भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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३८२ मार्क्सवाद और रामराज्य सृष्टि-प्रलयकी परम्परा जबसे चली और जबतक रहेगी तबतक किसी-न-किसी रूपमें रहेगी ही । धर्म-नियन्त्रण घटनेपर संघर्ष बढ़ता है और धर्म-नियन्त्रण बढ़नेपर संघर्ष समाप्त हो जाता है । श्रेणीभेदका आधार मार्क्स कहता है—‘जैसे पशुओं, वनस्पतियों, धातुओंमें श्रेणीभेद है, वैसे मनुष्योंमें भी श्रेणीभेद है और वह आर्थिक आधारपर ही उचित है । जिस उपायसे मनुष्यसमुदाय अपनी रोजी कमाता है, वही उसका प्रधान लक्षण है । वेतन, मजदूरी आदिसे निर्वाह करनेवाले लोग श्रमजीवी वर्गमें आते हैं, पूँजी (जमीन, मकान, कारखाने, खाने) द्वारा कमानेवाले लोग पूँजीपति वर्गमें समझे जाते हैं । यद्यपि मजदूर भी कहीं बैंकमें रुपया रखता है, उससे ब्याज भी पाता है। कोई पूँजीपति भी अपने व्यापारकी देख-भाल करता है और मैनेजरकी हैसियतसे उसे कुछ तनख्वाह भी मिलती है, तथापि श्रमजीवीका खास आधार मजदूरी होता है। पूँजीपतिका खास आधार पूँजी होती है । इन वर्गोंमे भी अवान्तर भेद हो सकते हैं । कुछ बुद्धिजीवियोंको अधिक वेतन मिलता है, कुछको जानवरोंकी तरह मेहनत करके भी पेट भरनेतकको पूरा नहीं पड़ता । पर श्रमके आधारपर ही इन सबकी जीविका चलती है, अतः सभी श्रमजीवी हैं । पैदावारके साधनोंपर अधिकारवाले पूँजीपति हैं।' मार्क्सका कहना है कि 'इन दो वर्गोंके बीच गहरा और अमिट विरोध रहता है, जिसके फलस्वरूप वर्ग-कलह उत्पन्न होता है। श्रमजीवी अपने श्रमको ज्यादा से-ज्यादा कीमतपर बेचना चाहता है, अधिक से- अधिक मजदूरी प्राप्त करना चाहता है। पूँजीपति इस श्रमको कम-से-कम दाममें खरीदना चाहता है, कम से-कम मजदूरी देना चाहता है । यह विरोध दूकानदार और ग्राहको-जैसा नहीं, किंतु सिद्धान्तपर आधारित होता है । कारण, इसमें और खरीदने एवं बेचनेमें बड़ा अन्तर है । श्रमजीवी यदि अपने श्रमको जल्दी न बेचे तो भूखो मरने लगे । इसलिये उसे पूँजीपतिके इच्छानुसार मजदूरी करनेके लिये लाचार होना पड़ता है । इस तरह पूँजीपति श्रमजीवीपर अत्याचार करता है। यह विरोध ही श्रमजीवीको सगठनकी ओर प्रवृत्त करता है और श्रमजीवी संघ मजदूर-सभाओका जन्म होने लगता है । यही वर्ग- कलहकी पहली सीढ़ी है । निजी सम्पत्तिका सिद्धान्त जबतक रहेगा, तबतक पराधीनता बनी रहेगी। अतः निजी जायदादकी प्रणालीको मिटाकर उत्पत्तिके साधनोंपर समस्त जनताका अधिकार उचित है । इस भावनासे मजदूर सगठन और उग्र बन जाता है । वर्ग-भेद समझकर वर्ग-विद्वेष, वर्ग-संघर्षके अनन्तर ही वर्ग-विध्वंस क्रान्ति सम्भव है । अतः वर्तमान कष्टोंको दूर करना, मजदूरी बढ़ाना, बोनस-भत्ता बढ़ाना, कामके घंटोंमें कमी करना आदि सब गौण चीजें