेतन बढ़ाने और कामके घटोमे कमी करानेके लिये आन्दोलन करते हैं। इस सम्बन्धमे उनका उद्देश्य यही रहता है कि इसी मार्गसे संघर्ष बढ़ेगा। माँग सफल हो जायगी तो सफलताका श्रेय उन्हें प्राप्त होगा, मजदूर-नेताओपर मजदूरोंका विश्वास बढ़ेगा; आन्दोलनमें भी विश्वास बढ़ेगा और पुनः अधिक संघर्षके साथ और अधिक माँगके लिये आन्दोलन बढ़ायेंगे। माँग पूरी न होनेसे द्वेष और बढ़ेगा। हडतालो, जुलूसों, सभाओंद्वारा उत्तेजना बढ़ाकर मजदूरोंको तोड़-फोड़के कामोंमें प्रोत्साहित किया जाता है। प्रबन्धको, शासकोंके द्वारा हस्तक्षेप करने, लाठी चार्ज, गोलीकाण्ड होनेसे वह विद्वेष-वैमनस्य और बढ़ता है। बस, इसी वैमनस्यको बढ़ानेके लिये कम्युनिष्ट तरह-तरहकी माँग उपस्थित करते रहते हैं। रामराज्यवादीकी दृष्टिमें योग्यता, आवश्यकता एवं उत्पा- दन, लागत खर्च, टैक्स और आयको देखते हुए, काम-दाम-आरामकी व्यवस्था होती है। साम्यवादी शासनको भी इन बातोंका ध्यान रखते हुए ही व्यवस्था करनी पड़ती है। न सभी सब प्रकारका काम ही कर सकते हैं और न सभीको एक-सा पारिश्रमिक ही दिया जा सकता है। प्रत्येक व्यक्तिको एक-सी सुविधा नहीं मिल सकती। हर व्यक्तिके लिये वायुयान, मोटर आदिकी व्यवस्था होनी कठिन ही है। जहाँ सद्भावना एवं न्यायकी बुद्धि नहीं है, वहाँ परिस्थितियोंसे लाभ उठानेकी चेष्टा सभी करते हैं। जैसे भूखो मरते हुए मजदूर अल्पमूल्यमें अपना श्रम बेचने को लाचार होता है। पूँजीपति उस लाचारीका अनुचित लाभ उठाकर उसके श्रमका उचित मूल्य नहीं देता, उसी तरह मजदूर भी संगठित होकर, हडताल करके, स- मा० रा० ६२—

काम ठप करके, पूँजीपतिको भी ज्यादा दाम देनेके लिये लाचार कर देते हैं। इतना ही क्यों ? सभी कुछ छीनकर उसे समाप्त भी कर डालते हैं। कुछ ऐश्वर्यमदोन्मत्त धनिकोंके प्रमादसे, कुछ उनके विरुद्ध किये गये अनुचित प्रचारसे ऐसा वातावरण बन जाता है कि निरपराध, शिष्ट, परोपकारी, धनवान्को भी अपमानित होना पड़ता है और कभी शिष्ट ईमानदार मजदूरको भी अत्याचारका शिकार बनना पड़ता है। सड़कोपर कभी रिक्सा या ताँगासे जब मोटरकारका एक्सीडेण्ट हो जाता है तो भले ही अपराध रिक्सेवालेका ही हो, फिर भी साधारण जनसमूह मोटरवालेको ही अपराधी ठहराता है। वस्तुतः दूकानदार एवं खरीदार-जैसा ही मजदूर तथा मालिकोका संघर्ष है। जब देहाती किसानोको टैक्स देने तथा वस्त्रादि आवश्यक वस्तु प्राप्त करनेके लिये रुपयोंकी अत्यधिक अपेक्षा होती है, तब उन्हे अपने गाढ़े पसीनेकी कमाईका गेहूँ, चावल, कपास, गन्ना आदि अल्प मूल्यमें ही देनेके लिये लाचार होना पड़ता है। परन्तु जब कभी उन्हे बेचनेकी आवश्यकता नहीं होती, तो वे अपनी वस्तुओका मनमाना दाम बढ़ा देते हैं, और अभाववाले लोग ज्यादा-से-ज्यादा दाम देनेको लाचार होते हैं। असंतुलनके कारण संघर्षसे किसीका लाभ नहीं होता । मजदूर आन्दोलन करके ज्यादा दाम प्राप्त करता है तो मालिक वस्त्रादिपर ज्यादा दाम बढ़ा देता है। उसके लिये किसानोको ज्यादा दाम देना पड़ता है तो वे अपने अन्नका दाम बढ़ा देते हैं। फलतः मजदूरोने आन्दोलनो- द्वारा ज्यादा मजदूरी पायी, वह उधर अन्न, वस्त्र खरीदनेमें खतम हो गयी। इधर मध्य श्रेणीके लोगोंका जीवन अधिक संकटपूर्ण हो जाता है। यह कहा जा चुका है कि केवल प्रचारके बलपर निर्माण एवं विध्वंसकार्य होता रहता है। वर्ग- भेद—वर्गविद्वेष पैदा कर अवश्य वर्गविध्वंस किया जा सकता है, संसारमें दुराचार, व्यभिचार भी होता है, डाकुओके दल भी संघटित होते हैं, उनको कभी-कभी पर्याप्त सफलता भी मिल जाती है, परन्तु एतावता वह धर्म, सदाचार या सिद्धान्त नहीं बन सकता। पूर्वोक्त युक्तिसे पैदावारके साधनापर यदि लोगोके व्यक्तिगत अधिकार वैध हैं, तब उनका मिटाना या समाज या राष्ट्रके नामपर कुछ तानाशाहोके हाथमें उत्पादन साधनोका जाना कथमपि उचित नहीं कहा जा सकता। यह भी कहा जा चुका है कि केवल मजदूरोके कारण ही उत्पादन-वृद्धि नहीं होती, किंतु वैज्ञानिकों, नरेशों, पूँजीपतियों एवं प्राकृतिक साधनों, कच्चे माल इत्यादिकोको ही इसका मुख्य श्रेय है। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश एवं सामयिक वृष्टि विविध प्रकारके लोहा, कोयला, तामा, सीसा, पारा तथा सर्वोपरि ईश्वर-निर्मित प्राकृत दिल, दिमाग, मस्तिष्क आदिका भी इन सब विकासोमें प्रमुख हाथ है। इनके बिना मजदूर कुछ भी नहीं कर सकते। यह मार्क्सवादी भी मानते ही हैं। पूँजीपतियोके

वर्ग-संघर्ष २९१ कारण ही हजारों कल कारखानोंका बनना सम्भव हो सका । लाखों मजदूरोंको एकत्र रहकर संघटित होने एवं आन्दोलन करनेकी सुविधा प्राप्त हुई । अन्यथा देहातों, गाँवोंमें अपने खाने कमानेमें परेशान मजदूरोंके लिये यह कहाँ सम्भव था कि वे दूर- दूरसे चलकर लाखोंकी संख्यामें एकत्र हो सके । शास्त्रीय दृष्टिसे इसे उपजीव्य विरोध कहा जाता है । जैसे पितासे उत्पन्न पुत्र पिताका घातक नहीं हो सकता, वैसे ही पूँजीपतियोंके सहारे संघटित एवं बलवान् होनेवाले मजदूर पूँजीपतियोंकी सम्पत्ति छीनकर उन्हें नष्ट कर दें, यह कृतघ्नता समझी जाती है—'जेहि ते नीच बड़ाई पावा । सो प्रथमहिं हति ताहि नसावा ॥' अग्निसे उत्पन्न धूम (मेघ) के द्वारा अग्निका नाश किया जाना ही इसका उदाहरण है—'धूम अनल संभव सुनु भाई । तेहि बुझाव घन पदवी पाई ॥' इसके अतिरिक्त जिस मजदूरवर्गने वेतन लेकर अपना श्रम बेच डाला, फिर उसे क्या अधिकार है कि वह उत्पादन-साधनों या उत्पन्न हुई वस्तुओपर अधिकार कर ले ? किसीने अपनी कोई चीज किसीके हाथ बेच दी, तो उसमें या उसके द्वारा प्राप्त फलमें उसका कोई भी अधिकार नहीं रहता । शास्त्रानुसार दक्षिणाके द्वारा क्रीत-ऋत्विजो- द्वारा होनेवाले यज्ञोंका फल यजमानको ही मिलता है, ऋत्विजोंको नहीं—'शास्त्रफलं प्रयोक्तरि तल्लक्षणत्वात्' (३।७।१८—३।८।५) इत्यादि पूर्व-मीमांसादर्शनमें यह स्पष्ट है। अवश्य ही ईश्वरके तुल्य जो भी अदृष्टोंद्वारा विश्व सृष्टिमें कारण है। अतः विश्वमें सभी प्राणियोंका हिस्सा है। इस दृष्टिसे न केवल मनुष्योंका ही अपितु प्राणिमात्र- का उसमें हिस्सा है। अतः सबको जीवित रहने, विकसित होनेका अधिकार है। अतएव किसीपर अन्याय, अत्याचार होना अनुचित है। पशु, पक्षी, वृक्ष आदिका भी अन्याय- पूर्ण संहार तथा शोषण पाप है । इस दृष्टिसे राज्यद्वारा एक सर्वसामान्य जीवन- स्तर निर्धारित होना आवश्यक होता है, जिसमें योग्यता, आवश्यकता तथा उत्पादनके अनुसार काम, दाम, आरामकी व्यवस्था की जाय और सभीको स्वस्थ, शिक्षित एवं विकसित होनेका अवसर मिले । इस दृष्टिसे मजदूरोंके भी वेतन का क्रम उचितरूपमें निर्धारित किया जाय । इस सम्बन्धमें न अत्यन्त समता ही लायी जा सकती है, न अत्यन्त विषमताका ही समर्थन किया जा सकता है। संतुलित समता, संतुलित विषमता ही मान्य हो सकती है। शरीरमें भी हाथ, पाँव, पेट, पीठ आदिमें तथा एक हाथकी ही अँगुलियोंमें भी मोटापन, पतलापन, लम्बाई-चौड़ाई आदि समान नहीं। कोई बड़ी, कोई छोटी, कोई मोटी, कोई पतली है, तथापि इनका एक संतुलन भी है। पेट बहुत मोटा हो जाय, हाथ-पैर दुबले हो जायँ तो शरीर स्वस्थ नहीं समझा जा सकता । निष्कर्ष यह है कि सामाजिक, आर्थिक संतुलन रहना बहुत आवश्यक है। इसी असंतुलनको दूर करनेके लिये भारतीय धर्मशास्त्रों, नीतिशास्त्रोंमें अनेक प्रकारके नियम हैं ।

२६२ मार्क्सवाद और रामराज्य शास्त्रानुसार प्रत्येक व्यक्ति एक दूसरेका मधु अर्थात् मोदहेतु माना गया है। पञ्च महायज्ञद्वारा विश्वका उपकारक बनता है। यज्ञसे देवताओका, ब्रह्मयज्ञसे ऋषियोका, भूतयज्ञसे कीट-पतंगों, पशु-पक्षियो, सभी प्राणियोका तर्पण किया जाता है, श्वान, काक, प्रेत, पिशाचादि सभी प्राणियोके तर्पणका प्रयत्न किया जाता है। अर्थात् मनुष्य केवल अपने लिये नहीं उत्पन्न हुआ है, किंतु सम्पूर्ण विश्वके तर्पणके लिये उसका जन्म है। भोजनकालमें जो भी भोजनार्थी आये, उसका नाम, गोत्र पूछे बिना उसे भोजन करानेका नियम है। रन्तिदेव आदि महापुरुषोंने ४८ दिनका निर्जल व्रत करनेके अनन्तर भी भोजन उपस्थित होनेपर नियमानुसार अतिथिकी प्रतीक्षा की। प्राप्त सत्तुक आदि सब कुछ ब्राह्मण, अन्त्यज आदिको प्रदान कर दिया था। जल पीनेके समय भी जब पुल्कसने आकर जल माँगा तो वह जल भी उसे दिया और प्राणान्त होते समय भी परमेश्वरसे यही प्रार्थना की कि 'प्रभो ! मुझे राज्य, स्वर्ग, अपवर्ग कुछ भी नहीं चाहिये, केवल दुखियोंका दुःख ही मुझे मिल जाय; जिससे वे सुखी हो जायें— न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्गं नापुनर्भवम् । कामये दुःखतप्तानां प्राणिनामार्तिनाशनम् ॥ मन्वादिने भी यह नियम रखा है कि जिसके घरमें तीन वर्षोंके लिये भृत्यादि भरणकी सामग्री हो उसे सोमयज्ञ करके उसीमें अपना धन लगाना चाहिये । यस्य त्रैवार्षिकं भक्तं पर्याप्तं भृत्यवृत्तये । अधिकं वापि विद्येत स सोमं पातुमर्हति ॥ (मनु० ११।७) विविध प्रकारके दानोका भी उद्देश्य असंतुलन मिटाना ही है। अतिरिक्त आयका पञ्चधा विभाजन करके राष्ट्रहितमें लगानेकी बात पीछे कही जा चुकी है। मनुने यह भी कहा है कि जो राजा असाधु पुरुषसे धन लेकर साधु-पुरुषोको प्रदान करता है, वह अपनेको नाव बनाकर उन दोनोको तार देता है— योऽसाधुभ्योऽर्थमादाय साधुभ्यः संप्रयच्छति । स कृत्वा प्लवमात्मानं संतारयति तावुभौ ॥ (मनु० ११।१९) इसी प्रकार अनुचित ढंगसे चोरबाजारी, चोरी, डाका, घूससे धनवान् बननेवाले असाधुओंसे धन छीनकर साधुओंको देना उचित है। ईमानदार धनवानोसे भी सहायता लेकर बिना रोजी-रोजगारवालोकी रोजीका प्रबन्ध करना राजाका कर्तव्य है। भूमिवालोंसे भी भूमि लेकर बेरोजगारी दूर की जा सकती है। हाँ, यह अवश्य है कि जिस कुँएसे पानी लिया जाय, उसको इस योग्य बनाये रक्खे कि वह आगे भी सहायता देने लायक रहे। किसी अगसे अस्थि या मासकी सहायता लेकर दूसरे अगकी आवश्यकता पूरी की जा सकती है, परंतु सहायक अंगको मिटा देना—नष्ट कर

वर्ग-संघर्ष २९३

देना अनुचित है। उसे पुष्ट बनाकर उसकी कमी पूरी करनी ही ठीक है। यही जड़वाद, अध्यात्मवादमें भेद है। अध्यात्मवादी अपनी शक्ति, सम्पत्तिको विश्व-सेवामें समर्पित करनेको लालायित रहता है, भारतीय नीतिके अनुसार दूसरे व्यक्तिकी वस्तु लेनेसे हर प्रकार बचना चाहता है। पर देनेवाला हर प्रकार अपनी वस्तु दूसरेको देना चाहता है। शास्त्र प्रतिग्रहसे बचनेका आदेश भी करते हैं और देनेवालेको हर प्रकारसे देनेका उपदेश भी। प्रतिग्रहसमर्थ पुरुषको भी प्रतिग्रहमे बचना चाहिये— 'प्रतिग्रहसमर्थोऽपि प्रसङ्गं तत्र वर्जयेन् ।' (मनु० ४।१८६) पर देनेवालेको कहते हैं कि— 'श्रद्धया देयम्, अश्रद्धया देयम्, श्रिया देयम्, ह्रिया देयम्, भिया देयम्।' (तैत्तिरीय उप० १।११।३) स्वतः श्रद्धासे दे, दूसरोंकी प्रेरणासे दे, लज्जासे दे, भयसे दे। टोला-पड़ोसके लोग भूखे रहेंगे तो कोई भी धनी अपनी कोठीमें सुखकी नींद सो न सकेगा। चोरी, डाका, लूट, खसोट आदि अवश्य ही मचेगी। इस दृष्टिसे देनेवाला हर तरह देना चाहता है। लेनेवाला बचना चाहता है। अतः लीजिये, लीजिये, नहीं, नहींका घोष सुनायी पड़ता है। आधुनिक साम्यवादियोंमें ठीक इसका उल्टा है। गरीबों-मजदूरोंके नामपर लेनेवाले कहते हैं, 'लड़कर लेंगे, झगड़कर लेंगे, मरकर-मारकर लेंगे, लेंगे।' देनेवाले कहते हैं—'नहीं देंगे, मर जायेंगे, मिट जायेंगे पर नहीं देंगे।' इस तरह यहाँ 'दो-दो, नहीं-नहीं' का घोष चलता है। अध्यात्मवादमें एक मुख्य उपासना है, जिसमें निर्गुण ब्रह्म जाननेके लिये विराट्, हिरण्यगर्भ तथा अव्याकृत ब्रह्मकी उपासना करनी पड़ती है। यह उपासना अहंग्रहरूपसे होती है। उपासकको अपने व्यष्टि स्वरूपको हटाकर समष्टिरूपकी भावना करनी पड़ती है, अर्थात् अपनेको साधारण देह न मानकर महाविराट् मानना पड़ता है। फिर तो द्युलोकको अपना मूर्द्धा, सूर्यको चक्षु, वायुको, प्राण, अन्तरिक्षको उदर, समुद्रको वस्ती, पृथिवीको पैर मानता है। जिसमें अहंता लानी हो उसमें पहले घनिष्ठ ममता लानी पड़ती है। जिनमें साधारण ममता होती है, उनमें अहंता नहीं होती। देहमें घनिष्ठ ममता होती है, अतः उसमें ही अहंता होती है। इतनी ममता दृढ होनेसे ही अहंता उत्पन्न होती है। जब कभी पुत्र-कलत्रमें ममता घनिष्ठ हो जाती है, तब उनमें भी अहंता उत्पन्न होती है। इसीलिये उनके दुःख-सुखमें दुःखी-सुखी होनेकी बात चलती है। अतएव जैसे प्राणी देहके भोजन-वस्त्र विविध सुख- साधनोंके लिये तथा दुःख दूर करनेके लिये प्रयत्नशील होता है, वैसे ही जब पुत्र-कलत्रादि भी ममता एवं अहंताके आस्पद होते हैं, तब उनके भी दुःख- निवृत्ति एवं सुखप्राप्तिके लिये प्राणी सदा ही तत्पर होता है। यह ममता क्रमेण विकसित होती है। साधारण प्राणी देहमें ही ममता रखता है, पर साधक धीरे

धीरे सकुंचित व्यष्टि अभिमानको मिटाकर, उसे कुटुम्ब, ग्राम, मण्डल, राज्य, राष्ट्र एवं विश्वमें विकसित करता है। इसीलिये साधारण प्राणी अपने ही दुःखमे दुखी और सुखमें सुखी होते हैं। पर उच्च भावनावाले लोग कुटुम्ब, ग्रामके दुःख-सुखमें दुखी-सुखी होते हैं। और अधिक उच्च लोग सारी पृथ्वीको ही कुटुम्ब मानकर सारे विश्वको अपनी आत्मा मानकर संसारके ही सुख-दुःखमें सुखी- दुखी होते हैं। इसीलिये अधिकांश अपने दुःख-सुखमें रोते-हँसते हैं, पर दूसरोंके दुःखमें रोनेवाले और दूसरोंके सुखमें हँसनेवाले महापुरुष होते हैं। इसका निष्कर्ष यह निकलता है कि जैसे सामान्य प्राणी अपने सुख-प्राप्ति दुःख-निवृत्तिमें निरन्तर प्रयत्नशील होता है, वैसे ही महापुरुष समष्टि जगत्‌की दुःख-निवृत्ति और सुख साधनमें लगे रहते हैं। इस दृष्टिसे राजा-प्रजा सभी समष्टि हित-साधनमें संलग्न रहकर एक इस प्रकारका जीवन निर्धारित करते और कम-से-कम उस स्थितिमें राष्ट्रके प्रत्येक नागरिकको पहुँचानेका प्रयत्न करते हैं। विविध प्रकारकी सहायता तथा बिना सूद-ऋणादिद्वारा रोजी-रोजगार देकर मजदूरी या नौकरी देकर सभीके लिये उचित रोटी, कपड़ा, औषध, शिक्षा, निवासकी व्यवस्था की जाती है। उसी दृष्टिसे वेतनका भी निर्धारण होता है। योग्यता एवं परिस्थिति- के अनुसार किसीको नौकरी, किसीको कोई व्यापार, किसीको कोई उद्योग, किसीको खेती करने आदिकी व्यवस्था करके सबकी ही रोजीकी व्यवस्था की जाती है। इतनेपर भी हानिका डर एव लाभका प्रलोभन हुए बिना आलस्य-प्रमादका त्यागकर उत्साहके साथ तत्परतापूर्वक परिश्रममें जबतक प्रवृत्ति न होगी, तबतक सफलता सम्भव नहीं। संघटनकी कुंजी यह तो हुई विघटनकी बात। अब जहाँ ‘संघे शक्तिः कलौ युगे’ की बात आजकल बहुत होती है, वहाँ भी संघटनकी योजनाएँ कैसे सफल हो, इस विषयमें सभी परेशान हैं। वास्तवमें जो संघटन पर रातों-दिन व्याख्यान दे और लेख लिख रहे हैं, जो स्वय प्रान्त, समाज, राष्ट्रके संघटनपर जमीन-आसमानके कुलाबे एक किया करते हैं, उनके स्वाभाविक स्वार्थसे सम्बन्ध रखनेवाले सभी काम प्रायः विघटनके मूल होते हैं। सौहार्द, सामञ्जस्य, सौमनस्य, मनुष्यत्वकी बातें वहींतक होती हैं, जहाँतक उनके निजी स्वार्थमें बाधा नहीं आती। फिर बाहरकी तो बात ही दूसरी है, पहले उनके घरोंमें ही कितना संघटन है? कुटुम्बियों, बन्धु-वर्गों, स्त्री, पुत्र, माता-पितामें क्या सौहार्द है?- यदि नहीं तो बाहर कैसे होगा? वस्तुतः यह धारणा भ्रान्तिपूर्ण है कि व्यक्तियोंके सुधार बिना सामूहिक सुधार हो जायगा। यह सच है कि राष्ट्र, प्रान्त, समाजके वातावरणका प्रभाव व्यक्तियोंपर पड़ता है, पर व्यक्तियोंके ही समूहको तो समाज, राष्ट्र आदि कहा जाता है। यदि सभी व्यक्ति आत्मसुधारकी ओर ध्यान न देकर

[header] वर्ग-संघर्ष २९५ केवल समूह-सुधारके लिये प्रयत्नशील होंगे तो क्या स्वप्नमें भी वैयक्तिक या सामूहिक सुधार हो सकता है ? कुछ व्यक्तियोंके समूहको कुटुम्ब, कुछ कुटुम्बोंके समूहको ग्राम या नगर कहा जाता है और उनके समूहको ही प्रान्त एव राष्ट्र कहा जाता है । अतः जबतक वैयक्तिक, सामूहिक दोनों ही सुधारकी ओर ध्यान न दिया जाय, तबतक सफलताका स्वप्न देखना बेकार है । इसीलिये भगवान् मनु इस राष्ट्रिय, सामाजिक व्यवस्थाको ही लक्ष्यमें रखकर कौटुम्बिक, सामाजिक व्यवस्थापर जोर देते हैं और कुटुम्बपतिको वैयक्तिक नियन्त्रणके लिये यह बतलाते हैं कि धर्मबुद्धिसे ऐसा नियन्त्रण करे कि जिससे कुटुम्ब और समाजके विघटनका मूल विवाद ही न उठने पाये । असहिष्णुता, अक्षमता, स्वार्थपरायणता आदि दोष ही विवाद और कटुता फैलाकर विघटन करते हैं । मनुका कहना है कि प्रति व्यक्तिको चाहिये कि वह ऋत्विक्, पुरोहित, आचार्य, मातुल, अतिथि, आश्रित, बालक, बूढ़े, रोगी, वैद्य, जातिवालों, सम्बन्धी, बान्धव, माता, पिता, बहन, भाई, पुत्र, स्त्री, बेटी तथा नौकर-चाकरोंके साथ विवाद न करे— ऋत्विक्पुरोहिताचार्यैर्मातुलातिथिसंश्रितैः । बालवृद्धातुरैर्वैद्यैर्ज्ञातिसम्बन्धिबान्धवैः ॥ मातापितृभ्यां जामीभिर्भ्रात्रा पुत्रेण भार्यया । दुहित्रा दासवर्गेण विवादं न समाचरेत् ॥ ( ४ । १७९-८० ) अगर उपर्युक्त व्यक्तियोंमें एक व्यक्तिके चलते विवाद और विघटन न हुआ तो कौन कह सकता है कि उसीके दृष्टान्तसे दूसरे भी वैसा कर एक महासंघटनका सूत्रपात न करेंगे ? पर सहवाससे खटपट होना स्वाभाविक है। राग, रोष, ईर्ष्या, मद, मोह आदि बड़े-बड़े योगियोंके मनमें भी विकार, अपराग पैदा कर देते हैं । संघर्षसे बचना तो बड़ा कठिन है, स्वार्थोंके सम्बन्धसे पिता-पुत्रादिमें भी विवाद खड़ा होता है, फिर दूसरोंमें तो कहना ही क्या ? अतएव मनु इसे धर्म बतलाकर इसके पालनसे परलोक-सिद्धि बतलाते हैं । धार्मिक पुरुष कठिन-से- कठिन कष्ट सहकर भी धर्मको बचाते हैं । धर्म-बुद्धिसे एक सम्राट् भी अपने गुरुका सेवक बनता है । उनके किये हुए अपमानोंको श्रद्धासे सहन करता है और उसके मनमें विकारका लेश भी नहीं आता । इसलिये मनुका कहना है कि इनसे साथ झगड़ा बचाकर गृहस्थ सब पापोंसे छूट जाता है— एतैर्विवादान् संत्यज्य सर्वपापैः प्रमुच्यते । एभिर्जितैश्च जयति सर्वांल्लोकानिमान् गृही ॥ (मनु० ४ । १८१)

५५२ मार्क्सवाद और रामराज्य हानि और अन्तमें किसीको लाभ भी होता है—यह कार्य-कारणभाव मान्य ही है। सब घटनाओंका कार्य-कारणभाव सर्वथा ही असङ्गत है। यदि सभी घटनाओं- का परस्पर कार्य-कारणभाव हो तो कार्यकारणभावकी कल्पना ही समाप्त हो जाती है। किसीका कोई कारण होकर अन्यका अकारण हो तभी कार्य-कारणभावकी विशेषता होती है। कुलालका पिता भी यद्यपि कुलालजननद्वारा घटका कारण कहा जा सकता है तथा बाणनिर्माता भी किसीके वधमें परम्परया कारण हो सकता है, परंतु तार्किकोंने ऐसे कारणोंको 'अन्यथासिद्ध' कहा है। अन्यथा- सिद्धिशून्य कार्याव्यवहित पूर्वक्षणवर्तीको ही कारण कहा जाता है। कालान्तरभावी स्वर्गादिके प्रति अग्निहोत्रादि पूर्वक्षणवर्ती नहीं हो सकता। अतः बीचमें अपूर्व (अदृष्टरूप) व्यापार मानकर उसके द्वारा कार्य-कारणभाव निश्चित होता है। 'तज्जन्यत्वे सति तज्जन्यजनकत्व' ही व्यापार है। अग्निहोत्रादिजन्य होकर अग्निहोत्रादिजन्य स्वर्गका जनक अदृष्ट है। काकके बैठने, तालके गिरनेमें यद्यपि कार्य-कारणभाव प्रतीत होता है, तथापि 'काकतालीयन्याय' का अकार्य- कारणभाव स्पष्ट ही है। इसके अतिरिक्त 'इति-ह-आस' (इतिहास) ऐसा हुआ— इस ऐतिह्यको ही इतिहास कहते हैं। 'वटे यक्षः' यह प्रसिद्धि इतिहास नहीं है। अन्ध- परम्पराकी प्रसिद्धि अप्रमाण और आप्तपरम्पराकी प्रसिद्धि प्रमाण होती है। इसीलिये अतीत घटनाओंके सम्बन्धमें वचन या लेख ही प्रमाण होते हैं। कुछ अंशोंमें अनुमान भी सहायक होते हैं। करोड़ों वर्षोंकी अगणित घटनाओंका उल्लेख हो ही नहीं सकता। यदि एक-एक वर्षकी घटनाओंका एक-एक पन्नेमें भी संकलन करे तो भी करोड़ों पन्नोंका इतिहास होगा। उसे कौन कितने दिनमें पढ़ेगा, फिर कब निष्कर्ष निकालेगा ? सम्पूर्ण घटनाओंका ज्ञान न होनेसे अधूरी घटनाके अधूरे ज्ञानसे निकाला हुआ निष्कर्ष भी अधूरा ही होगा। फिर घटनाओ- की सच्चाई जाननेमें भी पर्याप्त भ्रम रहता है, आँखों-देखी घटनाओंके सम्बन्धमें विभिन्न संवाददाताओं, समाचार एजेन्सियोंमें पर्याप्त मतभेद रहता है। समाचार- पत्रों एव सम्पादकीय लेखोंमें जाते-जाते एक ही घटनाका रूप सैकड़ों ढंगका बन जाता है। इसीलिये पुरानी घटनाओंका पढ़ना-लिखना गड़े मुर्दोंके उखाड़ने- जैसा ही व्यर्थ होता है। म्यूनिसिपल बोर्डोंमें मनुष्योंके ही जनमने मरनेका लेखा-जोखा होता है, मच्छरों-मक्खियोंके जीने-मरनेका लेखा-जोखा नहीं रहता; क्योंकि उनका कोई महत्त्व नहीं होता। वैसे ही प्रतिवर्ष इतिहासमें मुख्य-मुख्य व्यक्तियों एवं घटनाओंका ही उल्लेख होता है, लाखो ही नहीं, करोड़ों व्यक्तियों एवं घटनाओंका उल्लेख छोड़ दिया जाता है। क्योकि लेखक उनका महत्त्व नहीं मानता। परंतु एतावता क्या कोई कह सकता है कि 'उनमें कोई व्यक्ति या घटना भी महत्त्वपूर्ण नहीं?' इसीलिये भारतीय महर्षियोंने योगज ऋतम्भरा प्रज्ञाके द्वारा ही अतीत महत्त्वपूर्ण आवश्यक घटनाओंका साक्षात्कार कर उनका उल्लेख किया है।

मार्क्स-दर्शन ५५३ 'योगजविशेषता नहीं होती' यह कहना मूर्खता होगी । स्पष्ट ही देखते हैं कि 'जब चित्त शान्त, एकाग्र होता है तो सूक्ष्म ज्ञान उत्पन्न होता है । चित्तके चञ्चल एवं अशान्त होनेपर आँखों-देखी, कानों-सुनी बातोंका भी ठीक-ठीक ज्ञान नहीं होता ।' वाल्मीकीय रामायणके लिये ब्रह्माका वरदान है—'न ते वागनृता काव्ये काचिदत्र भविष्यति' (वाल्मी० १।२।३३) इस काव्यमें तुम्हारा एक भी वाक्य अनृत नहीं होगा । यदि ये सब बातें झूठी हैं, तो जडवादियोंकी सम्पूर्ण ऐतिहासिक कल्पनाएँ और उनके कार्यकारणभाव भी सुतरां झूठे हैं । मनुष्योंको विचारने, सोचने, उन्नत करनेमें अवश्य स्वतन्त्रता है, परंतु उनके लिये भी शिक्षण, मार्गदर्शन अपेक्षित होते हैं । आज भी शिक्षणादिकी आवश्यकता सूर्यके समान स्पष्ट है । सर्वज्ञ ईश्वर, आप्त, महातपा, महर्षियोंके शिक्षण मार्गदर्शनके अनुसार सोचने, विचारने, उन्नतिके प्रयत्न करनेसे सफलता निश्चित होती है, मनमानी करनेसे भटककर परेशान होना पडता है । आज भी न्याय, नीति, शिक्षा, शिल्पादिके सम्बन्धमें परम्परासे ही शिक्षा ली जाती है । अदालतोंमें भी पुरानी नजीरें पेश की जाती हैं । नीतिके सम्बन्धमें भी पुरानी मान्य- ताओंकी खोज की जाती है । यदि अतीतसे शिक्षा नहीं लेनी है, तो फिर इतिहास- का महत्त्व ही क्या ? अतीत घटनाओमे कितनी ही अनिष्ट हैं, कितनी इष्ट हैं, कितनी भली हैं, कितनी बुरी हैं । अधिकांश अनाचार, पापाचार एवं बुराईकी ही घटनाएँ घटती हैं । अतः महर्षियों, शिष्टोंसे सम्मत, सत्य, लाभदायक इतिहास ही आदरणीय होता है । अतः राष्ट्रको अपने भविष्यनिर्माण करने, धार्मिक, आध्यात्मिक, सामाजिक, राजनीतिक उचित शिक्षण प्राप्त करनेके लिये ही आप्त इतिहासोंका उल्लेख होता है । पूँजी जड है, वह स्वयं मुर्दा है, प्रयोक्ताओंके गुण एवं दोषसे उसमें गुण या दोष आते हैं। पूँजीद्वारा होनेवाले विकाससे पूँजीपतिका ही विनाश नहीं होता, किंतु मजदूरका भी होता है । अन्यथा उसकी भी बेकारी बढती है । बेकारी बढनेसे ही मजदूरोंका राज्य नहीं बन जाता । यदि यही बात हो तो फिर राज्य बनानेके लिये व्यक्ति या समूह बेकार ही प्रयत्न करे, परंतु ऐसा देखा नहीं जाता । इसके साथ ही यह भी समझना चाहिये कि वैज्ञानिक आविष्कारक आदि आधुनिक विकासके मूल हैं । यदि विकासके परम्परागत हेतु होनेसे पूँजीपतिका विनाश होता है, तो साक्षात् 'संश्लिष्ट' आविष्कारको एव मजदूरोंका विनाश क्यो न होगा ? जैसे पूँजीपतियोंका विनाश इतिहाससिद्ध है, वैसे ही पूँजीपतियोंसे अधिक सख्यामें मजदूरोका विनाश भी इतिहाससिद्ध है । फिर भी जैसे मजदूर रहते हैं, वैसे पूँजीपति भी हैं । यह दूसरी बात है कि मजदूरके नामपर कुछ सरकारी अधिना- यक पूँजीपति बन जाते हैं । किसी भी कार्यमें आनेवाले दोषों एव दुष्परिणामोंको

५५४ मार्क्सवाद और रामराज्य बुद्धिमान्, ईमानदार मिटानेका प्रयत्न करता है और सफल होता है; कोई खास वर्ग या व्यक्ति ही ऐसा करता है, यह नहीं कहा जा सकता । फिर धर्म- नियन्त्रित शासन सुतरा ईश्वरीय एवं आर्ष सम्मतियोके अनुसार आगत दोषोंको तो दूर कर ही सकता है। श्रेणी और वृत्ति मार्क्सवादी कहते है कि 'जीविका पैदा करनेके क्रममें जो मनुष्य जिस स्थान- पर है वही उसकी श्रेणी है। मनुष्य जीविका उपार्जन करनेके ढंगके अनुसार अपने रहन-सहनका ढग बना लेता है, अतएव जीविकोपार्जनका ढग बदलनेसे समाजका रूप भी बदल जाता है। समाजमें पैदावारकी दृष्टिसे श्रेणियाँ अपना-अपना स्थान रखती हैं। पैदावारके फल या पैदावारके साधनोपर अधिकार करनेके लिये जो संघर्ष चलता है, वही मनुष्यसमाजका इतिहास है, वही मनुष्यसमाजके विकासका मार्ग है। विकासके मार्गमें विरोध आना आवश्यक है, विरोधसे नया विधान तैयार होता है। नया विधान समाजके विकासको आगे बढाता है।' शरीर- मात्रको आत्मा माननेवाले शरीरभिन्न आत्मा एवं उसका जन्मान्तर होने, ईश्वर एवं धर्माधर्मका रहस्य न समझनेवाले चार्वाकप्राय जडवादियोकी दृष्टिमें उपर्युक्त बाते ठीक ही हैं । परंतु तद्विपरीत रामराज्यवादीको 'पशुओ, वृक्षों-जैसी ही मनुष्योकी भी जन्मना ही ब्राह्मणादि श्रेणी मान्य है। जीविका चलानी हर मनुष्यकी मुख्य समस्या नहीं, किंतु लौकिक-पारलौकिक विविध अभ्युदय एव परम निःश्रेयस ही उसका मुख्य उद्देश्य है । तदर्थ धर्म, संस्कृति, ज्ञान, विज्ञान, शिल्प, संगीत, कला-कौशलका आविर्भाव परमावश्यक होता है। केवल मनुष्योके लिये ही जीविका कोई असाधारण समस्या नहीं है। वह पशु-पक्षियोके लिये भी अपेक्षित ही होती है। आहारनिद्राभयमैथुनं च सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम् । धर्मो हि तेषामधिको विशेषो धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः ॥ (हितो०) अतएव आस्तिकोके यहाँ वर्णानुसारिणी जीविका होती है। जीविकानुसारी वर्ण नहीं। वर्णोंके भेदसे ही शास्त्रोक्त कर्मोंका भी भेद है। राजसूय, वाजपेयादि क्षत्रिय-ब्राह्मणादिके भेदसे विहित हैं । इस तरह धर्मकी दृष्टिसे ब्राह्मणादि श्रेणियाँ ही मुख्य एव उपादेय हैं । धनी, गरीब, पूँजीपति, मजदूर आदि वास्तविक श्रेणी ही नहीं हैं। ऐसी कृत्रिम श्रेणियाँ सदा ही हानिकारक होती हैं। ब्राह्मणों, क्षत्रियो, वैश्यों, शूद्रों—सभीमे ये अमीर-गरीब होते हैं। बुद्धिमान्, निर्बुद्धि, दुर्बल, सबल कं ई जाति नहीं होती । उनके विवाह, खानदान आदि भी इन्हीं अकृत्रिम श्रेणियोंमे होते हैं। इन श्रेणियोंमे साधनोके हथियानेके लिये कभी भी सघर्ष नहीं हुआ । मार्क्स-जैसे कुछ लोगोद्वारा यह कृत्रिम भेद उत्पन्न किया